अव्वल तो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को ईडी की कार्रवाई में दखल ही नहीं देना चाहिए था, क्योंकि धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) की धारा 17 के तहत, ईडी को साक्ष्य जुटाने के लिए तलाशी और जब्ती का विशेष अधिकार है। अगर मुख्यमंत्री को लग रहा था कि ईडी की कार्रवाई राजनीति से प्रेरित है, तो वह अदालत का दरवाजा खटखटा सकती थीं। जांच में बाधा डालना ‘सांविधानिक अराजकता’ का आभास कराता है। मुख्यमंत्री ने जिस तरह फाइलें, लैपटॉप आदि जब्त कर लीं, वह एक खतरनाक परंपरा बन सकती है कि भविष्य में कोई भी प्रभावशाली व्यक्ति अपनी राजनीतिक ताकत का इस्तेमाल कर कानूनी जांच प्रक्रिया में बाधा डाल सकता है।
फाइलों को हटाने से यह संदेह ही गहराता है कि वहां शायद कुछ ऐसा था, जिसे छिपाना वह जरूरी समझ रही थीं। जैसा कि हाईकोर्ट में ईडी ने दलील दी कि उसकी जांच कार्रवाई शांतिपूर्वक एवं पेशेवर ढंग से चल रही थी, जब तक कि मुख्यमंत्री और उनके प्रशासन ने हस्तक्षेप नहीं किया। ईडी के अनुसार, यह कार्रवाई अवैध कोयला तस्करी और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े मामलों में हो रही थी, न कि किसी राजनीतिक दल के खिलाफ। आई-पैक एक निजी परामर्श कंपनी है, अगर उसके खातों में संदिग्ध लेन-देन पाया जाता है, तो एजेंसी को जांच करने का पूरा अधिकार है। ऐसे में, मुख्यमंत्री द्वारा फाइलें जब्त करना सबूतों से छेड़छाड़ के दायरे में आता है।
मुख्यमंत्री द्वारा जांच एजेंसियों को बार-बार किसी खास पार्टी का ‘राजनीतिक हथियार’ बताना संस्थानों की साख को भी नुकसान पहुंचाने वाला है। नैतिकता और कानून के नजरिये से यह जटिल मामला अब चूंकि कोलकाता हाईकोर्ट में विचाराधीन है, तो अदालत ही यह तय करेगी कि क्या मुख्यमंत्री का हस्तक्षेप ‘जांच में बाधा’ माना जाएगा या इसे ‘पार्टी डाटा की सुरक्षा’ के रूप में देखा जाएगा। लेकिन एक सांविधानिक पद पर आसीन मुख्यमंत्री से जांच प्रक्रिया में दखल को उचित नहीं माना जा सकता।