दरअसल, स्वच्छ हवा का सवाल अब महज पर्यावरण संरक्षण का विषय नहीं रह गया है। तेजी से बढ़ते शहरीकरण, वाहनों की बढ़ती संख्या, निर्माण गतिविधियों, सड़क की धूल, औद्योगिक उत्सर्जन और कचरा जलाने जैसी वजहों ने शहरों की हवा को लगातार जहरीला बनाया है। सर्वेक्षण इसलिए भी खास है, क्योंकि यह केवल वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) पर आधारित नहीं है, बल्कि शहरों द्वारा प्रदूषण नियंत्रण के लिए जमीन पर किए गए ठोस प्रयासों, मसलन, सड़क की धूल कम करने, कचरा प्रबंधन, वाहन उत्सर्जन नियंत्रण, निर्माण व विध्वंस अपशिष्ट का निपटान, सार्वजनिक जागरूकता और वार्षिक पीएम10 स्तर में सुधार इत्यादि का मूल्यांकन करता है।
राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी) के अंतर्गत 130 शहरों में से 108 शहरों की हवा की गुणवत्ता में सुधार दर्ज होना और कई शहरों में पीएम10 स्तर में 40 प्रतिशत से अधिक कमी आना इस बात का प्रमाण है कि सही दिशा में किए गए प्रयास रंग ला रहे हैं। फिर भी यह उत्साह सतर्कता के साथ होना चाहिए। रैंकिंग में सुधार का मतलब यह नहीं कि शहरों की हवा पूरी तरह स्वच्छ हो गई है। दिल्ली जैसे महानगरों में सर्दियों में गंभीर प्रदूषण की घटनाएं अब भी आम हैं। कई शहर अब भी राष्ट्रीय मानकों के अनुसार पीएम10 के स्वीकार्य स्तर तक नहीं पहुंच पाए हैं।
लखनऊ में भी पीएम10 का स्तर घटा जरूर है, लेकिन वार्षिक राष्ट्रीय मानक तक नहीं पहुंचा है। इसके अतिरिक्त, शहरीकरण की गति, निर्माण गतिविधियों का विस्तार और वाहनों की संख्या में वृद्धि लगातार चुनौती बनी हुई है। ऐसे में, जरूरी है कि प्रदूषण के स्रोतों पर निरंतर निगरानी, सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा, सड़क और निर्माण की धूल पर नियंत्रण तथा बेहतर कचरा प्रबंधन जैसे उपाय पूरे वर्ष जारी रखे जाएं। सर्वेक्षण में अच्छे अंक हासिल करना अच्छी बात है, लेकिन अब जरूरत है कि इन प्रयासों को स्थायी और व्यापक बनाया जाए।