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तेलंगाना में दल बदल का खेल

महेंद्र बाबू कुरुवा Published by: Raman Singh Updated Mon, 20 May 2019 07:08 PM IST
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महेंद्र बाबू कुरुवा - फोटो : a

ऐसे समय, जब सारा देश आम चुनाव, एग्जिट पोल और संभावित नतीजों की चर्चा में मशगूल है, दक्षिणी राज्य तेलंगाना में एक दिलचस्प राजनीतिक घटनाक्रम हो गया, जिस पर लोगों का खास ध्यान नहीं गया। तेलंगाना में सत्तारूढ़ तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) ने दिसंबर, 2018 में समय से पहले चुनाव करवाए थे, जिसमें उसे राज्य की 119 में से 88 सीटें मिली थीं और दो निर्दलीय का समर्थन मिलने से विधानसभा में उसका आंकड़ा 90 पर पहुंच गया, जिससे उसकी स्थिति काफी मजबूत हो गई। विधानसभा चुनावों के नतीजे घोषित होने के बाद अन्य पार्टियों के सदस्यों ने टीआरएस का रुख करना शुरू कर दिया। खासतौर से कांग्रेस, जिसके कुछ महीने के भीतर ही 19 में से 12 विधायक टीआरएस में जा चुके हैं। यदि कांग्रेस का सिर्फ एक और विधायक टीआरएस का रुख कर लेता है, तो कांग्रेस के दो तिहाई विधायक पाला बदल चुके होंगे और वे दल बदल विरोधी कानून के तहत अयोग्य होने से बच जाएंगे।



तेलंगाना में 2014 में हुए पहले विधानसभा चुनावों के बाद से टीआरएस ने दल बदल को बढ़ावा दिया है, जबकि उस समय उसे 119  में से 63 सीटें मिली थीं। तब यह तर्क दिया गया कि कांग्रेस सरकार को अस्थिर करने की कोशिश कर सकती है, इसलिए टीआरएस ने कांग्रेस के विधायकों को अपनी पार्टी से जोड़ने की कवायद की। जबकि तथ्य यह है कि टीआरएस ने कांग्रेस और अन्य दलों से आए ऐसे विधायकों के जरिये जमीनी स्तर पर अपना आधार मजबूत करने की कोशिश की, जिनकी लोगों के बीच पर्याप्त विश्वसनीयता रही है। अपने दूसरे कार्यकाल में भी टीआरएस की नजर कांग्रेस के विधायकों पर रही। पाला बदलने वाले पार्टी के विधायकों को अयोग्य घोषित करने से संबंधित कांग्रेस की याचिका विधानसभा अध्यक्ष के पास लंबित है। कांग्रेस ने अलग हुए गुट के टीआरएस में प्रस्तावित विलय को लेकर तेलंगाना हाई कोर्ट का भी दरवाजा खटखटाया है। हाई कोर्ट इस बारे में 11 जून को सुनवाई करेगा।


इस पृष्ठभूमि में हाल के राजनीतिक इतिहास की ओर लौटने की जरूरत है, जिससे अंदाजा लगाया जा सकेगा कि आखिर तेलंगाना में क्या हो सकता है। 2003 में उत्तर प्रदेश में बसपा के 13 विधायकों ने पार्टी से अलग होकर लोकतांत्रिक बहुजन दल के नाम से एक अलग गुट बना लिया था। बाद में 24 और विधायक उनसे मिले और पार्टी से अलग होने वाले विधायकों की संख्या 37 हो गई। उस समय बसपा के 98 विधायक थे और अलग होने वाले विधायकों की संख्या एक तिहाई से अधिक हो गई। इन विधायकों ने अपनी नई पार्टी का मुलायम सिंह यादव की सपा में विलय कर दिया, ताकि नई सरकार का गठन हो सके। विधानसभा अध्यक्ष ने भी इस दल बदल को मंजूरी दे दी। उस समय सदन में बसपा के नेता स्वामी प्रसाद मौर्य की याचिका को इस तकनीकी आधार पर खारिज कर दिया कि यह दल बदल नहीं, बल्कि पार्टी में टूट हुई और फिर इस गुट का विलय किया गया, जो कि दल बदल कानून का उल्लंघन नहीं है। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, जिसने फरवरी, 2007 को 13 विधायकों को अयोग्य घोषित कर दिया। उस समय तक मुलायम सिंह यादव सरकार का कार्यकाल लगभग पूरा हो चुका था और विधानसभा चुनाव को सिर्फ दो महीने बचे थे! संविधान के 91 वें संशोधन के जरिये दल बदल कानून के तहत किसी पार्टी में टूट के समय अयोग्यता के दायरे में आने वाले विधायकों की न्यूनतम संख्या एक तिहाई से बढ़ाकर दो तिहाई कर दी गई। इस संशोधन के बावजूद छोटे राज्यों में दल बदल को रोक पाना अब भी मुश्किल है।


- लेखक, हेमवती नंदन बहुगुणा केंद्रीय विश्वविद्यालय उत्तराखंड में सहायक प्राध्यापक हैं।

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