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सिर्फ प्रश्न थे उत्तर नहीं...

Sat, 18 May 2013 09:37 PM IST
कैलाश वाजपेयी
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पृथ्वीराज जी लौटते हुए फिर हमारे कमरे में रुके। उन्होंने बताया कि नरगिस जब राज को छोड़ कर चली गई तब से घर में कुछ तो राहत है। मगर साथ ही साथ उसकी शराबखोरी बहुत बढ़ गई है। पृथ्वीराज जी ने कई तरह के उदाहरण देते हुए फिल्मी दुनिया की विसंगतियों का खुलासा किया। हमने कहा, 'पाप और पश्चाताप फिर वही भूल और फिर अपने गलत किए काम का अहसास, यही तो इन्सान की फितरत है।
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घर का बुजुर्ग होने के कारण आप चाहें तो बहुत कुछ कर सकते हैं।' पृथ्वीराज जी दूसरे दिन भी आए और जब तक उन्होंने वायदा जैसा नहीं करवा लिया कि हम आंख मूंदकर किसी भी तरह फिल्मी दुनिया की ओर चल नहीं पड़ेगे, वह लगातार कक्षा लेते रहे। अगली शाम हमारे कमरे के दूसरे बिस्तर पर एक नया मरीज आया।

परिचय के बाद ज्ञात हुआ कि ये नए मरीज स्वयं भी डॉक्टर हैं, डॉ. चण्डक। डॉ चण्डक मनोविश्लेषक थे। पेट की तकलीफ से तंग होकर इस अस्पताल में दाखिल हुए थे। उनका मानना था कि मुंबई में खुश्क जलवायु वाले क्षेत्र से जो लोग आते हैं, उन्हें मुंबई की उमस भरी आबोहवा, अनुकूल नहीं पड़ती। डॉ. चण्डक थे तो मनस्विद, मगर उनके पास महर्षि रमण के फोटो वाली एक पुस्तक थी ‘हू एम आई’।
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अगले दिन तक हम दोनों में ज्यादा बात नहीं हुई। सिवा नर्सों की आवाजाही और डॉक्टरों द्वारा दिए गए मिक्सचर पीने के। पता नहीं रात के कितने बजे थे। डॉ. चण्डक ने पूछा, 'मैं कौन हूं'। हमने कहा, 'यह प्रश्न ही गलत है। प्रश्न होना चाहिए ‘मैं’ कौन है?' शुद्ध तत्वज्ञान की दृष्टि से ‘मैं’ आत्मज्ञान की तरफ इशारा करता है और आत्मज्ञान कभी होता ही नहीं।

लाख तर्कजाल बुनो, तुम अपने आपको, उन्हीं हथियारों से कैसे विश्लेषित कर सकते हो, जिनसे ये तर्क गढ़े हैं? वहां तब ज्ञाता कौन होगा और ज्ञात क्या होगा प्रश्न करने वाले को? ये तो कबीर जैसे अवधूत कह सकते हैं-
'जब मैं था तब हरि नहीं
अब हरि है मैं नाहिं'

मगर इसे भी लिखा इस तरह जाना चाहिए, जब ‘मैं’ था अर्थात जब तक अहं था, तब हरि नहीं, अब हरि है ‘मैं’ नाहिं, हम अपना वाक्य पूरा कर ही पाए थे कि डॉ चण्डक ने पूछा, ‘अवधूत क्या होता है’? हमने कहीं पढ़ा था, आपादत: धूतं प्रक्षालितं येन- अर्थात् अपनी समग्रता को (आपाद) जिसने प्रक्षालित कर डाला या धो दिया है वह अवधूत है।

डॉ चण्डक ने कहा, ‘माना कि कबीर जैसा कवि ही ऐसा कह सकता है, मगर मनोविज्ञान का विद्यार्थी होने के कारण मैं यह भूल नहीं पाता कि आदमी मल्टीसाइकिक है। वह पल-पल में चेहरा बदलता है।'  रमण महर्षि कहते हैं, 'अपना विश्लेषण स्वयं करो'।

तुम्हारी अपने बारे में बनाई गई धारणा दरअसल दूसरों की है, जिन्होंने उसे तुम पर थोपकर छुट्टी पा ली है। जबकि तुमने अपने अहं का साक्षात्कार किया ही नहीं। तुम्हारी कोई सही तस्वीर तुम्हारे पास है ही नहीं।' ‘मैं’ का खुलासा करते हुए महर्षि रमण कहते हैं, 'अगर हम भीतर ही भीतर ‘मैं’ के सूत्र का पीछा करेंगे तो पाएंगे यह सर्वप्रथम पैदा होने वाला संप्रत्यय है।

यही नहीं, यह सबसे अंत में विलुप्त होने वाला भाव भी है। काफी सतर्क होकर इस ‘मैं’ नाम वाले विषाणु का पीछा करो। अपने को थर्ड पर्सन मानकर ‘मैं’ की कारगुजारी का अवलोकन करो। वह दिन जरूर आएगा कि ‘अहं’ कपूर की तरह उड़ गया होगा और तुम्हें अपने भीतर चिति की आभा झलकती दिखेगी।

यह भी लगेगा कि मेरे भीतर कुछ है, जो न कभी जन्मा था और न मरेगा। जैसे-जैसे यह अहसास खरा होता जाता है, आदमी व्यावहारिक जीवन कम तात्विक जिंदगी ज्यादा जीने लगता है। कबीर दास ने ऐसे प्राणी को गूंगे कैरी सर्करा खाए और मुस्कुराए कहा है।
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