राष्ट्रवाद, लोकतंत्र और न्यायपालिका
संसद सत्र के पहले दिन राष्ट्रपति के अभिभाषण से साफ हो गया है कि सरकार ने तीनों कृषि कानूनों पर आंदोलनकारियों के साथ-साथ विपक्ष को आक्रामक जवाब देने की तैयारी कर ली है। कृषि कानूनों और किसान आंदोलन पर राष्ट्रपति के अभिभाषण की पांच बड़ी बातें गौरतलब है। पहली गणतंत्र दिवस के पवित्र दिन और तिरंगे के अपमान को दुर्भाग्यपूर्ण घटना पर राष्ट्रपति की चिंता।उन्होंने कहा, लोकतंत्र में शांतिपूर्ण आंदोलन और अभिव्यक्ति की आजादी का सम्मान है। साथ ही नसीहत दी कि जो संविधान हमें यह अधिकार देता है, वही कानून के पालन के लिए प्रतिबद्ध भी करता है। जाहिर है, आंदोलनकारियों में शामिल उपद्रवियों की लूज गेंद (तांडव) पर सरकार शॉट लगा रही है। दल से बड़ा देश, तिरंगा प्यारा, हिंसा हरगिज बर्दाश्त नहीं, लोकतंत्र और न्यायपालिका में भरोसा। 26 जनवरी को लाल किले पर तांडव से देश शर्मसार है।
राष्ट्रपति के अभिभाषण की एक और बड़ी बात- मेरी सरकार ने दो दशक से उठ रही कृषि सुधारों की मांग को चर्चा के बाद लोकतांत्रिक तरीके से कानूनी जामा पहनाया। जाहिर है कि इसके जरिये सरकार ने इसी सत्र में विपक्ष को जवाब देने की भी पूरी तैयारी कर ली है। तीसरी बड़ी बात यह कि सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सम्मान करती है यानी इन तीनों कृषि कानूनों के अमल पर फिलहाल रोक का सम्मान। राष्ट्रवाद, लोकतंत्र, न्यायपालिका में भरोसा और विपक्ष पर बरगलाने के आरोपों के बूते सरकार न केवल कृषि कानूनों को लेकर मजबूती से आगे बढ़ने का इरादा रखती है बल्कि न्यूनतम समर्थन मूल्य जारी रखते हुए डेढ़ गुना अधिक कीमत पर फसलों की खरीद और किसानों की आय दुगुना करने के लक्ष्य को किसानों के सामने रख रही है। राष्ट्रपति के अभिभाषण और वित्त मंत्री के आर्थिक सर्वे से भी यह साफ संदेश है कि इस बजट में स्वास्थ्य के बाद कृषि पर प्रथामिक और सर्वाधिक फोकस रहने वाला है। आत्मनिर्भर भारत में आत्मनिर्भर कृषि के जरिये छोटे 10 करोड़ किसानों की चिंता। यह महज है कि नए कृषि कानूनों पर सवाल उठाए जा रहे हैं, तभी आईएमएफ ने इन कानूनों से किसानों की माली हालत में सुधार के संकेत दिए हैं।
भले विपक्ष ने संसद सत्र के पहले दिन राष्ट्रपति के अभिभाषण और सर्वदलीय बैठक का बहिष्कार व शोरशराबा कर तीन कृषि कानूनों पर सरकार पर दबाव बनाने का दिखावा किया, लेकिन इससे यह संदेश गया कि विपक्ष रणछोर है। तमाम कोशिशों के बाद फिर 19 विपक्षी दल एकजुट दिखे लेकिन इससे पहले कई ऐसे मौके आ चुके हैं जब 22-22 विपक्षी दल एकजुट रहे हैं। जब यही तीनों कृषि कानून संसद की पटल पर चर्चा में थे, तब भी विपक्ष आज की तरह रणछोर ही था। द्रमुक के सुंदरम ने जरूर मामूली आशंकाएं जताई थी। शिवसेना के अरविंद सामंत ने खुले बाजार का पक्षधर होते हुए स्वागत किया था। सपा के रामगोपाल यादव और बसपा के सतीश मिश्र ने विरोध जताया था। एनसीपी के प्रफुल्ल पटेल ने कहा था, कानून लाने से पहले शरद पवार से चर्चा कर लेते। कांग्रेस के अधीर रंजन चौधरी ने भी माना था कि कांग्रेस ने घोषणा पत्र में खुले बाजार की वकालत की थी। तब अहमद पटेल ने भी एपीएमसी और एमएसपी के साथ मंडियां बढ़ाने की वकालत की थी।
राहुल गांधी कह रहे हैं किसान एक इंच पीछे नहीं हटेंगे और आंदोलन शहर की बढ़ेगा। राहुल शायद कांग्रेस के घोषणा पत्र को भूल गए हों।राष्ट्रपति के अभिभाषण से यह संकेत मिल रहे हैं कि जब धन्यवाद ज्ञापन की बारी आएगी तो संसद में खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन गड़े मुर्दे को उखाड़ कर उस विपक्ष को नंगा कर सकते हैं, जो आज आंदोलकारियों को उकसा कर अपनी सियासी फसल लहलहाने की ताक में हैं। आंदोलनकारियों के तांडव, लोकतंत्र में भरोसा न रखने पर किसान संगठन निशाने पर हो सकते हैं। जब ये तीनों कृषि कानून पारित हुए थे तो भाकियू टिकैत के राकेश टिकैत का भी बयान आया था- किसानों की वर्षों पुरानी मांग पूरी हुई। कृषि कानूनों पर विपक्ष के सवालों पर चर्चा के दौरान कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर भी मजबूती के साथ घेर सकते हैं।
30 जनवरी को गांधी सत्याग्रह उपवास
किसान आंदोलन की नई फिल्डिंग गाजीपुर में सज रही है। 26 जनवरी के तांडव के बाद पलटी बाजी को राकेश टिकैत की गूगली ने फिर क्रीज पर लौटा दिया है। मुजफ्फरनगर की पंचायत में उमड़े सैलाब के बीच नरेश टिकैत ने शनिवार से दिल्ली कूच (गाजीपुर बॉर्डर पहुंचने) का शंखनाद किया है। उधर, सिंघु बॉर्डर पर आंदोलनकारियों और स्थानीय नागरिकों के बीच हिंसक झड़प हुई। तलवारें खींची। लाठी चार्ज और आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े। अलीपुर के एसएचओ समेत कुछ घायल हुए। 30 जनवरी को आंदोलनकारियों ने गांधी की याद में सत्याग्रह (उपवास) का फैसला किया है। पंजाब से बरास्ते हरियाणा कारवां यूपी की ओर बढ़ चला है।
अन्ना हजारे जैसे आंदोलन के मंसूबे को झटका
अन्ना हजारे आंदोलन जैसा किसान आंदोलन खड़ा करने के मंसूबे को झटका लगता दिख रहा है। रालेगण सिद्धी में अन्ना हजारे 30 जनवरी से गांधी की याद में बेमियादी अनशन पर अटल थे जिन्हें फडणवीस के साथ कई नेताओं ने जाकर मना लिया है। केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री कैलाश चौधरी, महाराष्ट्र के पूर्व कृषिमंत्री राधाकृष्ण विखे पाटिल, पूर्व मंत्री गिरीश महाजन और भाजपा के आदिवासी नेता बबन पाचपुते ने 5 घंटे वार्तालाप किया। अन्ना हजारे मान गए।
समर्थन जुटाने की जुगत
आंदोलनकारी अब नए सिरे से समर्थन जुटाने की जुगत में हैं, लेकिन कई किसान संगठन बातचीत से हल के पक्ष में हैं। कोएंबटुर के किसान संगठन का मानना है कि आंदोलन ही समाधान नहीं है। आंदोलनकारियों को सियासी समर्थन से अब परहेज नहीं। यही कारण है कि मुजफ्फरनगर की पंचायत में नरेश टिकैत के साथ चौधरी चरण सिंह की दूसरी पीढ़ी के जयंत चौधरी, आप के संजय सिंह के अलावा सपा-कांग्रेस के कई चेहरे दिखे, तो गाजीपुर बॉर्डर पर राकेश टिकैत के पास दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया पहुंचे। जाहिर है कि आंदोलनकारियों के इस दावे की भी हवा निकली है कि उनका कोई सियासी कनेक्शन नहीं है।
रोमांचः गूगली या हेलिकॉप्टर शॉट
अब मैच में एक तरफ सरकार की टीम है, तो दूसरी तरफ किसान एकादश (यानी विपक्ष समेत)। जिन सियासी दिग्गजों को मोदी के जवाब की चाह है, उन्हें इस संसद सत्र के सुपर ओवर की आखिरी गेंद तक इंतजार करना चाहिए। सुपर ओवर की पहले दिन लूज गेंद पर राष्ट्रपति के अभिभाषण का मॉस्टर स्ट्रोक दिखा है। अब रोमांचक यह है कि संसद सत्र के सुपर ओवर में गिल्ली उड़ती है या हेलिकॉप्टर शॉट लगता है।