जैसे ही भारत सरकार मृतकों और घायलों को निकालने के लिए आगे बढ़ी, मुझे याद आया कि दक्षिण एशिया के देश कितने भी बड़े और ताकतवर क्यों न हों, स्वास्थ्य सहायता प्रणाली पर्याप्त नहीं है, जैसा कि कोविड-19 के समय भी देखा गया था। अन्य परियोजनाओं पर लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं, लेकिन हम दक्षिण एशियाई लोग महसूस करते हैं कि बड़ी आबादी के कारण हमारी स्वास्थ्य सहायता प्रणाली इतनी बड़ी आपात स्थिति के समय स्वास्थ्य सहायता उपलब्ध कराने की दृष्टि से पर्याप्त मजबूत नहीं है। इसमें सबसे पहले प्रतिक्रिया करने वाले, तकनीकी कर्मचारी, चिकित्सा कर्मचारी और मृतकों एवं घायलों को स्थानांतरित करने के लिए तुरंत एंबुलेंस हासिल करना शामिल है। सेनाएं हर जगह बहुत जल्दी व कुशलता से फील्ड हॉस्पिटल स्थापित कर लेती हैं। उन्हें ऐसे समय में मदद के लिए आगे आना ही होगा, क्योंकि वक्त पर चिकित्सा सहायता मिलने से जान बचाने में मदद मिलती है।
पाकिस्तान में भी बहुत दुखद ट्रेन दुर्घटनाएं हुई हैं। आम तौर पर साधारण लोग ही रेलवे का सबसे अधिक फायदा उठाते हैं, क्योंकि यह परिवहन के अन्य साधनों की तुलना में सबसे कम खर्चीला है।
अब यह भारत सरकार पर निर्भर है कि वह इस हादसे के कारणों की जांच करके उसे सार्वजनिक करे और यह सुनिश्चित करे कि भविष्य में इसे रोका जा सकता है। यह एक ऐसा क्षेत्र है, जिसमें पाकिस्तान और भारत एक-दूसरे का सहयोग कर सकते हैं और परस्पर सीख सकते हैं, हालांकि भारतीय रेल प्रणाली पाकिस्तान से बहुत बड़ी है। अंग्रेजी दैनिक द डॉन ने अपने संपादकीय में लिखा है, 'वास्तव में रेलवे सुरक्षा एक ऐसा क्षेत्र है, जहां पाकिस्तान और भारत यह देखते हुए आपस में सहयोग कर सकते हैं कि दोनों को रेलवे एक ही उपनिवेश से विरासत में मिला है, हालांकि भारतीय रेल नेटवर्क पाकिस्तान से आगे निकल गया है।' लेकिन इस तरह के सहयोग के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ-साथ ऐसे नेतृत्व की भी जरूरत है, जो दोनों तरफ से रोजमर्रा की बयानबाजी से ऊपर उठ सके। फिलहाल ऐसा नेतृत्व मुझे नजर नहीं आता, क्योंकि दोनों तरफ राजनीति ही सब कुछ तय करती है।
बहरहाल पाकिस्तान की राजनीति पहले की तरह ही है और अटकलें लगाई जा रही हैं कि आगामी अक्तूबर या नवंबर में देश में आम चुनाव होंगे, क्योंकि अगस्त में संसद के निचले सदन का विघटन तय है। संविधान के अनुसार ऊपरी सदन सीनेट कायम रहेगा।
पाकिस्तान में इतिहास बनाया जा रहा है, जहां हर दिन पाकिस्तान तहरीक-ए इंसाफ (पीटीआई) छोड़ने वाले नेताओं और समर्थकों की संख्या बढ़ती जा रही है। ऐसे लोगों में से कुछ का कहना है कि उन्होंने बहुत राजनीति कर ली है, जबकि कुछ अन्य लोग पीटीआई भले छोड़ रहे हैं, लेकिन वे राजनीति में रहेंगे। नौ मई को हुई दुखद लूटपाट और आगजनी की घटनाओं में, जिनमें पीटीआई समर्थकों ने सैन्य सहित अन्य सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया था, हिस्सा न लेने वाले पीटीआई समर्थक भी डरे हुए हैं। पीटीआई प्रमुख इमरान खान ने पहले ही चेतावनी दे दी थी कि अगर उन्हें गिरफ्तार किया गया, तो मुल्क को उनकी पार्टी से बड़ी जवाबी प्रतिक्रिया के लिए तैयार रहना चाहिए।
जैसी कि उम्मीद थी, सुरक्षा प्रतिष्ठान ने इसे बेहद गंभीरता से लिया है और असैन्य सरकार की सहमति से यह फैसला लिया है कि नौ मई को हुई आगजनी और लूटपाट मामले में जेलों में बंद महिलाओं सहित सभी अभियुक्तों की सुनवाई सैन्य अदालत में होगी। ये सभी मध्यवर्ग या निम्न मध्यवर्ग की महिलाएं नहीं हैं। उनमें से एक अमेरिका की दोहरी राष्ट्रीयता वाली प्रसिद्ध फैशन डिजाइनर खदीजा शाह हैं। वह पूर्व सेना प्रमुख जनरल जंजुआ की पोती और पूर्व वित्तमंत्री की बेटी भी हैं। नागरिक समाज ने नागरिकों को सैन्य अदालत भेजने के लिए सरकार की निंदा की है और मांग की है कि इन अभियुक्तों के खिलाफ मामले की सुनवाई सामान्य अदालतों में हो। मगर सबसे बड़ा सवाल है कि पीटीआई के सैकड़ों समर्थक पार्टी क्यों छोड़ रहे हैं।
अतीत में, खासकर मार्शल लॉ के दौरान सैन्य सरकारों का उत्पीड़न देखा गया था, जब पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के अध्यक्ष जुल्फिकार अली भुट्टो को सर्वोच्च न्यायालय ने फांसी पर लटका दिया था। फिर भी पार्टी बरकरार रही और किसी ने पार्टी नहीं छोड़ी। फिर एक और सैन्य तानाशाह जनरल परवेज मुशर्रफ के कार्यकाल में पाकिस्तान मुस्लिम लीग नवाज के प्रमुख मियां नवाज शरीफ को जीवन भर के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया और वह निर्वासित होकर लंदन में रहने लगे। लेकिन उनकी पार्टी भी बरकरार रही और किसी ने पार्टी नहीं छोड़ी।
सवाल यह भी उठ रहा है कि पीटीआई एक आंदोलन है या राजनीतिक पार्टी। इस बारे में एक राजनीतिक विश्लेषक का कहना है कि पीटीआई राजनीतिक पार्टी नहीं है और न कभी रही है। सत्ता मिलने के बाद आंदोलन अक्सर विफल हो जाते हैं, क्योंकि सरकार या देश चलाना आंदोलन चलाने से अलग होता है।
हकीकत यह है कि इमरान खान अब भी एक लोकप्रिय नेता हैं, पाकिस्तान के भीतर और बाहर उनके काफी समर्थक हैं। खबरें बताती हैं कि इमरान खान को भी सैन्य अदालत में सुनवाई का सामना करना पड़ सकता है। अगर ऐसा होता है, तो यह एक बड़ी गलती होगी, क्योंकि उनकी राजनीतिक शैली का समर्थन न करने वाले लोग भी उनके समर्थन में आ सकते हैं। इसलिए सुरक्षा प्रतिष्ठान और शाहबाज सरकार चुनाव में इमरान खान को अपनी ताकत साबित करने दें और जनता को यह फैसला करने दें कि वह उन्हें चाहती है या नहीं।