उनका स्वर ‘मुलायम’ था। वह अत्यंत प्रेम भरी निगाहों से पार्टी को निहार रहे थे। मैं तुम्हें बहुत चाहता हूं, जबसे चुनाव की आहट हुई है, मेरा दिल तुम्हारे लिए मचलने लगा है। परंतु यह कैसे संभव होगा। मेरी भाषा अलग, रीति-रिवाज अलग, मैं जीवन भर कांग्रेसव्रता रही। भला मैं तुम्हारी ओर कैसे देख सकती हूं।
तुम भी बस... यह सत्तामय प्यार है, जो तर्क और जाति-संप्रदाय से परे है। मन की सत्तामय कुर्सी पर जो बैठेगा, दिल उसे ही चाहने लगता है। चाहत के आगे भाषा, संप्रदाय और जाति क्या करेगी।
पर मैं तो बरसों से कांग्रेसव्रता रही। कई मुसीबतों के समय उन्होंने ‘आउट ऑफ द वे’ जाकर मेरी मदद की। कई बार लगा कि बस जेल के अलावा कोई रास्ता नहीं है, पर गठबंधन का प्यार ऐसा था कि जेल तो दूर, कभी रिपोर्ट तक में भी नाम नहीं आया। अब ऐसा प्यार छोड़कर अनजाने रास्ते पर चलना बहुत अजीब-सा लगता है।
देखो, तुम ‘गठबंधन प्यार’ को समझो। तीसरे मोर्चे के प्यार की महत्ता को समझो। तुम जीवन भर कांग्रेसव्रता रही, पर तुम्हें क्या मिला। कुछ मंत्रिपद के टुकड़े पाकर तुम्हें लगा कि बस जीवन मिल गया। जीवन तो इससे बहुत आगे है।
आज तुम प्रधानमंत्री की कुर्सी रूपी दिल मुझे न्योछावर कर दो, कल वह तुम्हारी भी हो सकती है। आज हमारे दिन हैं, तो कल तुम्हारे भी तो हो सकते हैं। आज हमारी साइकिल सरपट दौड़ रही है, कल पंचर भी हो सकती है। जब तुम्हारा वक्त आएगा, तो हम थोड़े ही पीछे हटेंगे। हम भी बराबर साथ देंगे। अभी मैं प्रधानमंत्री बन जाऊं, फिर बारी-बारी से सबका नंबर आएगा।
हमारे सिद्धांत अलग हैं, नियम अलग हैं, फिर कैसे निभेगी। कभी आप अडवाणी-महिमा गाते हैं, तो कभी श्याम की मुरली बजाते हैं। कभी राइट दिशा में जाते नजर आते हैं, तो कभी लेफ्ट की तरफ छलांग लगाते हैं। लगता है आप फ्लर्ट कर रहे हैं। आपका इतना ‘मुलायम’ व्यवहार देखकर शंका होने लगी है कि मैं किसे अपना मानूं और किसे पराया।
अरे मैं प्यार जता रहा हूं और तुम्हें फ्लर्ट नजर आ रहा है। मैं तुम्हें प्रधानमंत्री पद के अलावा सब कुछ देने को तैयार हूं। तुम बस एक बार मेरे तीसरे मोर्चे की दुनिया में आ जाओ।
वह अदभुत प्रेमी प्यार के गान गाए जा रहा था और किसी तरह तीसरे मोर्चे की प्यार भरी दुनिया बसाना चाहता था।