थोड़े दिनों पहले जारी गैरसरकारी संगठन प्रथम की 'असर' (एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन) रपट जहां भारतीय शिक्षा व्यवस्था की हालत के बारे में कई अफसोसनाक हकीकतों पर रोशनी डालती है, वहीं उससे कुछ ऐसी संभावनाएं भी उजागर होती हैं, जिनके आधार पर भारत के भविष्य की उज्ज्वल तस्वीर खींची जा सकती है। यह अध्ययन चौदह से अट्ठारह वर्ष के युवाओं की पढ़ने व गणना की क्षमता को विश्लेषित करता है। इस आयु वर्ग का चयन कई कारणों से आवश्यक था। पहला, यह वर्ग शिक्षा के अधिकार संबंधी कानून से आगे की शिक्षा का स्तर बता सकता था। दूसरे, इसका एक निहितार्थ शिक्षा के अधिकार को चौदह वर्ष से अधिक के बच्चों पर भी लागू किए जाने का हो सकता है, ताकि आगे की शिक्षा भी एक अधिकार के रूप में प्राप्त हो सके। तीसरे, यह वर्ग आमदनी करने लायक आयु के काफी नजदीक है। इसलिए इस तरह के युवाओं की भावी क्षमताओं व कौशल का अंदाजा लगाना भी उपयोगी है। आखिरकार इन युवाओं के भविष्य के साथ ही भारत की आर्थिक तरक्की की संभावनाएं जुड़ी हुई हैं। आइए, पहले इन आंकड़ों से जिस संगीन स्थिति पर रोशनी पड़ती है, उसका एक जायजा लें। मसलन, 30,532 युवाओं में से 14 प्रतिशत को भारत के नक्शे तक का ज्ञान नहीं था। 38 प्रतिशत को देश की राजधानी की जानकारी नहीं थी। 21 फीसदी को अपने राज्य का नाम नहीं पता था। 57 फीसदी को तीन अंक का भाग लगाना नहीं आता था और 40 प्रतिशत घड़ी देखकर भी समय नहीं बता पाए। 25 प्रतिशत अपनी भाषा ठीक से नहीं पढ़ सके। ये आंकड़े तेजी से निर्जीव होती स्कूली शिक्षा की ओर इशारा करते हुए राष्ट्रीय चिंता को रेखांकित करते हैं। परंतु इन्हीं आंकड़ों से यह भी निकल कर आता है कि 75 प्रतिशत छात्र बिना अटके अपनी भाषा पढ़ पाने में सक्षम ही नहीं हैं, बल्कि वे पढ़े हुए वाक्य का अर्थ भी समझ पा रहे हैं। 58 प्रतिशत युवा अंग्रेजी भी पढ़ सकते हैं। भारत में अभी शिक्षण का माध्यम स्थानीय भाषा है और अंग्रेजी को एक विषय के रूप में पढ़ाया जाता है। ऐसे में 58 प्रतिशत की संख्या को बेहतर माना जा सकता है।