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शिक्षा के खुलते दरवाजे

कंचन शर्मा Updated Mon, 12 Feb 2018 07:20 PM IST
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कंचन शर्मा

थोड़े दिनों पहले जारी गैरसरकारी संगठन प्रथम की 'असर' (एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन) रपट जहां भारतीय शिक्षा व्यवस्था की हालत के बारे में कई अफसोसनाक हकीकतों पर रोशनी डालती है, वहीं उससे कुछ ऐसी संभावनाएं भी उजागर होती हैं, जिनके आधार पर भारत के भविष्य की उज्ज्वल तस्वीर खींची जा सकती है। यह अध्ययन चौदह से अट्ठारह वर्ष के युवाओं की पढ़ने व गणना की क्षमता को विश्लेषित करता है। इस आयु वर्ग का चयन कई कारणों से आवश्यक था। पहला, यह वर्ग शिक्षा के अधिकार संबंधी कानून से आगे की शिक्षा का स्तर बता सकता था। दूसरे, इसका एक निहितार्थ शिक्षा के अधिकार को चौदह वर्ष से अधिक के बच्चों पर भी लागू किए जाने का हो सकता है, ताकि आगे की शिक्षा भी एक अधिकार के रूप में प्राप्त हो सके। तीसरे, यह वर्ग आमदनी करने लायक आयु के काफी नजदीक है। इसलिए इस तरह के युवाओं की भावी क्षमताओं व कौशल का अंदाजा लगाना भी उपयोगी है। आखिरकार इन युवाओं के भविष्य के साथ ही भारत की आर्थिक तरक्की की संभावनाएं जुड़ी हुई हैं। आइए, पहले इन आंकड़ों से जिस संगीन स्थिति पर रोशनी पड़ती है, उसका एक जायजा लें। मसलन, 30,532 युवाओं में से 14 प्रतिशत को भारत के नक्शे तक का ज्ञान नहीं था। 38 प्रतिशत को देश की राजधानी की जानकारी नहीं थी। 21 फीसदी को अपने राज्य का नाम नहीं पता था। 57 फीसदी को तीन अंक का भाग लगाना नहीं आता था और 40 प्रतिशत घड़ी देखकर भी समय नहीं बता पाए। 25 प्रतिशत अपनी भाषा ठीक से नहीं पढ़ सके। ये आंकड़े तेजी से निर्जीव होती स्कूली शिक्षा की ओर इशारा करते हुए राष्ट्रीय चिंता को रेखांकित करते हैं। परंतु इन्हीं आंकड़ों से यह भी निकल कर आता है कि 75 प्रतिशत छात्र बिना अटके अपनी भाषा पढ़ पाने में सक्षम ही नहीं हैं, बल्कि वे पढ़े हुए वाक्य का अर्थ भी समझ पा रहे हैं। 58 प्रतिशत युवा अंग्रेजी भी पढ़ सकते हैं। भारत में अभी शिक्षण का माध्यम स्थानीय भाषा है और अंग्रेजी को एक विषय के रूप में पढ़ाया जाता है। ऐसे में 58 प्रतिशत की संख्या को बेहतर माना जा सकता है।



यह रपट यह भी बताती है कि कंप्यूटर व इंटरनेट से इस आयु-वर्ग की दूरी अभी बनी हुई है। पर युवाओं के मध्य मोबाइल का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। उच्च शिक्षा प्रक्रिया को इन मोबाइल धारक युवाओं से जोड़ने की कोशिश की जा सकती है। अपने भविष्य को लेकर भी यह युवा वर्ग काफी आशावान है। युवाओं का बड़ा हिस्सा खुद को सेना/पुलिस/इंजीनियर के रूप में देखता है। मात्र 1.2 प्रतिशत युवा ही भविष्य में खुद को कृषि व्यवसाय में जोड़ने के इच्छुक हैं। असर की रिपोर्ट से निकल कर आता है कि 2018 में इस आयु वर्ग के केवल 30 प्रतिशत युवा शिक्षा-व्यवस्था से दूर हैं। यह एक बड़ा सकारात्मक बदलाव है। जिस प्रकार शिक्षा के अधिकार द्वारा प्राथमिक शिक्षा के नामांकन स्तर (96 प्रतिशत) में बढ़ोतरी हुई है, उसी प्रकार उच्च शिक्षा में भी युवाओं के नामांकन की संख्या बढ़ने की उम्मीद लगाई जा सकती है।

 

भारत सरकार का लक्ष्य 2020 तक चार करोड़ छात्र-छात्राओं को उच्च शिक्षा में नामांकित करने का है। परंतु देखना यह होगा कि सरकार शिक्षा की गिरती गुणवत्ता के हल के लिए क्या रास्ता खोजती है। देखना यह भी है कि नई शिक्षा नीति इन आंकड़ों के मद्देनजर खुद को कितना बदलेगी, और देश के विकास में भावी युवा कितनी व कैसी भूमिका निभाएंगे? 

 

-लेखिका दिल्ली विश्वविद्यालय के केंद्रीय शिक्षा संस्थान में शोधरत हैं। 

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