भले वह परस्पर विरोधी नीतियों पर हंगामा करते रहे हों। भले ही एक-दूसरे के चरित्र पर कीचड़ भी उछाला हो। मगर अपने वेतन बढ़वाने पर फिर एकमत थे सभी। नमन इस ‘धन दे मातरम्’ की एकता को। पांचेक साल पहले भी उन्होंने इस एकता का प्रदर्शन कर त्रिगुणित कर लिया था अपना वेतन। तब न उन्हें जंतर-मंतर की शरण लेनी पड़ी, और न ही इस बार रामलीला मैदान में रैली का आयोजन करना पड़ा। एक 'योगी' के नेतृत्व में निर्विघ्न गठित हो गई कमेटी। अलबत्ता ख्वाहिशें इस बार इतनी बढ़ गईं कि जहाज से भी चलेंगे वे और अपने 'अशिष्ट' आचरण के बावजूद अति विशिष्ट नागरिक का दर्जा भी लेंगे।
बहरहाल, सूफी कवि की अवधारणा थी कि संपत्ति-सलिल के बढ़ने पर मन सरोज बढ़ता है। उनका सरोज-मन एक बार फिर खिल उठा था। आलाप उन्होंने महंगाई की लगाई कि आगंतुकों को चाय-पानी करवाना पड़ता है। सत्कार न कर पाने की वेदना से वे तड़पते रहते हैं। तन के आयतन के अनुरूप आय का तन विराट करने की उनकी चाहत थी। चाय-वाय सत्कार-वत्कार तो रूपक है, हमारे माननीय तो ठोस गरीब हैं। तभी कृपालु रहती हैं लक्ष्मी उन पर- मूसलाधार उदारता, फोकट की यात्रा, आवास फ्री, बिजली फ्री, फोन फ्री, अट्ठाईस रुपये में सॉलिड खाना। अंतकाल पछताना न पड़े, इसलिए लूट सके तो लूट।
देश सेवा की आड़ में धनोपार्जन की सबसे सशक्त विधा राजनीति है। इसमें सुविधा ही सुविधा है। प्रभु पता नहीं, किस झरोखे में बैठ सबका मुजरा लेते है। कभी पंगु गिरी पर चढ़ते रहे होंगे। अब तो निशक्तता का प्रमाण-पत्र तक आसानी से नहीं मिलता। कानून की फर्जी डिग्री वाला कानून मंत्री बन सकता है। प्रधान सेवक की कृपा हो जाए, तो विद्याविहीन शख्स भी शिक्षा मंत्रालय संभाल सकता है। संसद सत्र के दौरान 'सूनी और निंदासी बेंच' भी उनकी जेब भत्तों से भर देती है। खैर, एक बार फिर पांच सौ तेईस सुरों की सिम्फनी बज उठी है, और गुंजायमान है धुन, दिल दिया है, जान भी देंगे, ऐ ‘वेतन’ तेरे लिए।