यह बार-बार दोहराया जाने वाला विषय है, जिस पर अनेक बार लेख प्रकाशित हुए हैं और अब भी हो रहे हैं। पर यह शीशे की तरह साफ है कि तहरीक-ए तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी), तहरीक-ए तालिबान अफगानिस्तान (टीटीए), अल कायदा और अब इस्लामिक स्टेट (आईएस या दाइस) से जुड़े पंजाबी जेहादी समूह के हाथों हजारों पाकिस्तानियों के मारे जाने के बावजूद पाक सुरक्षा प्रतिष्ठान नागरिकों की परवाह नहीं करता।
पिछले हफ्ते बलूचिस्तान के क्वेटा में एक वरिष्ठ वकील जहंजेब अल्बी की हत्या कर दी गई। यह सुरक्षा और खुफिया तंत्र की विफलता थी, जहां घात लगाकर हत्या या आत्मघाती बम धमाके के बाद एक दूसरा बड़ा हमला हुआ, जब वहां लोग इकट्ठा थे। इस मामले में सिविल अस्पताल के आपातकालीन द्वार पर सैकड़ों वकील जमा थे, जहां मृतक वकील की लाश लाई गई थी। कुछ ही मिनटों में एक आत्मघाती हमलावर ने विस्फोटकों से भरी अपनी जैकेट के साथ सुरक्षा घेरे के बीच घुसकर हलचल मचा दी और खुद को उड़ा लिया। नतीजतन 70 लोगों की मौत हो गई और दर्जनों घायल हो गए। इस हमले की जिम्मेदारी टीटीपी और आईएस से जुड़े एक गुट ने ली है। यह कोई रहस्य नहीं है कि लश्कर-ए झंगवी जैसे सुन्नी पंजाबी जेहादी संगठन के टीटीपी से करीबी रिश्ते हैं। लेखक और पत्रकार जाहिद हुसैन बताते हैं, 'अल कायदा और आईएस के पदचिह्न पाकिस्तान में उभरे हैं। इन वैश्विक आतंकवादी नेटवर्क को स्थानीय सुन्नी आतंकी समूहों के रूप में सहयोगी मिल गया है। यह प्रांत आईएस भर्ती का एक प्रमुख स्थल बनकर उभरा है।'
पाकिस्तान के लेखकों की दलील है कि देश का सुरक्षा प्रतिष्ठान कुछेक पंजाबी जेहादी गुटों के खिलाफ ही कार्रवाई करता है, जिसके चलते प्रतिबंधित संगठन के आतंकी नाम बदलकर खुलेआम घूमते रहते हैं। कुछेक आतंकियों को गिरफ्तार किया गया, पर जल्दी ही उन्हें जमानत पर छोड़ दिया गया।
मुंबई आतंकी हमले जैसे कई मामलों की सुनवाई यहां लंबे समय से खिंच रही है, जिनमें कई जजों को बदल दिया गया, और अनेक गवाहों ने गवाही देने से इन्कार कर दिया, क्योंकि सरकार ने उन्हें सुरक्षा मुहैया नहीं कराई। मरहूम गवर्नर सलमान तासीर की हत्या जैसे कई हाई प्रोफाइल मामलों में वकीलों और जजों ने सुरक्षा की मांग की है, क्योंकि जेहादी गुटों से उन्हें धमकी मिली है। बलूचिस्तान के पश्तुन राष्ट्रवादी नेता मेहमूद खान अचकजई ने नेशनल एसेंबली में सरकार से कहा कि आतंकी हमलों के लिए भारत, अफगानिस्तान या इस्राइल पर दोष मढ़ने से बलूचिस्तान के लोग संतुष्ट नहीं होने वाले। 'अगर विदेशी एजेंसियां ऐसा करती हैं, तो पाक खुफिया एजेंसी क्या कर रही है? वह हमें क्यों नहीं बचा रही? अगर हम मृतकों के लिए प्रार्थना करने और उन्हें दफनाने का ही काम कर सकते हैं, तो मैं निचली सदन का हिस्सा बनने से इन्कार करता हूं।'
भारत सहित तमाम विदेशी सरकारों ने पाकिस्तान से मांग की है कि इन पंजाबी जेहादियों को गिरफ्तार कर जेल में डालना चाहिए, क्योंकि ये उनके मुल्क में आतंकवादी गतिविधियों में शामिल रहे हैं, जैसे पठानकोट एयरबेस पर हुए हमले में। इस्लामाबाद ने भी माना कि उसमें पाकिस्तान के पंजाब प्रांत से फोन किए गए थे। फिर जब भारत के गृह मंत्री इस्लामाबाद आए, तो इन जेहादियों को इस्लामाबाद एक्सप्रेस-वे पर प्रदर्शन करने की इजाजत दी गई और भारतीय मंत्री को हेलीकॉप्टर से होटल जाना पड़ा। नई दिल्ली जिस तरह से कश्मीर में स्थिति से निपट रही है, उसे लेकर भारत और पाकिस्तान, दोनों जगहों पर सरकार की आलोचना हो रही है, क्योंकि पैलेट गन के इस्तेमाल के कारण बहुत आंखों की रोशनी चली गई। बेशक कश्मीर या किसी अन्य मुद्दे पर राजनयिक स्तर पर आलोचना और विरोध हो सकता है, पर क्या कोई मुल्क प्रतिबंधित आतंकियों को सड़कों पर प्रदर्शन और ट्रैफिक बाधित करने की इजाजत दे सकता है, वह भी तब, जब गणमान्य अतिथि आ रहे हों?
यह कोई बहाना नहीं है कि अफगानिस्तान और भारत भी पाकिस्तान के खिलाफ काम करने वाले लोगों को प्रश्रय देता है। दूसरे देश जो कर रहे हैं, पाकिस्तान को उससे ऊपर उठना होगा और अपने आंगन को अपराधियों-आतंकवादियों से मुक्त करके उदाहरण पेश करना होगा। पाकिस्तान और पाकिस्तानियों की जान की खातिर उसे इन जेहादियों को रोकना होगा। बेशक इसकी प्रतिक्रिया में कहा जाएगा कि सेना ने उत्तरी वजीरिस्तान में कार्रवाई की, पर यह वह कीमत है, जो अतीत की गलत नीतियों के कारण चुकानी पड़ी है।
ये पंजाबी जेहादी सीमापार आतंकी हमलों में जितने लोगों को मारते हैं, उससे ज्यादा पाकिस्तानियों को मारते हैं। हमारे सुरक्षा प्रतिष्ठानों को समझना चाहिए कि ये आतंकी सिर्फ पैसे और अधिकारों के लिए काम करेंगे, इसलिए इन्हें खत्म करना ही होगा। यदि आप बलूचिस्तान के लोगों को मुख्यधारा से अलग रखेंगे, तो वहां जो शून्य पैदा होगा, उसका फायदा दूसरे लोग उठाएंगे ही। इस पर रोक तभी लगेगी, जब सत्ता प्रतिष्ठान यह दिखाए कि आतंकियों के लिए विदेशों से पैसा और प्रशिक्षण प्राप्त कर आतंकी हमलों को अंजाम देना मुश्किल है। दक्षेस देशों को यह मानना होगा कि वे अकेले आतंकवाद से नहीं लड़ सकते, क्योंकि पूरे विश्व में ये आतंकी गुट एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इन पर नियंत्रण तभी होगा, जब सभी देश एक साथ बैठकर इस मसले पर विचार करें।
अफगानिस्तान, भारत और पाकिस्तान में आईएस का खतरा मंडरा रहा है। समय बीत रहा है, लेकिन हम अपने आतंकियों को इस उम्मीद में बचा रहे हैं कि वे हमें नुकसान नहीं पहुंचाएंगे, बल्कि विदेशों में अपनी गतिविधियां चलाएंगे। आईएस ने पूरी दुनिया में हड़कंप मचा दिया है, और हम उसके आसान शिकार हैं। यही समय है कि आतंकवादियों को यह संदेश दिया जाए कि बस, बहुत हो चुका, अब पाकिस्तान अपने आंगन से आतंकवादियों का सफाया करेगा और इसके लिए दक्षेस देशों से हाथ मिलाएगा।
लेखिका पाकिस्तान की वरिष्ठ पत्रकार हैं