पाकिस्तान के इतिहास में जनरल अयूब खान के बाद भारत के साथ तनाव के बीच जनरल मुनीर को पदोन्नत करना एक रणनीतिक जरूरत से अधिक सावधानीपूर्वक तैयार किया गया जनसंपर्क अभियान है। यह पाकिस्तानी पैटर्न के अनुरूप है, जब आलोचना का समय आता है, तो वीरता की नई कहानी गढ़ी जाती है।
इस बार पाकिस्तान द्वारा ड्रोन, मिसाइल क्षमताओं और साइबर युद्ध के माध्यम से भारत को ‘चतुराई से मात’ देने की कहानी गढ़ी गई है। पाकिस्तानी सरकारी मीडिया इसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता है, ट्रोल तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करते हैं, और नकली जीत को राष्ट्रीय जीत के रूप में पेश किया जाता है।
इस भ्रामक सफलता ने पाकिस्तान जैसे गैर-लोकतांत्रिक देश में खासा प्रभाव डाला है। आर्थिक बदहाली, राजनीतिक अराजकता और सामाजिक अशांति से भरे मुल्क में सेना की इस जीत का मिथक अफीम का काम कर रहा है। अशिक्षित और बेरोजगार युवाओं की राय एक बार फिर सेना के पक्ष में झुक गई है। एक ऐसा मुल्क, जिसे अपने गिरते रुपये, बिजली की कमी और मुद्रास्फीति पर सवाल उठाना चाहिए, काल्पनिक हवाई हमलों और तकनीकी वर्चस्व के लिए ताली बजा रहा है।
लेकिन यह वाहवाही खोखली है। सच्चाई, जो कहीं ज्यादा गहरी है, इस छद्म आवरण के नीचे छिपी हुई है। तथ्यों की जांच करने पर झूठ की दीवारें ढहने लगती हैं। जो पाकिस्तानी सेना भारतीय आक्रामकता और ड्रोन खतरों का मुकाबला करने का दावा करती है, वहीं 11 एयरबेसों के नुकसान और नौ प्रमुख आतंकी शिविरों के प्रसार को रोकने में विफल रही, जो उसकी सुरक्षा में संदिग्ध रूप से चल रहे थे। वे व्यवस्थागत सड़न, कमान की विफलता और सेना की अपनी धरती को सुरक्षित रखने में असमर्थता के प्रतीक थे।
जनरल मुनीर को जिस प्रशंसनीय प्रदर्शन का इनाम मिला है, वह जमीनी हकीकत से बिल्कुल अलग है। खुद को राष्ट्र की ढाल के रूप में पेश करने वाली सेना के लिए प्रमुख संपत्तियों पर नियंत्रण खोना निंदनीय से कम नहीं है। लेकिन जवाबदेही और पारदर्शिता के बजाय असाधारण प्रचार हो रहा है। इससे भी बुरी बात यह है कि सैन्य शक्ति का यह महिमामंडन लोकतांत्रिक संस्थाओं की कीमत पर हो रहा है। किसी भी लोकतंत्र में, ऐसी विफलताओं के कारण संसदीय जांच होगी, शायद इस्तीफे भी देने पड़ेंगे, लेकिन पाकिस्तान में वे पदक का कारण बनते हैं।
नागरिक जीवन पर सेना की पकड़, जो आतंकी हमलों और घुसपैठ के कारण ढीली पड़ गई थी, एक बार फिर मजबूत हो रही है। फील्ड मार्शल के रूप में मुनीर की नियुक्ति न केवल पाकिस्तान के नागरिकों, बल्कि वहां के राजनेताओं के लिए भी संकेत है कि सेना फिर से सत्ता में आ रही है और यह मार्शल लॉ लागू करने की प्रस्तावना है।
इससे पाकिस्तान में लोकतंत्र की नींव कमजोर हो गई है, जो सतही तौर पर सैन्य जनरलों की बैसाखियों पर टिका हुआ है। इमरान खान जैसे निर्वाचित और सबसे लोकप्रिय नेता ने रावलपिंडी की सर्वशक्तिमत्ता को चुनौती देने की हिम्मत की, तो उन्हें जेल में डाल दिया गया। यह अब हर महत्वाकांक्षी नागरिक नेता के लिए एक सबक है। पाकिस्तान में निर्वाचित नेता को सेना की कठपुतली की तरह काम करना पड़ता है।
जिस तरह रूसी राष्ट्रपति पुतिन असहमति को दबाने और अपनी तानाशाही को सही ठहराने के लिए संघर्ष की कहानियों का इस्तेमाल करते हैं, उसी तरह मुनीर और शरीफ झूठ का किला बना रहे हैं। यह रणनीति न केवल अलोकतांत्रिक है, बल्कि खतरनाक भी है। यह राष्ट्रीय सुरक्षा को नाटक में बदल देती है, मतदाताओं को दर्शक बना देती है और गरीबी, अशिक्षा और उग्रवाद जैसे वास्तविक मुद्दों को दरकिनार कर देती है।
पाकिस्तानी सेना को शह भू-राजनीतिक रियायतों से मिलती है, खास तौर पर अमेरिका जैसी पश्चिमी ताकतों से। ट्रंप प्रशासन ने अपने कार्यकाल में रणनीतिक रूप से इस्लामाबाद के साथ सैन्य कूटनीति की ओर रुख किया। ट्रंप के लेन-देन संबंधी विश्व-दृष्टिकोण में, पाकिस्तान की सेना वहां की अशांत नागरिक सरकारों की तुलना में अधिक विश्वसनीय भागीदार थी।
इससे जनरलों का हौसला और बढ़ गया। दोनों देशों की सेनाओं के बीच सहयोग मजबूत हुआ, रक्षा निधि में फिर से वृद्धि हुई और लोकतांत्रिक संस्थाओं को दरकिनार करते हुए रणनीतिक वार्ता फिर से शुरू हुई। कश्मीर पर ट्रंप की कुख्यात मध्यस्थता संबंधी टिप्पणी ने इस मुद्दे को फिर से अंतरराष्ट्रीय चर्चा में ला दिया। हालांकि इसका उद्देश्य क्षेत्रीय कूटनीति था, लेकिन पाकिस्तान की सत्तारूढ़ पार्टी और सेना ने चतुराई से खुद को एक बार फिर वैश्विक खिलाड़ी के रूप में पेश किया। उनका उद्देश्य कश्मीर समस्या का समाधान नहीं था, बल्कि अपनी प्रासंगिकता को पुनर्जीवित करना था। पाकिस्तान आज एक खतरनाक चौराहे पर खड़ा है। पदकों और मिसाइलों के दावों के चमकदार मुखौटे के पीछे एक खोखला मुल्क छिपा है, जहां लोकतंत्र औपचारिकता तक सीमित हो गया है और असली सत्ता सेना के पास है। जनरल मुनीर की पदोन्नति जीत का इनाम नहीं, बल्कि भ्रम की रणनीति है।
पाकिस्तानी सेना ने भले ही घरेलू स्तर पर दुष्प्रचार युद्ध जीत लिया हो, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वह बेनकाब हो चुकी है। एक ऐसी संस्था, जो प्रासंगिकता के लिए बेताब है, वाहवाही के लिए जवाबदेही का सौदा कर रही है और राष्ट्रीय सुरक्षा को तमाशा बना रही है। जब तक पाकिस्तान अपनी विफलताओं को जीत के रूप में पेश करता रहेगा और देशभक्ति के नाम पर असहमति को दबाता रहेगा, तब तक सच्ची प्रगति मृगतृष्णा ही बनी रहेगी। फील्ड मार्शल का डंडा कुछ समय के लिए जनता की धारणा को प्रभावित कर सकता है, लेकिन यह वास्तविक नेतृत्व, संस्थागत सुधारों और लोकतांत्रिक ताकत का स्थान नहीं ले सकता, जिनकी पाकिस्तान को अत्यंत आवश्यकता है।