हीरा नगर व सांबा में आत्मघाती हमले के बाद केरन सेक्टर में 40 आतंकियों का अत्यधिक मात्रा में गोला-बारूद और रसद की खेप लेकर घुसपैठ की कोशिश बताती है कि पाकिस्तान ने 2004 से लागू संघर्ष विराम समझौते को जुलाई, 2013 से बिल्कुल नकार दिया है। हमारा यह पड़ोसी देश कश्मीर घाटी में हिंसा की तपिश बढ़ाने के लिए विदेशी आतंकियों की खेप झोंकने की तैयारी में है।
सीमा पार जैश-ए-मोहम्मद, हिजबुल मुजाहिद्दीन और लश्कर-ए-तैय्यबा जैसे आतंकी संगठनों में तालिबान व अलकायदा के लड़ाकों की भर्ती में वृद्धि की सूचनाएं इसी ओर इशारा कर रही हैं। आखिरकार 2004 के बाद अचानक 2013 में ऐसा क्या हो गया है कि पाकिस्तानी सेना भारत के विरुद्ध इतना बड़ा आतंकी मंसूबा बना रही है? इसका जवाब है, भारत में अगले वर्ष होने वाले लोकसभा चुनाव। विश्व बिरादरी लोकतंत्र और देश की जनता की भागीदारी का अंदाजा चुनावों में जनता के भाग लेने से लगाती है। वर्ष 2004 और 2009 के लोकसभा चुनावों में कश्मीर की जनता ने भारी मतदान करके यह जता दिया था कि कश्मीर भारत का अटूट अंग है और पाकिस्तान को घाटी में दखल नहीं देना चाहिए। लिहाजा इस बार पाकिस्तान की पुरजोर कोशिश चुनाव से कश्मीरियों से अलग रखने की है, ताकि कश्मीर के मुद्दे को वह विश्व मंच पर फिर से भड़का सके।
इस समय पाकिस्तान दुनिया का सबसे बड़ा आतंकी देश है। इसकी मुख्य वजह है, वहां के असली शासक यानी सेना धन कमाने और अपना रुतबा कायम रखने के लिए आतंकवाद का इस्तेमाल बतौर एक हथियार कर रही है। हालांकि धार्मिक कट्टरपन, उन्माद और चहुंओर पसरी गरीबी भी पाकिस्तान में आतंकवाद के फलने-फूलने के कारक हैं। स्थिति यह है कि पाकिस्तान की 70 प्रतिशत जमीन केवल कुछ सौ जमींदार परिवारों के कब्जे में है तथा देहातों के खेतिहर मजदूर, जिनकी संख्या काफी ज्यादा है, गरीबी और अपने आकाओं के रहमोकरम पर गुजारा करते हैं। यह वर्ग आसानी से गरीबी व धार्मिक उन्माद के कारण आतंकी संगठनों के कब्जे में आकर कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार हो जाता है।
अमेरिका व दूसरे यूरोपीय देश, जिनकी जमीनी सीमाएं पाकिस्तान से नहीं लगतीं, वे भी पाक समर्थित आतंकियों से आतंकित हैं। ऐसे में यह समझना मुश्किल नहीं कि भारत, जिसकी 3,000 किलोमीटर लंबी सीमा पाकिस्तान से मिलती है, वह आतंक के किस ढेर पर बैठा है। लेकिन दाद देनी होगी हमारी सेना को, जो इन खतरों से निपटने के लिए सक्षम है। हालांकि दोनों देशों की सेना के चरित्र में एक बड़ा अंतर है। भारत सरकार पाकिस्तान से संबंध सुधारने की आशा में सेना को संयम बरतने की सलाह देती रही है, जबकि पाकिस्तान की सेना वहां की सरकार से आदेश लेने के बजाय अपनी सुविधानुसार काम करती है। वर्ष 2002 का संसद हमला, 2008 का मुंबई हमला जैसी आतंकी घटनाएं वहां की सेना और सरकारी तंत्र की मदद के बगैर संभव ही नहीं है। लेकिन विद्रूप है कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बेनकाब होने के बाद भी पाकिस्तान के हुक्मरान अनभिज्ञता और बेचारापन जाहिर करते आए हैं। वैसे देखा जाए, तो पाक सरकारें बेचारी ही हैं, क्योंकि वहां तो सत्ता की कमान सेना व आईएसआई के हाथों में है, जिसका फायदा उठाकर पाक सेना भारत पर प्रत्यक्ष और परोक्ष आक्रमण करती है।
हालांकि पाकिस्तानी सेना जब आमने-सामने की लड़ाई में पार नहीं पाती, तो भारतीय सेना को बदनाम करने का दूसरा तरीका भी खूब अपनाती है। बेशक जब से जनरल जिया उल हक ने 1979 में कश्मीर में आतंकवाद को बढ़ावा देना शुरू किया, तभी से फॉर्सेज सिक्योरिटी ऐक्ट के तहत भारतीय सेना वहां पर तैनात है। लेकिन पाकिस्तानी सेना आज भी कश्मीर के युवाओं को बरगलाने का काम कर रही है। इतना ही नहीं, वह भारतीय सेना पर झूठे आरोप लगाकर, मानवाधिकार उल्लंघन का झूठा दावा कर हमारी सेना की छवि खराब करने की कोशिश कर रही है। लेकिन हमारे पड़ोसी देश को समझना चाहिए कि जिस जोश और जुनून से भारतीय सेना अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर रही हैं, उसमें कश्मीर में उसके लिए कोई जगह नहीं।