लोकसभा में आंध्र प्रदेश पुनर्गठन विधेयक के विरोध में बृहस्पतिवार को जो कुछ हुआ, वह हमारे लोकतंत्र के लिए एक बड़ा धब्बा है। मैं 1977 से संसद की कार्यवाही देख रहा हूं, लेकिन लगभग तीन दशकों के इतिहास में आज तक ऐसा दुर्भाग्यपूर्ण और शर्मनाक वाकया देखने को नहीं मिला था, जैसा कि कल महज दस मिनट के दौरान देखने को मिला। तेलंगाना बिल संसद के पटल पर रखे जाने से पहले ही तेलंगाना एवं सीमांध्र इलाके के सांसद वेल में जाकर हंगामा कर रहे थे।
जैसे ही बिल पेश किया गया, कांग्रेस सांसद एल राजगोपाल ने मिर्च के पाउडर का छिड़काव करना शुरू कर दिया। उनके हाथ में लाइटरनुमा एक छोटी-सी डिबिया थी, जिसमें मिर्च पाउडर था। इससे अफरा-तफरी मच गई, कई सांसद बेहोश होकर गिर भी पड़े। इस अफरा-तफरी में कई सांसदों को चोटें भी आईं। यहां तक कि बीस फीट ऊपर पत्रकार दीर्घा में बैठे मीडियाकर्मियों को भी तकलीफ हुई। इस बीच तेलुगू देशम पार्टी के सांसद वेणुगोपाल रेड्डी के चाकू निकालने की बात भी कही गई, लेकिन उन्होंने इससे इन्कार किया और कहा कि उनके हाथ में माइक था, चाकू नहीं।
बेशक सदन में हंगामा असामान्य नहीं है, लेकिन यह घटना कई मायनों में अप्रत्याशित है। अब तक इस तरह का शोर-शराबा विधानसभाओं में देखने को मिलता था। संसद में ऐसे हादसे बेहद गंभीर और चिंताजनक हैं। अक्सर संसदीय गरिमा की बात की जाती है, लेकिन यह घटना इसलिए भी शर्मनाक है, क्योंकि संसद की गरिमा को खुद सांसदों ने चोट पहुंचाई है। संसद में जब नोटों के बंडल लहराए गए थे, तब भी ऐसी शर्मनाक स्थिति नहीं हुई थी। यह सोचने वाली बात है कि संसदीय कार्य-व्यवहार की ऐसी घटनाओं से विदेशों में कैसी छवि बनेगी? यह संसद के भीतर सांसदों का कबायलियों जैसा व्यवहार है। ऐसी अराजक घटना के बाद कौन-सी विदेशी कंपनी निवेश के लिए राजी होगी?
बृहस्पतिवार को जो कुछ हुआ, उसके लिए यूपीए सरकार एवं लोकसभा अध्यक्ष को जिम्मेदार माना जा सकता है। असल में सदन की कार्यवाही का संचालन ठीक से हो, इसकी जवाबदेही लोकसभा अध्यक्ष की होती है। अध्यक्ष को सदन के संचालन के लिए पर्याप्त शक्तियां दी गई हैं। सदन में पहले भी हंगामे की स्थितियां आई हैं और उसका संचालन लोकसभा अध्यक्ष को करना पड़ा। मुझे लोकसभा के दो अध्यक्षों सोमनाथ चटर्जी और बालयोगी का ध्यान आ रहा है। ये दोनों संसद के संचालन में पक्ष एवं विपक्ष, दोनों का निष्पक्ष भाव से ध्यान रखते थे। मगर मौजूदा लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने बिल पेश करने के समय विपक्ष की अनदेखी कर सरकार का पक्ष लिया। इस बात की खुफिया रिपोर्ट थी कि तेलंगाना से संबंधित बिल पेश किए जाते समय कुछ अप्रिय घटना हो सकती है। इसके बावजूद सरकार फ्लोर मैनेजमेंट में पूरी तरह से विफल साबित हुई।
यह इस लोकसभा का आखिरी सत्र है और कई महत्वपूर्ण विधेयक पारित होने के लिए लंबित पड़े हैं। यूपीए सरकार के दौरान तमाम महत्वपूर्ण विधेयकों पर संसद में बहस के दौरान हंगामा या धक्कामुक्की की स्थिति देखने को मिली है। इस तरह का संकट इसलिए उत्पन्न होता है, क्योंकि इस सरकार के दो केंद्र हैं। एक तरफ यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी हैं, दूसरी तरफ प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह हैं। सत्ता के इन दोनों केंद्रों में अक्सर अंतर्विरोध देखने को मिलते रहे हैं। दूसरी ओर पिछले कुछ वर्षों में देश के दोनों प्रमुख दलों कांग्रेस और भाजपा पर से आम लोगों का भरोसा उठने लगा है, जिससे क्षेत्रीय दलों का तेजी से उभार हुआ। इन दोनों दलों के प्रति आम लोगों के गुस्से ने ही अरविंद केजरीवाल और जगन मोहन रेड्डी जैसे नेताओं को उभरने का मौका दिया है।
सच्चाई यह है कि आज संसद में ऐसा कोई नेता नहीं है, जो सभी दलों के सांसदों को अपने प्रभाव से संयमित रख सके। ऐसे समय में अटल बिहारी वाजपेयी, चंद्रशेखर एवं प्रणब मुखर्जी जैसे नेताओं की याद स्वाभाविक है, जिनका सभी नेताओं के बीच सम्मान था और उनकी बात सभी मानते थे। उन लोगों के रहते ऐसी स्थिति कभी सामने नहीं आई थी। जब तक प्रणब मुखर्जी संसद में थे, उन्होंने यूपीए सरकार के लिए संकटमोचक का काम किया। अगर वह आज होते, तो शायद ऐसी स्थिति नहीं आती। उनमें यह क्षमता थी कि वह रूठे हुए को भी मना लेते थे।
जहां तक तेलंगाना का मामला है, इसे नासूर बनाने का काम भी इसी सरकार ने किया है। कांग्रेस ने अपने 2004 के घोषणापत्र में ही अलग तेलंगाना राज्य के गठन का वायदा किया था, पर वह दस वर्ष तक चुपचाप सोती रही। अब जबकि लोकसभा चुनाव होने वाले हैं, तो उसे अलग राज्य बनाने की जल्दी पड़ी है। अगर उसने कुछ समय पहले ही तेलंगाना पर फैसला कर लिया होता, तो स्थिति इतनी भयावह नहीं होती। लोकसभा चुनाव नजदीक होने के कारण सांसदों को जनता के गुस्से का सीधा खतरा दिख रहा है और उन्हें लगता है कि अगर आंध्र प्रदेश बंट गया, तो उनके राजनीतिक भविष्य पर प्रश्नचिह्न लग जाएगा। यही वजह है कि इस फैसले से प्रभावित होने वाले सांसद हिंसक रवैये पर उतर आए हैं। यह संसदीय परंपरा और लोकतंत्र की मर्यादा के खिलाफ है। यह दुखद है कि हमारे जनप्रतिनिधि ही संसद की मर्यादा का खयाल नहीं रख रहे हैं।
इस घटना के बाद क्या यह विचार नहीं किया जाना चाहिए कि सांसदों का विशेषाधिकार खत्म कर दिया जाए? ऐसा होने पर उन्हें भी संसद में प्रवेश करने से पहले तलाशी से गुजरना होगा, जिससे भविष्य में ऐसी शर्मनाक घटना की पुनरावृत्ति नहीं हो सकेगी।