पाकिस्तान में इमरान खान की सरकार को कायम हुए नौ महीने हो गए हैं, पर अभी तक उन्हें बहुत से बुनियादी मामले समझ में नहीं आ सके। सत्ता संभालते ही उन्होंने वादा किया था कि वह अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के पास मदद मांगने किसी भी सूरत में नहीं जाएंगे। पर पाकिस्तान के आर्थिक हालात इतने बदतर हो गए कि उन्हें आईएमएफ की शरण में जाने के लिए मजबूर होना पड़ा। आर्थिक तंगी से जूझ रहे पाकिस्तान को कड़े मापदंडों के साथ छह अरब डाॅलर का बेलआउट पैकेज तो मिल गया है, पर इसके बाद भी उसकी आर्थिक हालत बदलने की उम्मीद नजर नहीं आ रही। आशंका जताई जा रही है कि पाकिस्तान इस मदद से चीन व अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं का भारी कर्ज उतारेगा।
सरकार को अपने पहले साल में 19 अरब का कर्ज चुकाना है। पर ऐसा नहीं हो सका। उसके विदेशी मुद्रा कोष का भंडार सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है। दरअसल आईएमएफ और पाकिस्तान के बीच पैकेज के मसौदे पर दस्तखत करने से पहले ही टैक्स छूट के खात्मे और गैस व बिजली की कीमतों में बढ़ोतरी पर सहमति बन गई थी, जिससे लोगों पर 340 अरब रुपये का बोझ पड़ेगा।
परिसंपत्तियों का निजीकरण होगा और पिछले दरवाजे से अवमूल्यन करना पड़ेगा, जिससे और भी सख्त कदम उठाने होंगे। इससे आम पाकिस्तानी का जीना मुश्किल हो जाएगा। पैकेज के तहत पाकिस्तान को कर्ज तीन साल के दौरान मिलेगा। इससे आर्थिक संकट से जूझ रहे पाक के आधारभूत ढांचे और कर्ज की देनदारी में सुधार की उम्मीदों को लेकर चिंताएं और बढ़ेंगी। पाक मीडिया में इसकी आलोचना शुरू हो गई है। अखबार लिख रहे हैं कि आईएमएफ के पैकेज ने लाखों लोगों पर जो आर्थिक बोझ डाला है, उसके नतीजे जल्दी सामने आएंगे। आईएमएफ डील होने के कारण ही अर्थव्यवस्था डगमगाती दिख रही है। रुपया डॉलर के मुकाबले 148-150 रुपये तक पहुंच गया है। महंगाई आसमान छू रही है। इमरान खान ने लोगों को सब्र से काम लेने के लिए कहा है।
आगामी 18 जून को वहां बजट पेश होना है। चूंकि आईएमएफ ने पाकिस्तान के सामने बेहद मुश्किल शर्त रखी है, इसलिए यह बजट पाक अधिकारियों की वित्तीय रणनीति की पहली अग्निपरीक्षा होगा। इस बजट में राजस्व में बढ़ोतरी, टैक्स में दी जा रही छूट में कटौती जैसे कदमों से प्राथमिक घाटा जीडीपी का 0.6 प्रतिशत करने का लक्ष्य पूरा करना होगा। इसके साथ ही पाकिस्तान को अपने खर्च पर भी लगाम लगानी होगी। आम ख्याल यह है कि इमरान खान की सरकार अगर इन शर्तों पर अमल करेगी, तो उसे जनता के भारी रोष का सामना करना पड़ेगा।
बड़े पैमाने पर उखाड़-पछाड़ के मामलों ने और उलझा दिया है। वित्त मंत्री, स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान के गवर्नर और संघीय राजस्व बोर्ड के अध्यक्ष को हटा दिए जाने से इन संस्थाओं का भरोसा कमजोर हुआ है। उससे पहले इमरान खान ने अपने मंत्रिमंडल में रद्दोबदल की थी। किसी से एक विभाग नहीं चल सका, तो उसे दूसरा विभाग दे दिया गया। इससे भी कामकाज में कोई सुधार नहीं आया है। इससे जनता का इमरान खान से मोहभंग होता जा रहा है।
पाकिस्तान में ऐसे लोगों की कमी नहीं, जिनका मानना है कि मुल्क परोक्ष रूप से राष्ट्रपति शासन की ओर बढ़ रहा है। वहां मध्यावधि चुनाव की भी चर्चा जारी है। इमरान खान को अगर अपनी सरकार को नाकामी से बचाना है, तो जरूरी है कि वह तुरंत जनता को आर्थिक राहत देने का बंदोबस्त करें। इसके बगैर वह मुल्क की डूबती नैया को नहीं बचा पाएंगे।