अब सवाल यह है कि इस बार उनका मकसद क्या है? ट्रंप कई मौकों पर जिनपिंग के रवैये की प्रशंसा करते दिखते हैं। साथ ही, उन्होंने अमेरिका-चीन संबंधों को ‘जी-2’ के नजरिये से देखने की बात फिर से छेड़ दी है-एक ऐसा विचार, जिसमें दोनों देशों को वैश्विक रुझानों व जिम्मेदारियों में साझेदार माना जाता है। दूसरी ओर, बीजिंग को चुनौती देने के संकेत भी उतने ही स्पष्ट हैं। अमेरिका-चीन संबंधों में ‘रणनीतिक अस्पष्टता’ का इतिहास काफी पेचीदा रहा है। इसका अर्थ लंबे समय से चली आ रही और जानबूझकर बनाए रखी गई उस अनिश्चितता से है कि यदि चीन ताइवान पर हमला करता है, तो क्या अमेरिका सैन्य रूप से उसकी मदद के लिए आएगा या नहीं। अब यह अनिश्चितता कहीं ज्यादा बढ़ गई है। हालांकि, ट्रंप की इस रणनीतिक अस्पष्टता के कुछ लाभ भी हैं। पहला, यह वाशिंगटन के अंतिम इरादों के बारे में चीन को असमंजस में रखता है। भले ही शी जिनपिंग ने ट्रंप के पहले कार्यकाल की तुलना में दूसरे कार्यकाल में उन्हें अधिक प्रभावी ढंग से संभाला है। फिर भी, बीजिंग इस बात को लेकर अनिश्चित और चिंतित है कि दबाव की स्थिति में ट्रंप अचानक क्या कर बैठेंगे।
तमाम फायदों के बावजूद, चीन के प्रति अस्पष्टता फायदे से ज्यादा जोखिम लेकर आती है। ट्रंप के मिले-जुले संदेशों का असर यह है कि टोक्यो से लेकर नई दिल्ली तक अमेरिका के साझेदार उनके बयानों और कदमों को बारीकी से खंगाल रहे हैं, ताकि यह समझ सकें कि वाशिंगटन पर अब भी भरोसा किया जा सकता है या नहीं। जापान और भारत जैसे देश आश्वासन चाहते हैं और ट्रंप को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रहे हैं। ट्रंप की यह अस्पष्ट रणनीति जोखिम उठाने लायक है या नहीं, यह उनके वास्तविक उद्देश्यों पर निर्भर करता है। जहां अमेरिका घरेलू राजनीतिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए तात्कालिक उपलब्धियां चाहता है, वहीं चीन कहीं बड़ा दांव खेलने की तैयारी में दिखाई दे रहा है। ऐसे में, अगर अमेरिका ताइवान और अत्याधुनिक तकनीक के मोर्चे पर बड़ी रियायतें देकर, बदले में चीन से केवल दालों जैसी कृषि वस्तुओं की मामूली खरीद और नशीली दवाओं पर कुछ प्रतिबंध हासिल करता है, तो यह साफ तौर पर एक बेहद खराब सौदा होगा। ऐसा कोई भी समझौता पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में चीन के दबदबे का रास्ता साफ कर सकता है, जिससे अमेरिका महत्वपूर्ण वैश्विक व्यापार मार्गों पर अपना नियंत्रण खो देगा।
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि 21वीं सदी की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि ट्रंप की यह अस्पष्टता रणनीतिक है या सिर्फ तात्कालिक चाल। अगर वह लंबा खेल खेल रहे हैं और अमेरिका की कमजोर होती सैन्य व आर्थिक स्थिति को सुधारने की उम्मीद में यह दांव चल रहे हैं, तो यह अस्पष्टता अमेरिका को उसके सबसे बड़े वैश्विक प्रतिद्वंद्वी से आगे बनाए रखने की एक चतुर रणनीतिक चाल साबित हो सकती है। पर अगर वह केवल घरेलू राजनीति में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए चीन को खुश करने का प्रयास कर रहे हैं, तो इसका खामियाजा अमेरिका को आज ही नहीं, बल्कि आने वाले दशकों तक बेहद विनाशकारी रूप में भुगतना पड़ सकता है।