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पाकिस्तान का पांचवां मौसम

मरिआना बाबर Updated Fri, 24 Nov 2017 08:54 AM IST
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पाकिस्तान में धुंध
प्रकृति को सरहदों से प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता और न ही इसे पूरे उप-महाद्वीप में यात्रा करने के लिए किसी वीजा की जरूरत होती है। वास्तव में प्रकृति एक स्वतंत्र एजेंट है और इस क्षेत्र, खासकर भारत और पाकिस्तान के नेता जितनी जल्दी इसे समझ लें, उनके नागरिकों के स्वास्थ्य और दीर्घायु जीवन के लिए उतना ही बेहतर होगा। पिछले कई वर्षों से दोनों मुल्कों के आपसी रिश्ते अभी सबसे निचले स्तर पर हैं, तो क्या प्रकृति हमारी भावी पीढ़ियों का जीवन बचाने के लिए भारत और पाकिस्तान को बातचीत की मेज पर लाने के लिए कारण बन सकती है?


धुंध की स्थिति, जिसे पाकिस्तान में पांचवां मौसम माना जाता है, इस सर्दी में काफी गंभीर हो गई है, मानो यह प्रदूषण प्रकृति से छेड़छाड़ के लिए मानव जाति के खिलाफ प्रकृति का बदला हो। लेकिन सबसे अक्षम्य और आपराधिक बात यह है कि पाकिस्तान की हुकूमत ने इसके लिए कोई तैयारी नहीं की और यहां तक कि लाहौर जैसे ़शहरों में लोगों का दम घुट रहा है। लगता है कि यहां मौजूद छह वायु निगरानी केंद्र बंद पड़े हैं और सरकार ने उन्हें चालू करने के प्रति उपेक्षा दर्शाई।


पूर्वी और पश्चिमी पंजाब के किसान पारंपरिक रूप से वर्षों से फसलों के अवशेष जलाते रहे हैं, ताकि अगली फसल के लिए खेत की तैयारी कर सकें। दोनों मुल्कों की सरकारों को आगे बढ़कर किसानों की समस्याओं का समाधान करना होगा। आखिरकार यह दो मुल्कों की जिम्मेदारी है कि वे इसका समाधान और उपाय तलाशें, ताकि किसान मौसमी फसलों के अवशेष न जलाएं।


उम्मीद है कि एक बड़ा मुल्क होने के नाते सैकड़ों विशेषज्ञों और सलाहकारों के साथ संसाधन संपन्न भारत इस वर्ष फसलों के अवशेष जलाने की समस्या का कोई हल ढूंढ लेगा। हम पाकिस्तान के लोग भी उससे सबक सीख सकते हैं और यहां की हुकूमत पर भारत की भावी नीति को अपनाने के लिए दबाव बना सकते हैं। जैसा कि हम साल-दर साल देखते हैं कि जब हवा पश्चिम से पूरब या पूरब से पश्चिम की ओर बहती है, तब प्रकृति पर रोक नहीं लगाई जा सकती। इसलिए पाकिस्तान की हुकूमत की यह शिकायत है कि सीमा के इस पार धुंध इसलिए है, क्योंकि भारतीय पंजाब के किसान फसलों के अवशेष जलाते हैं, यह बहाना पर्याप्त ढंग से ठीक नहीं है, क्योंकि हवा के रुख में बदलाव के बाद यहां की धुंध भारतीय पंजाब में प्रवेश करती है।


मैं इस मुद्दे की गंभीरता को लेकर हैरान हूं। जब लाहौर में पाकिस्तानी पंजाब के पर्यावरण मंत्री जकिया शहनवाज ने भारतीय पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह को यह प्रस्ताव दिया कि दोनों मुल्कों को धुंध घटाने के लिए सार्क की छतरी तले योजना तैयार करनी चाहिए, तब भारत की तरफ से चुप्पी साध ली गई। आने वाले वर्षों में यह समस्या भारत या पाकिस्तान तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि पूरा सार्क क्षेत्र इससे प्रभावित होगा।


ऐसे में राजनीति को थोड़ी देर के लिए किनारे रखकर खास तौर पर पर्यावरण संबंधी मुद्दों पर एक विशेष सार्क सम्मेलन आयोजित करना चाहिए, जहां सभी सदस्य मुल्कों के जलवायु परिवर्तन से संबंधित विशेषज्ञ स्वच्छ भविष्य के लिए कोई रास्ता निकाल सकें। वर्ष 1989 में सच्चे राजनेता थे, जब दोनों मुल्कों ने लाहौर में प्रकृति संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय संघ नामक सम्मेलन में हिस्सा लिया था। लाहौर से प्रकाशित होने वाले द डेली टाइम्स ने लिखा है, 'अब भी देर नहीं हुई है। हम उम्मीद करते हैं कि भारतीय संसद और नागरिक समाज के कुछ अच्छे लोग मोदी सरकार को छोटी-छोटी सफलता दिलाने वाले फॉर्मूले को छोड़ने का आग्रह करेंगे। पर्यावरण की सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन की तैयारी के लिए क्षेत्रीय मुल्कों को एक साथ काम करने के लिए राजी करने में सार्क को एक प्रमुख भूमिका निभाने की जरूरत है। दक्षिण एशिया में रहने वाले एक अरब से ज्यादा लोग एक बेहतर भविष्य के हकदार हैं।'


नई दिल्ली में कम से कम यह तो पढ़ने और देखने को मिल रहा है कि दिल्ली सरकार इस बात को महसूस कर रही है कि प्रदूषित हवा के कारण हजारों भारतीय मर रहे हैं। लेकिन दुर्भाग्य से पाकिस्तान में लोगों में इसके प्रति कोई जागरूकता नहीं है और पीएमएल (एन) सरकार धुंध के घातक मुद्दे को गंभीरता से लेने के बजाय आगामी अगस्त के आम चुनाव तक अपना अस्तित्व बचाने में व्यस्त है। दिल्ली में जहां दिवाली में पटाखों पर प्रतिबंध लगा दिया गया, वहीं रावलपिंडी में स्थिति अलग है। यहां आतिशबाजी पर कोई रोक नहीं है, जिससे पता चलता है कि शादी का मौसम शुरू हो रहा है।
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भारी सर्दी में, खासकर रात के समय लोग आग जलाते हैं, क्योंकि लोग खुद को गर्म रखने की कोशिश करते हैं। यहां की हुकूमत ने लोगों में इस संबंध में जागरूकता फैलाने की जिम्मेदारी से भी पल्ला झाड़ लिया है कि ऐसी छोटी-छोटी आग भी हवा को प्रदूषित करती है। कई दिनों से निगरानी केंद्र के प्रदूषण संकेतक बता रहे हैं कि लाहौर की हवा नई दिल्ली से ज्यादा प्रदूषित है, लेकिन शहबाज शरीफ सरकार ने कोई चेतावनी या सलाह जारी नहीं की है, क्योंकि वह विकास कार्य करने में व्यस्त है, जिसके चलते इस सर्दी में लाहौर का दम घुट रहा है। अंतरराष्ट्रीय वायु गुणवत्ता नियंत्रण के अनुसार स्वच्छ हवा वह है, जब इलाके को 'हरा' दिखाया जाता है, जबकि 'बैंगनी' और 'भूरे' रंग से दिखाए गए इलाके की हवा 'खतरनाक' होती है। लाहौर और दिल्ली, दोनों शहरों की हवा लगातार खतरनाक रूप से प्रदूषित है। जबकि रावलपिंडी की हवा हाल में आई आंधी और बारिश के कारण थोड़ी बेहतर है। मुझे नहीं लगता कि कुछ समय बाद पाकिस्तान के औद्योगिक शहरों की हवा स्वच्छ हो जाएगी।


पिछले पांच वर्षों से इस्लामाबाद में द हिंदू का प्रतिनिधित्व कर रही मेरी प्रिय मित्र निरुपमा सुब्रमण्यम ने हाल ही में लिखा, 'आज अगर सआदत हसन मंटो जिंदा होते, तो एक छोटी-सी कहानी लिखते कि किस तरह विश्वास बहाली के उपाय के रूप में भारत और पाकिस्तान धुंध के आदान-प्रदान पर सहमत हो गए हैं।'
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