इन दिनों जब पाकिस्तान में अपने विरोधियों को निशाना बनाने के लिए कुछ नहीं है, तब यहां की सरकार अपने उन नागरिकों को 'भारतीय एजेंट' कह रही है। जब बहस की कोई गुंजाइश ही नहीं है, तब अपने विरोधियों को गाली देने के लिए उन्हें 'भारतीय एजेंट' कहने से उपयुक्त शायद कुछ और नहीं है। इस हफ्ते सरकार ने अपने विरोधियों को परेशान करने के लिए एक बड़ा कदम उठाया और अपनी ही पार्टी के एक सदस्य के जरिये नवाज शरीफ, उनकी बेटी मरियम नवाज, पीएमएल-एन में शामिल तीन पूर्व सैन्य जनरलों तथा पाक अधिकृत कश्मीर के मौजूदा प्रधानमंत्री के खिलाफ देशद्रोह का मामला दर्ज करवाया। यह इमरान खान के लिए एक बड़ी शर्मिंदगी है, जो खुद को कश्मीर का राजदूत कहते हैं। आम लोग भी इससे नाराज हैं कि जनता की समस्याओं को सुलझाने के बजाय सरकार के मंत्री केवल विपक्षी नेताओं पर निशाना साधने में व्यस्त हैं।
अंग्रेजी दैनिक द डॉन ने लिखा कि यह ब्रिटिश औपनिवेशिक अतीत का ही अवशेष है, जब लोगों के मौलिक लोकतांत्रिक अधिकारों को कुचलने के लिए देशद्रोह कानून का औजार के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। पाकिस्तान में बहुत कम ऐसे पाकिस्तानी नेता हैं, जिन पर देशद्रोह का आरोप नहीं लगा है। यहां तक कि लेखकों और पत्रकारों को भी नहीं बख्शा गया।
इसकी शुरुआत पीएमएल-एन नेता नवाज शरीफ से हुई, जो अभी लंदन में अपना इलाज करा रहे हैं। उन्होंने दो साल की अपनी चुप्पी तोड़कर हाल ही में अपने उग्र भाषणों में सैन्य प्रतिष्ठान पर आरोप लगाते हुए कहा कि वह 'सरकार से ऊपर सरकार' बन गया है। उन्होंने यह भी कहा कि इमरान खान की मौजूदा सरकार चुनाव में धांधली के जरिये सत्ता में आई है और सैन्य प्रतिष्ठान के सहारे चल रही है, जो वास्तविक शासक है।
हालांकि कैबिनेट मंत्रियों ने इस पर प्रतिक्रिया जताई, लेकिन सेना ने चुप्पी साध ली। यहां तक कि इंटर सर्विसेज पब्लिक रिलेशंस (आईएसपीआर) के महानिदेशक ने भी नवाज शरीफ के आरोपों पर प्रतिक्रिया नहीं दी है। लेकिन वे कानूनी व्यवस्था के जरिये नवाज शरीफ के सभी भाषणों को टेलीविजन और प्रिंट मीडिया में प्रतिबंधित करने में कामयाब रहे। पिछले दो साल से इमरान खान ने भी जिम्मेदारी उठाने के बजाय सिर्फ विपक्ष पर अपना ध्यान केंद्रित किया है, जिसके कई नेता जेल में हैं। हर रोज उन्हें अदालत में घसीटा जाता है। दो साल बाद विपक्ष ने कहा कि बस, अब बहुत हो चुका। इमरान खान की सरकार को हटाने के लिए उन्होंने मिलकर पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट (पीडीएम) का गठन किया है। शुरू में पीपीपी, पीएमएल-एन और हाशिये के कुछ राजनीतिक दल सरकार को हटाने की मुहिम चलाना नहीं चाहते थे। वे मानते थे कि इमरान खान की गलत नीतियां और लोगों की समस्याएं उन्हें इतना अलोकप्रिय बना देंगी कि यह सरकार खुद ही गिर जाएगी। लेकिन इमरान खान को सेना का मजबूत समर्थन मिलते देख विपक्ष ने जल्दी ही महसूस किया कि लोगों को सड़कों पर उतारने और आंदोलन शुरू करने का वक्त आ गया है।
आंदोलन में शामिल होने वाले महत्वपूर्ण नेताओं में से एक मौलाना फजलुर रहमान हैं, जो जमायत उलेमा-ए-इस्लाम-फजल के प्रमुख हैं। उन्हें अब पीडीएम का प्रमुख मनोनीत किया गया है। हालांकि मौलाना पिछले चुनावों में विफल रहे थे और संसद में उनकी ताकत ज्यादा नहीं है, लेकिन बाहर एक आह्वान पर वह हजारों लोगों को सड़कों पर इकट्ठा कर सकते हैं। उनके समर्थकों में से ज्यादातर देश भर के विभिन्न मदरसों से हैं। ज्यादातर छात्रों और पार्टी कार्यकर्ताओं ने पिछली सर्दियों में इस्लामाबाद में सड़क पर बेहद अनुशासित रहकर अपनी क्षमता का प्रदर्शन किया था, जहां उन्होंने एक सफल धरना का आयोजन किया और ठंड तथा बारिश में भी रुके रहे थे। उससे साबित हुआ था कि सरकार पर दबाव बनाने के लिए मौलाना के पास संगठनात्मक क्षमता है।
मौलाना को पीडीएम का प्रमुख बनाने की एक और वजह यह है कि विपक्ष को इस बात का डर है कि पीपीपी और पीएमएल-एन के शीर्ष नेतृत्व को उन मामलों में गिरफ्तार किया जा सकता है, जिन पर अदालतों में सुनवाई चल रही है। इस्लामाबाद उच्च न्यायालय पहले से ही नवाज शरीफ को 'फरार' घोषित करने के लिए एक मामले की सुनवाई कर रहा है, क्योंकि वह मामलों का सामना करने के लिए लंदन से वापस नहीं आए हैं।
दिलचस्प तथ्य यह है कि पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास में पहली बार सरकार और सत्ता प्रतिष्ठान के खिलाफ आंदोलन पंजाब में शुरू हुआ है। अतीत में छोटे प्रांत ही आंदोलनों को जन्म देते रहे हैं। इसके अलावा अतीत में पाकिस्तान में कोई भी राजनीतिक आंदोलन तभी सफल रहा है, जब सुरक्षा प्रतिष्ठान इसमें शामिल हुआ और सत्तारूढ़ सरकार को हटने के लिए उसने मजबूर किया। पंजाब से नवाज शरीफ की करिश्माई बेटी मरियम नवाज शरीफ से पीडीएम का नेतृत्व करने की उम्मीद है। उनमें भीड़ को इकट्ठा करने की काबिलियत है। एक और दिलचस्प तथ्य यह है कि सेना में पंजाबी बहुसंख्यक हैं, जिसके चलते विरोधी कहते हैं कि यह पंजाब सेना है। इसलिए पंजाब के राजनीतिक विरोधियों द्वारा एक ऐसी सरकार पर निशाना साधना बिल्कुल नई बात होगा, जिसे सेना का पूरा समर्थन हासिल है।
राजनीतिक विश्लेषक अब्बास नासिर कहते हैं, 'पिछले गठबंधनों के सबक को देखते हुए पीडीएम सरकार को गिराने या राजनीति पर सत्ता प्रतिष्ठान की पकड़ को कमजोर करने में सक्षम नहीं हो सकता, लेकिन यह तानाशाही स्थापित करने के किसी भी प्रयास का प्रभावी विरोध जरूर कर सकता है। विपक्षी गठबंधन के सामने सबसे बड़ी चुनौती एकता बनाए रखने की है। लेकिन जैसा कि हमने बार-बार देखा है, जब मुश्किल घड़ी आती है, तब कट्टर राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी भी एकजुट हो सकते हैं।' इस महीने से आंदोलन पूरे देश में शुरू हो जाएगा और निर्णायक घड़ी मार्च के महीने में आएगी, जब सीनेट के चुनाव होंगे। विपक्ष को इमरान सरकार पर पर्याप्त दबाव बनाने और सेना द्वारा उनके उम्मीदवारों का समर्थन न करने की उम्मीद है। कुछ लोगों को लगता है कि यदि पीडीएम अपनी मुहिम में सफल होता है, तो वह कम से कम सरकार पर बातचीत करने के लिए दबाव बना पाएगा, जिससे विपक्ष को थोड़ी राहत मिल सकती है।