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असल पर कोई बात नहीं करता

Sat, 03 May 2014 08:58 PM IST
पत्रलेखा चटर्जी
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देश के इतिहास का सबसे लंबा और संभवतः सबसे महंगा चुनाव अब अपने आखिरी दौर में पहुंच चुका है। अब सबकी निगाहें शेष बची 105 सीटों पर हैं, जहां सात मई और 12 मई को मतदान होने हैं। लोकसभा चुनाव के इसी आठवें और नौवें दौर में देश के अनेक राजनीतिक दिग्गजों का फैसला होना है। इसके साथ ही राजधानी में अब नई सरकार को लेकर अटकलों का दौर शुरू हो गया है। मानो हर किसी का अपना नजरिया है और सोशल मीडिया ने इन चर्चाओं में विविधता ला दी है।
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पिछले हफ्ते मैं गूगल हैंगआउट के एक पैनल में थी, जिसमें आज के सबसे मौजूं सवाल पर चर्चा हो रही थी- ''क्या 2014 के चुनावों के बाद देश को एक स्थिर सरकार मिलेगी?'' ईमानदारी से अपना नजरिया रखूं तो कोई भी आश्वस्त होकर यह कहने की स्थिति में नहीं है। अभी हम सिर्फ विभिन्न राजनीतिक गठबंधनों के बारे में कह सकते हैं कि वे शायद अगली सरकार बना लें। मगर क्या ऐसा कोई गठबंधन स्थिर होगा? ऐसी कोई सरकार कितने दिन चल पाएगी? यह सब इस पर निर्भर होगा कि किस तरह की पार्टियां नजदीक आती हैं और किन मुद्दों के आधार पर उनमें गठबंधन होते हैं। वैसे स्थिरता का एक और आयाम है। यदि किसी राजनीतिक पार्टी को पूर्ण बहुमत मिल जाता है और वह ऐसी नीतियों को स्वीकार करती है जोकि बहुसंख्यक समूहों के हित में हों, तो जो लोग खुद को अलग-थलग महसूस करेंगे, वे चुप नहीं बैठेंगे। इससे टकराव हो सकता है और स्थिरता पर असर पड़ सकता है। मगर अनिश्चितताओं के बीच एक बात तय है कि जो भी सत्ता में आएगा उससे असीमित अपेक्षाएं होंगी और उसके सामने ढेरों चुनौतियां होंगी।

तो फिर प्राथमिकताएं क्या होनी चाहिए? बेशक अर्थव्यवस्था सर्वोपरि है। कहने की जरूरत नहीं कि हमें नौकरियों की जरूरत है। मगर इसके साथ ही एक और महत्वपूर्ण सवाल का जवाब तलाशना होगा, वह यह कि आखिर हम कैसा समाज चाहते हैं? जो भी सत्ता में आए विभिन्न राज्यों, यहां तक कि विभिन्न जिलों के बीच की असमानता पर गौर करना होगा, जिसका जिक्र विकास और वृद्धि को लेकर की जाने वाली बहसों में अक्सर किया जाता है। असल में भारत बेतरतीब तरीके से विकास कर रहा है। इससे कई तरह के तनाव पैदा हो रहे हैं। बिजली जैसे बुनियादी मुद्दे को ही लीजिए। आंध्र प्रदेश, दिल्ली, गोवा, हरियाणा, कर्नाटक, केरल, पंजाब, सिक्किम और तमिलनाडु जैसे नौ राज्य हैं, जो कागजों में ग्रामीण इलाकों में बिजली की सौ फीसदी पहुंच का दावा करते हैं। भारत में किसी गांव में यदि सिर्फ दस फीसदी घरों तथा स्कूलों, स्वास्थ्य केंद्र और पंचायत जैसे सार्वजनिक केंद्रों में बिजली के कनेक्शन हों, तो उसे विद्युतीकृत मान लिया जाता है। मगर देश में अब भी 30,000 गांव पावर ग्रिड से नहीं जुड़े हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इनमें से सर्वाधिक 10,856 गांव अकेले उत्तर प्रदेश में हैं।
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उपभोक्ता आधारित अर्थव्यवस्था में तेजी आने के बावजूद उत्तर प्रदेश सामाजिक सूचकांकों में काफी पीछे है। 2011 की जनगणना के मुताबिक सूबे की साक्षरता दर 70 फीसदी से कम है, जबकि राष्ट्रीय साक्षरता दर 74 फीसदी है। मातृत्व मृत्यु दर के मामले में भी राज्य का बुरा हाल है।

देश के जाने-माने स्वास्थ्य विशेषज्ञ प्रोफेसर श्रीनाथ रेड्डी ने फोर्ब्स पत्रिका में 2012 में लिखा था कि क्या यह अपेक्षा की जा सकती है कि मध्य प्रदेश में पैदा हुई कोई बच्ची केरल में जन्मी किसी बच्ची की तरह स्वस्थ हो सकती है, जहां उसके पहले जन्मदिन तक उसके जीवित रहने की संभावनाएं छह गुना अधिक होती है। आखिर किसी भारतीय ग्रामीण महिला को किसी कॉरपोरेट अस्पताल के ब्रोशर में छपी किसी विदेशी महिला जैसी स्वास्थ्य सुरक्षा कब मिलेगी? ये बहुत बुनियादी सवाल हैं। हालांकि तमिलनाडु और केरल में कुछ कम लागत वाले स्वास्थ्य मॉडल भी काम कर रहे हैं।

इन चुनावों के दौरान विकास और सुशासन पर काफी चर्चा हो रही है। हालांकि इन अहम मुद्दों पर जिस तरह का विमर्श होना चाहिए वह दिखाई नहीं दिया। बार-बार गुजरात मॉडल की चर्चा हो रही है। चुनावी शोर-शराबे में दो तरह की बातें सुनने को मिल रही हैं। एक वर्ग इसे शासन का सर्वश्रेष्ठ मॉडल बता रहा है, तो दूसरे को इसमें कुछ भी खास नहीं दिख रहा। यह दुखद है कि देश में मौजूद विकास के दूसरे मॉडलों पर कोई बात नहीं हो रही है। बेशक गुजरात से बहुत कुछ सीखा जा सकता है और गुजरात भी दूसरे राज्यों से बहुत कुछ सीख सकता है। उम्मीद की जा सकती है कि नई सरकार देश के विभिन्न हिस्सों में प्रभावी तरीके से काम कर रहे विभिन्न विकास मॉडलों पर गौर करेगी।
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