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प्रेम की डगर: जैसे-जैसे साहित्य में तरह-तरह के अधिकारों का विमर्श बढ़ा, प्रेम गायब होता गया

क्षमा शर्मा Published by: क्षमा शर्मा Updated Thu, 28 Jan 2021 08:11 AM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर। - फोटो : अमर उजाला।

न ये चांद होगा, न तारे रहेंगे, जैसा गीता दत्त की आवाज में मधुर गाना किसी फिल्म में आपने कब से नहीं सुना। या कि तुम्हें याद होगा कभी हम मिले थे, की पंक्तियों में छिपे दुःख और तकलीफ का एहसास कब से नहीं हुआ। जिसे कभी चाहा था उससे दूर चले जाने की व्यथा का बयान अब युवाओं को इतना आकर्षित क्यों नहीं करता। कोई कारण नहीं कि साहित्य में संयोग के मुकाबले वियोग शृंगार का अधिक महत्व है।



मशहूर लेखक कमलेश्वर ने एक बार कहा था कि दुनिया में सबसे अधिक कहानियां असफल प्रेम पर लिखी गई हैं। एक समय था, जब हिंदी के बड़े से बड़े कवि प्रेमगीत लिखते थे। चूंकि प्रेम समाज में वर्जित था, लड़के-लड़कियों के बीच प्रेम एक टैबू की तरह था, इसलिए फिल्मों और साहित्य में उसका डंका बजता था। कुछ दिन पहले मशहूर लेखक राजेन्द्र राव ने फेसबुक पर एक पुस्तक का चित्र लगाया था। जिसका नाम था-हिंदी के सर्वश्रेष्ठ प्रेमगीत। इसे उन्होंने कोटा रेलवे स्टेशन से 1963 के जुलाई माह में एक रुपया में खरीदा था। इस पुस्तक में निराला, पंत, बच्चन, दिनकर, नीरज, नरेंद्र शर्मा, महादेवी वर्मा, माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण राव, उदयशंकर भट्ट, अज्ञेय, नवीन, हरिकृष्ण प्रेमी आदि सौ कवियों के प्रेमगीत थे। लेकिन जैसे-जैसे साहित्य में तरह-तरह के अधिकारों का विमर्श बढ़ा, प्रेम गायब होता गया।


प्रेम को पिछड़ा और अधिकारों के खिलाफ माना जाने लगा। इसलिए कहानी, कविताओं, नाटक आदि से प्रेम की विदाई हो गई। आज शायद ही कोई कवि प्रेमगीत लिखता है। इन दिनों प्रेम करना उतना आपराधिक नहीं रहा, जैसा एक समय में था। प्रेम करने वाली लड़कियों को तो उस समय समाज वैसे ही बदचलन, लुच्ची, मक्कार, आवारा, करप्ट, मर्दखोर आदि विशेषणों से विभूषित करता था। प्रेम करने वाले लड़के समाज से बहिष्कृत नहीं होते थे। लड़कियों को हमेशा अपने अतीत से डरकर रहना पड़ता था। पर समय बदला, मध्यवर्ग के बड़े हिस्से में प्रेम स्वीकृत हो चला। जाति, धर्म की दीवारों का महत्व भी घटने लगा। माता-पिता, घर के अन्य सदस्य बच्चों की पसंद से उनकी शादी करने में अपनी हेठी समझने की भावना से बहुत हद तक मुक्त हुए। लेकिन जैसे-जैसे  समाज में प्रेम बढ़ा, मोबाइल और अन्य तकनीक के कारण लड़के-लड़कियों की बातचीत सहज हुई, वैसे-वैसे प्रेम के कारण हिंसक घटनाओं में भी वृद्धि हुई।


प्रेम में असफल होने पर बदले की भावना बढ़ी। मारपीट, ब्लैकमेलिंग, निजी पलों को सार्वजनिक करना, एसिड फेंकना यहां तक कि हत्या भी होने लगी। देखने में यह भी आया कि विवाह के बाद भी प्रेमी से मिलने के लिए पति की हत्या या प्रेमिका से मिलने के लिए पत्नी की हत्या तक होने लगी। फेसबुक पर आज सिंगल और कल रिलेशनशिप में लगाए जाने वाले स्टेट्स बढ़े, तो दूसरी तरफ निम्न मध्यवर्ग में प्रेम के असफल होने पर बदला लेने की भावना भी बढ़ी। प्रेम में प्लेटोनिक लव, जिसके बारे में कहा जाता है कि वह हमेशा जिंदा रहता है, के मुकाबले शरीर की प्राथमिकता बढ़ी। इसे स्त्री सशक्तीकरण और परिवार नियोजन के तमाम साधनों और स्त्री के प्रति शुचिता और पजैसिवनैस की भावना को कम होने के रूप में भी देखा गया।


दिलचस्प है कि मनोरंजन के तमाम माध्यमों से जिस तरह से प्रेम की कोमलता, उससे जुड़ी भावुकता दूर हुई, जीवन में भी ऐसा ही दिखाई देने लगा। कई बार इकतरफा प्रेम में गंभीर अपराध और हादसे होते नजर आए। कई मामलों में लड़कियां भी प्रेमियों को शादी के मंडप तक से अपहृत करके ले जाने लगीं। इस पर बयान ये कि लड़के ऐसा कर सकते हैं, तो हम क्यों नहीं। यानी कि लड़कों के जिस आचरण से हम नफरत करते हैं, मौका मिले तो वैसा ही कर सकते हैं। प्रेम की कोमलता के मुकाबले, जिसे चाहा उसे हर हाल में प्राप्त करने की भावना, चाहे ऐसा बंदूक के जोर पर ही क्यों न करना पड़े, न केवल फिल्मों, धारावाहिकों, वेब सीरीज, जासूसी कथाओं में दिखाई देने लगी, बल्कि जीवन में भी ऐसा ही होने लगा।

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