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खतरनाक है पड़ोस की परमाणु जुगलबंदी

Tue, 29 Oct 2013 07:06 PM IST
रहीस सिंह
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चीन का भारत से रिश्ता किस कोटि में आता है-मित्रता की या शत्रुता की, चीन दक्षिण एशिया की शांति व स्थिरता में सहयोग करना चाहता है या इसके विरुद्ध कार्य करना चाहता है, चीन पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम में तेजी लाकर परमाणु प्रतिस्पर्धा बढ़ाना चाहता है या फिर इस प्रतिस्पर्धा को समाप्त करना चाहता है...चीन द्वारा पाकिस्तान को दो और परमाणु संयंत्र बेचने के निर्णय के बाद चीन के विषय में ऐसे बहुत सारे सवाल उठने लगे हैं।
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चीन परमाणु प्रसार द्वारा दक्षिण एशिया में असुरक्षा की जिस भावना को जन्म देने का कार्य कर रहा है, उसे लेकर दुनिया चिंतित हो या न हो, लेकिन भारत के लिए यह गंभीर चिंता का विषय है। भारत की तरफ से चीन के इस निर्णय पर अंतरराष्ट्रीय मंचों से आपत्ति भी जताई गई है, लेकिन क्या भारत ऐसी स्थिति पैदा कर पाया है, जिससे चीन अपने इस निर्णय को वापस लेने के लिए विवश हो?

चीन पाकिस्तान के साथ परमाणु सौदे के तहत दो और परमाणु संयंत्र देने जा रहा है। इसके सौदे के तहत चीन स्वदेश निर्मित 1,100 मेटगावॉट न्यूक्लियर रिएक्टर्स की शृंखला ‘एसीपी 1000’ को पहली बार किसी दूसरे देश (पाकिस्तान) को बेच रहा है। इस परियोजना के तहत 9.6 अरब डॉलर (लगभग 49,404 करोड़ रुपये) की लागत से कराची के नजदीक केएएनएनयूपी 2 और 3 संयंत्र स्थापित किए जाएंगे।
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भारत ने उच्च स्तरीय आधिकारिक बैठकों के दौरान चीन के सामने यह मुद्दा उठाया। भारत ने यह दलील रखी है कि यह करार परमाणु अप्रसार देशों के समूह और परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह के सदस्य के तौर पर चीन की अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं के विपरीत है। भारत ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि चीन द्वारा पाकिस्तान को परमाणु सहयोग मजबूत करने का असर भारत की सुरक्षा पर पड़ेगा। इसका कारण यह है कि पाकिस्तान अपने असैन्य कार्यक्रम को सैन्य कार्यक्रम से अलग रखने को लेकर प्रतिबद्ध नहीं है।

इसके विपरीत चीन यह दलील दे रहा है कि उसका परमाणु सहयोग चीन-पाक परमाणु सहयोग समझौते के तहत ही आता है। एक अहम प्रश्न यह है कि क्या उस स्थिति में भी, जब पाकिस्तान सैन्य और असैन्य परमाणु कार्यक्रम को अलग-अलग रखने के लिए अपनी प्रतिबद्धता न प्रकट कर रहा हो, तब भी चीन द्वारा परमाणु रिएक्टर प्रदान करना एनपीटी के अनुच्छेद छह का सीधा-सीधा उल्लंघन नहीं है?

अब तक की सूचनाओं के अनुसार पाकिस्तान पहले से ही अपने परमाणु कार्यक्रम को तेज किए हुए है। जाहिर है, नए दो नाभिकीय संयंत्रों के बाद यह प्रक्रिया और भी तेज हो जाएगी। इस समय उसके पास करीब 100 नाभिकीय हथियार हैं, जिन्हें वह लगातार बढ़ाने की कोशिश में है। सीआईए के ‘वीपन्स ऑफ मास डिस्ट्रक्शन’ तथा ‘एनर्जी डिपार्टमेंट’ के डायरेक्टर ऑफ इंटेलिजेंस के मुताबिक, पाकिस्तान अगले दस वर्ष में 50 से 100 नाभिकीय बमों संबंधी अनुमानों की अपेक्षा कम से कम दो गुना न्यूक्लियर हथियार बना लेगा।

एक बड़ा सवाल यह भी है कि अमेरिका और चीन पाकिस्तान के नाभिकीय कार्यक्रम की तरफ से आंखें ही नहीं मूंदे रहे, बल्कि उसे यथासंभव मदद देते रहे, क्यों? एड्रियन लेबी और क्लार्क स्टार्क की पुस्तक डिसेप्शन पाकिस्तान द यूनाइटेड स्टेट्स ऐंड द ग्लोबल वेपन कांसिपिरेसी बताती है कि जिमी कार्टर से लेकर राष्ट्रपति बुश तक के नेतृत्व वाली सभी सरकारों ने हमेशा पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम पर अपनी आंखे मूंदे रखीं।

अमेरिकी सरकारें इस तथ्य से भलीभांति परिचित थीं कि पाकिस्तान को हर साल मिलने वाली आर्थिक मदद का एक बड़ा हिस्सा चोरी-छिपे रक्षा कार्यक्रमों पर खर्च किया जाता है।

बहरहाल, यह सर्वविदित है कि पाकिस्तान के परमाणु हथियार सबसे अधिक असुरक्षित हैं। इससे भी बड़ी बात यह है कि पाकिस्तान की सेना भारत को दुश्मन नंबर एक और चरमपंथी सनातन शत्रु मानते हैं। एक अहम तथ्य यह भी है कि यदि पाकिस्तान में फौज निर्णायक व सबसे बड़ी ताकत है, तो चीनी सरकार का नजरिया भी सैन्य तानाशाही जैसा है। इसलिए इन दोनों की जुगलबंदी आने वाले दिनों में दक्षिण एशिया की स्थिरता और शांति को खतरे में डाल सकती है।
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