भारत में पंचायतें अतीत काल से हैं। पंचायतें कैसे संविधान का अंग बनीं, यह एक दिलचस्प कहानी है। आजाद भारत के लिए नया संविधान बनाने के लिए संविधान सभा का गठन दिसंबर, 1946 में हो गया था। संविधान सभा में जब उद्देश्य और लक्ष्य संबंधी प्रस्ताव पेश किया गया, तो उसमें स्वतंत्र भारत में पंचायतों के स्थान, भूमिका आदि का उल्लेख नहीं था।
संविधान सभा में बहस का एक मुख्य मुद्दा स्वतंत्र भारत में पंचायतों के स्थान का भी था। इस मुद्दे पर चार नवंबर, 1948 को हुई बहस की शुरुआत डॉ भीमराव आंबेडकर ने की और उन्होंने मैटकॉफ के एक प्रसिद्ध कथन को उद्धृत करते हुए कहा, 'राजवंश के बाद राजवंश आते चले गए, एक के बाद एक क्रांतियां होती गईं। मुगल, अंग्रेज व अन्य शासक शासन करके चले गए, लेकिन भारत के ग्राम समुदाय में कोई बदलाव नहीं आया। बैरी सेनाएं पास से गुजर गईं। गांव वालों ने अपने पशु चारदीवारी में बंद कर लिए तथा सेनाएं बिना कुछ किए चली गईं।'
अपने में सिमटे भारतीय ग्राम समुदाय पर मैटकॉफ के इस मार्मिक चित्रण के जरिये आंबेडकर ने तर्क दिया, '... गांव क्या हैं? वे स्थानीयता का कूप हैं। अज्ञान, संकीर्णता और सांप्रदायिकता की गुफा हैं। मुझे खुशी है कि संविधान के मसौदे में गांव को नहीं, बल्कि व्यक्ति को इकाई माना गया है।' इसी आधार पर पंचायतों के क्षेत्र में कार्यरत कह देते हैं कि आंबेडकर पंचायतों के विरुद्ध थे। लेकिन छह अक्तूबर, 1932 को बंबई ग्राम पंचायत विधेयक पर उन्होंने पंचायत का पक्ष लेकर उनमें शोषित समाज के प्रतिनिधित्व की वकालत की थी।
आंबेडकर ने यदि संविधान सभा में भी पंचायतों का पक्ष लेकर उन्हें राज्यों के नीति-निर्देशक सिद्धांतों के अध्याय में न रखवाकर संविधान के नौवें अध्याय में रखवाने का पक्ष लिया होता और इन संस्थाओं में दलितों के प्रतिनिधित्व की वकालत करते, जैसा कि उन्होंने 1932 में बंबई विधान सभा में किया था, तो आज ग्रामीण दलितों की स्थिति में बहुत सुधार हुआ होता। जो कार्य आजादी प्राप्ति के 43 वर्ष बाद 73वें संविधान संशोधन के माध्यम से हुआ, वह संविधान लागू होने के साथ ही शुरू हो जाता। निश्चय ही आंबेडकर ने उस समय की स्थिति को ध्यान में रखकर अपना आकलन किया था।
इस समय पंचायतों में लगभग आठ लाख चुने हुए प्रतिनिधि दलित एवं अनुसूचित जनजाति से अध्यक्ष के रूप में व पंचायत सदस्य के रूप में कार्यरत हैं। इतनी भारी संख्या के बावजूद इनकी प्रभावी भागीदारी नहीं है। इसका कारण इन वर्गों की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति है। अगर दलित प्रधान या सरपंच है, उसके अधिकार एवं शक्तियां गांवों के समृद्ध लोगों द्वारा प्रयोग हो रहे हैं। उसको जहां कहा जाता है, वहां वह अंगूठा लगा देता है या हस्ताक्षर कर देता है।
अगर प्रधान या सरपंच महिला है, तो उसका दोहरा शोषण हो रहा है। उसके अधिकार एवं शक्तियां उसके घरवाले या अन्य किसी परिवार के सदस्य के माध्यम से गांव के समृद्ध लोगों द्वारा प्रयोग किए जा रहे हैं। ऐसा क्यों हो रहा है? इसका मुख्य कारण है, उनका उचित क्षमतावर्धन नहीं हो रहा है और उन्हें सहयोग नहीं किया जा रहा है। उन्हें डर है कि अगर वे उचित बात का पक्ष लेंगे, तो उनका साथ कौन देगा? उनको पंचायतों के अधिकारों के बारे में जानकारी कौन देगा?
पंचायतों का एक मुख्य कार्य ग्रामों के आर्थिक विकास एवं सामाजिक न्याय की योजनाएं बनाना है, जिससे 29 विषय भी शामिल हैं। इनमें वे सभी विषय शामिल हैं, जो गांव के विकास के लिए जरूरी हैं। संविधान के अनुसार, आर्थिक विकास सामाजिक न्यायोचित होना चाहिए, अर्थात आर्थिक विकास न्यायोचित तब होगा, जब गांव के पिछड़े क्षेत्र का विकास होगा या जहां पिछड़े लोग रहते हैं, उनका विकास होगा।
लेखक हरियाणा, उत्तर प्रदेश एवं राजस्थान के लगभग 400 गांवों में घूम चुका है और उसने पाया है कि जहां पर दलित बस्ती है, आदिवासी बस्ती है या क्षेत्र हैं, वहीं पर अगर तुलनात्मक दृश्टि से देखें, तो विकास कम हुआ है। कारण? वे लोग जो वहां रह रहे हैं, उनकी भागीदारी नहीं है। पंचायतों में केवल पांच वर्षों में एक बार मतदान कर लें, बस वही भागीदारी है। दूसरी समस्या है कि पंचायतों में पंचायत सदस्यों की भागीदारी है ही नहीं। प्रधान या सरपंच अपने कुछ खास लोगों से बैठक के कोरम की पूर्ति कर लेता है और सरकारी कर्मियों की मिलीभगत से पैसों की बंदर बांट होती रहती है।
गांव के अंदर वित्त वर्ष 2018-19 में केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय से 1,14,915 करोड़ रुपये का आवंटन है। इसमें 55,000 करोड़ रूपये का आवंटन केवल मनरेगा (महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम) का है। दो लाख करोड़ से ज्यादा का आवंटन गांवों में विकास के लिए चौदहवें वित्त आयोग के द्वारा पांच सालों के लिए दिया जा रहा है। अन्य विभाग जैसे शिक्षा, चिकित्सा, खेती आदि के आवंटन को शामिल करें, तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि कितना पैसा गांव में जा रहा है। जाहिर है, पैसा तो आ रहा है, मगर उसका सही उपयोग कैसे हो यह बड़ी चुनौती है।
गांवों में पंचायतों में कार्यरत, दलित एवं आदिवासी लोगों के दलित एवं आदिवासी संगठन निम्न कार्य करें, तो आंबेडकर के विचारों को अमल में ला सकेंगे। प्रथम, यह जांच करें कि गांवों में पंचायतों में रोजगार के लिए एवं संरचनात्मक विकास के लिए कितना पैसा जा रहा है और उसका कितना भाग गांव में अविकसित क्षेत्र में एवं अविकसित लोगों के लिए व्यय हो रहा है। द्वितीय, इन दलित एवं आदिवासी समाज के वर्गों के प्रधान, सरपंच एवं सदस्यों का क्षमतावर्धन की जाए। तृतीय, उन्हें लगातार ‘मदद’ दी जाए।
स्थानीय स्तर पर संसाधन केंद्र बनाए जाएं, ताकि आर्थिक योजना का प्रारूप सामाजिक न्याय आधारित हो। इस तरह अगर आरक्षण से प्राप्त लाभकारी वर्ग गांव में गरीब लोगों के विकास में कार्य नहीं करते, तो वे 'सोशल-एेक्शन’ में नहीं हैं और समाज का ऋण वापस अर्थात 'पे-बैक' नहीं कर रहे हैं।