भूप जी चिंतामग्न होकर मेरे पास आए। मैंने कहा, क्या बात है? इतना चिंतित तो मैंने आपको नागरिक विकास समिति के चुनाव के समय भी नहीं देखा था।
वह बोले, चिंता वाली बात है। विकास समिति के चुनाव नजदीक आ गए। हमने कॉलोनी के लिए किया क्या है? चंदे से जो पैसा इकट्ठा हुआ था, वह भी चट कर गए हैं। नया चुनाव हम कैसे फेस कर पाएंगे? उसी पर विचार करने मैं तुम्हारे पास आया हूं। मैं सोचता हूं कि हम कॉलोनी का एक चिंतन शिविर आयोजित कर अपना कंसर्न जता दें, फिर वोट मांग लें।
मैंने कहा, इसे चिंतन शिविर का नाम देना मुझे जंच नहीं रहा। यह तो चिंता का विषय है, इसलिए इसका नाम चिंता शिविर रखो। चिंतन शिविर में मात्र चिंतक आएंगे तथा हमारा मंतव्य पूरा नहीं होगा। हमें पुनः सत्तासीन होना है।
भूप जी बोले, तुम्हारी बात में दम है। हम चिंता शिविर ही आयोजित करेंगे। चिंता नाम से लोग दौड़े चले आएंगे तथा अगले चुनाव में सत्ता हासिल करने की हमारी चिंता भी व्यक्त नहीं होगी। इसके लिए जनवरी का महीना सबसे उपयुक्त है। चाय-नाश्ते की प्लेटों के साथ चिंता शिविर का उद्घाटन एकदम सार्थक दिशा में जाएगा। तुम एक काम करो। झूठी-सच्ची उपलब्धियों का ब्योरा तैयार कर लो, जिसे हम घुमा-फिराकर दो दिनों तक लोगों को बताते रहेंगे।
मैंने कहा, बड़ा जटिल काम दे दिया आपने। हमने चार साल में गबन और घोटालों के सिवा और किया क्या है? हमने झूठा ब्योरा बना भी दिया, तो आम आदमी को वह हजम होगा भी या नहीं! लेकिन आप यह बताइए कि शिविर में विशिष्ट रूप से किस-किसको बुलाना है?
वह बोले, हमें विशिष्टता केवल उसी को देनी है, जो हमारे पक्ष में मतदान करवा सके। ये मैनेज हो गए, तो हमें सत्ता में आने से विरोधी भी नहीं रोक पाएंगे।
मैंने कहा, आइडिया तो बुरा नहीं है, परंतु इन पर खर्चा जमकर करेंगे, तभी बात बन पाएगी।
भूप जी बोले, हमारे पिताजी का क्या जा रहा है? हम तो चिंता शिविर में ही चंदे की रसीदें काटकर तीन-चार लाख बटोर लेंगे। विधायक जी से भी अध्यक्षता करने की फीस ले लेंगे।
तो मित्रो, आजकल हम चिंता शिविर के आयोजन की तैयारियों में पूरी तरह व्यस्त हैं।