चीन की सेना अक्सर वास्तविक नियंत्रण रेखा का उल्लंघन करती रही है। पिछले वर्ष उसने 200 से अधिक बार इसका उल्लंघन किया। लेकिन विगत 15 जून को गलवां घाटी में उसने जो किया, वह अभी एक रहस्य बना हुआ है। चीनी सेना ने छह जून को दोनों पक्षों के जनरलों के बीच हुए समझौते की अवहेलना करते हुए पिछले दिनों एलएसी पर शांति भंग क्यों की, यह समझ पाना मुश्किल है। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं, मसलन, अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा, क्षेत्रीय एवं वैश्विक हैसियत तथा दुनिया में सबसे महत्वपूर्ण देश बनकर उभरने का चीन का सपना।
इसके अलावा कोविड-19 के स्रोत के बारे में स्पष्ट खुलासा न होने से अंतरराष्ट्रीय जगत में चीन की आलोचना बढ़ी है। शी जिनपिंग के नेतृत्व पर घरेलू राजनीति में सवाल उठ रहे हैं। परेशान अमेरिकी राष्ट्रपति ने चीन से 10 खरब डॉलर का हर्जाना मांगने के अलावा अमेरिकी कंपनियों को चीन से बाहर निकलने के लिए कहने के जवाब में संबंध खत्म कर देने की धमकी दी है।
साथ ही भारत और अमेरिका के बीच तेजी से बढ़ती नजदीकी, विश्व स्वास्थ्य संगठन के 34 सदस्यीय कार्यकारी बोर्ड के नवनिर्वाचित अध्यक्ष के रूप में भारत की भूमिका को लेकर आशंका, जिसने अब कोविड-19 के स्रोत की जांच की मांग उठाई है, बेल्ट ऐंड रोड इनीशिएटिव तथा रीजनल कॉम्प्रिहेंसिव इकोनोमिक पार्टनरशिप (आरसीईपी) से अलग रहने का भारत का फैसला, ताइवान के नए राष्ट्रपति के शपथ ग्रहण समारोह में दो भाजपा सांसदों की वर्चुअल मौजूदगी, क्वाड में भारत की सहभागिता तथा एलएसी के पास भारत द्वारा अपनी सीमाओं में बुनियादी ढांचे के निर्माण ने चीन को चिंतित कर दिया है, विशेष रूप से, 255 किलोमीटर लंबी सड़क, जो लेह को काराकोरम दर्रे से जोड़ती है और जिसके इस वर्ष के अंत तक पूरा होने की उम्मीद है।
यह सड़क यात्रा में लगने वाला समय कम करेगी और चीन के कब्जे वाले अक्साई चिन इलाके पर नजर रखने में भारत को सक्षम बनाएगी। अगर जरूरत पड़ी, तो इसके जरिये चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे को भी बाधित किया जा सकता है। लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाने से भी चीन चिढ़ा हुआ है।
यह भी हो सकता है कि अमेरिकी वर्चस्व को खत्म कर महाशक्ति देश बनने के अपने ख्वाब की राह में चीन भारत को इसके आकार, आबादी और आर्थिक क्षमता के कारण सबसे बड़ी बाधा मानता हो। इसलिए भारत को हिंसक संघर्ष में फंसाकर और इसके इलाकों पर कब्जा कर वह न केवल प्रमुख वैश्विक खिलाड़ी बनने की भारत की आकांक्षा को खत्म करना चाहता है, बल्कि इस क्षेत्र के अन्य देशों और बाहरी देशों को भी संदेश देना चाहता है कि चीन विरोधी किसी गुट में शामिल होने का परिणाम गंभीर हो सकता है। इसलिए गलवां घाटी में चीनी आक्रामकता को अलग करके नहीं देखना चाहिए, वह एक पूर्व-निर्धारित झड़प थी, जिसे दक्षिण चीन सागर और ऑस्ट्रेलिया में अपने पड़ोसियों के खिलाफ चीन की हाल की आक्रामकता के विस्तार के रूप में देखा जाना चाहिए।
लेकिन भारतीय सैनिकों ने जिस तरह जवाब दिया, जिसके कारण चीनी सेना के दोगुने जवान मारे गए और उनमें से कुछ को उनके वाहनों सहित गिरफ्तार किया गया तथा एलएसी के पास भारतीय हिस्से में किए गए उनके निर्माण कार्य को ध्वस्त किया गया, उसने 1962 की पराजय के भूत को दफन कर दिया। मनोवैज्ञानिक तौर पर इसने भारतीय सेना का मनोबल बढ़ाया होगा और चीनी नेतृत्व को एक सख्त संदेश दिया होगा कि वह भारत को हल्के में न ले। चूंकि चीन द्वारा सीमा पर शांति और स्थिरता का समझौता तोड़े जाने के बाद भारत की ओर से भी वास्तविक नियंत्रण रेखा पर हथियारों के साथ चलने की बात हुई है, ऐसे में, भविष्य में एलएसी पर किसी भी तरह का संघर्ष होने पर ज्यादा खून बहने की आशंका भी चीनी सेना को किसी भी तरह की हरकत से रोकेगी।
एक बार जब यह कोलाहल, आक्रोश, जुनून और जवाबी कार्रवाई का शोर थमेगा, तब दोनों पक्षों को यह एहसास होगा कि सीमा विवाद का सैन्य समाधान नहीं हो सकता। इसके लिए एक राजनीतिक समझौता ही करना होगा, ताकि दोनों देशों की जनता का भला हो। युद्धप्रियता, अपनी वाहवाही और बयानबाजी करने से कोई लाभ नहीं होने वाला। शांत कूटनीति और परिपक्वता व दूरदर्शिता के साथ राजनीतिक संवाद से बेहतर ढंग से सीमा विवाद को हल किया जा सकता है, जो मौजूदा वक्त की जरूरत है।
विजय परेड देखने के लिए रक्षा मंत्री की मास्को में मौजूदगी और विदेश मंत्री की रूस-भारत-चीन बैठक में आभासी मौजूदगी से संभवतः एलएसी पर गतिरोध को लेकर विचारों का आदान-प्रदान हो सकता है। शी और मोदी 18 बार मिले हैं, तीन अनौपचारिक शिखर सम्मेलन सहित। इन बैठकों से उत्पन्न गर्मजोशी, खुशमिजाजी और व्यक्तिगत संबंधों को अब पहले से कहीं अधिक उपयोगी होना चाहिए। चीन को यह एहसास होना चाहिए कि भारत को वह धमका नहीं सकता। बेशक चीन की आर्थिक और सैन्य शक्ति भारत से चार गुना बड़ी है, लेकिन भारत ही एकमात्र वह देश है, जो उसका मुकाबला कर सकता है। चीन को भारत के साथ सम्मानजनक व्यवहार करना चाहिए और पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, मालदीव आदि देशों में उसकी परेशानी बढ़ाने से बचना चाहिए।
अगले दस साल के लिए भारत को अपने घर को व्यवस्थित रखने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए: सामाजिक सद्भाव बनाए रखना, तेजी से आर्थिक विकास करना, बुनियादी ढांचा और रोजगार पैदा करना और एक निवेश अनुकूल माहौल बनाना, जो प्रमुख विदेशी कंपनियों को आकर्षित करेगा। अगर आर्थिक नीतियों का वाहक बनना और उसे लागू करने की संभावना संकुचित है, तो मेक इन इंडिया, आत्मनिर्भर भारत और वैश्विक आपूर्ति शृंखला का केंद्र बनना उसका पूरक हो सकता है।
ऐसे वक्त में जब भारत और चीन, दोनों कोविड-19 से जंग लड़ रहे हैं और उनकी अर्थव्यवस्था में तेजी से गिरावट देखी जा रही है, तब एशिया के ये दो दिग्गज टकराव का सामना नहीं कर सकते। भले ही अमेरिका व अपनी तरह के अन्य लोकतंत्रों के करीबी होने से हमारा राष्ट्रीय हित सधेगा, लेकिन चीन विरोधी किसी खेमे में शामिल होने से फायदा नहीं होने वाला। याद रखिए, अगर युद्ध छिड़ा, तो भारत को उसे अकेले लड़ना होगा।