मैक्डोनल्ड में बैठे-बैठे अपना कांबो मील वह लगभग खत्म ही कर चुका था कि उसने देखा कि बाहर की तरफ एक आदमी हाथ से अपने पेट की तरफ इशारा करते हुए उससे कुछ मांग रहा था। उसके बाल अधपके खिचड़ी जैसे थे, आंखें धंसी हुई थीं, पिचके हुए गाल की हड्डियां साफ नजर आ रही थीं।
उसके बदन पर जो कुर्ता था, उसकी बांह एक तरफ आधी रह गई थी और दूसरी बांह में वह एक गमछा लपेटे हुए था। उसके घुटनों के पास चोट के निशान थे, शायद वह कहीं टकरा गया था। उससे रहा न गया।
शीशे के अंदर से उसने उसे इशारा किया कि रुको, मैं आता हूं। लिफ्ट से नीचे उतर कर उस फटेहाल को देखते ही फौरन पहचानकर वह बोला रुपया भाई, तुम इस हाल में?
उस व्यक्ति ने कहा, माफ करना भैया, मैंने तुम्हें पहचाना नहीं। वह बोला, तुम मुझे नहीं पहचानते, मैं हूं तुम्हारा मित्र, डॉलर। रुपये ने कहा, वक्त की मार ने आंखों की रोशनी तो कम कर ही दी, ठीक से चला भी नहीं जाता।
कमजोरी भी है। इसीलिए मैं तुमको पहचान न सका। डॉलर बोला, चलो, पहले कुछ खा-पी लो, फिर बात करते हैं। रुपये का हाथ पकड़कर, लिफ्ट में सहारा देकर उसने तीसरी मंजिल का बटन दबाते हुए कहा, वैसे तो फिलहाल मैं ऊपर हूं, और तुम नीचे ही जा रहे हो, लेकिन थोड़ी देर के लिए तो हम एक फ्लोर पर हो ही सकते हैं।
रेस्टोरेंट में सभी लोग आश्चर्य से देख रहे थे कि शानदार सूट पहनने वाला आदमी किसी भिखारी का हाथ थामे मेज की तरफ बढ़ रहा है। कोल्ड ड्रिंक के साथ सैंडविच आते ही रुपया उस पर टूट पड़ा। डॉलर ने उसका हाथ पकड़ते हुए कहा, तुम बहुत टूट चुके हो।
किसी अच्छे डॉक्टर को दिखाते क्यों नहीं? रुपया बोला, अब क्या-क्या दिखाऊं, गुर्दा, लीवर, दिल, फेफड़ा सब तो जवाब दे चुके हैं। मुझे अपनी नहीं, इस देश की चिंता है। मैं गुजर गया, तो इस देश का क्या होगा? फिर भी कोई मेरे बारे में नहीं सोचता।
अपनी सरकार में एक से एक दिग्गज अर्थशास्त्री डॉक्टर हैं, पर कोई मेरी गिरावट को रोक नहीं सकता। अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री भी नाकाम ही रहे। मेरी हालत तो उत्तराखंड की आपदा जैसी हो गई है, जिससे निपटने में शायद बरसों लग जाएं। इतना कहकर रुपया मुड़ा ही था कि देखा, डॉलर गायब है। मजबूरी में वह अकेला ही फिसलन भरी चढ़ाई चढ़ने की कोशिश करने लगा।