फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

ऑनलाइन कोचिंग की सीमाएं: एआई की ट्रेनिंग और मुफ्त कोचिंग सराहनीय, क्या देश में तकनीक का प्रभावी नेटवर्क है?

पत्रलेखा चटर्जी
Updated Mon, 24 Aug 2026 08:10 AM IST

सार

मुफ्त कोचिंग और एआई ट्रेनिंग की पहल अच्छी है, पर क्या देश में तकनीक का ऐसा नेटवर्क है, जो इनके लाभ हर बच्चे तक पहुंचा सके?
विज्ञापन
विज्ञापन
ऑनलाइन कोचिंग की अपनी सीमाएं - फोटो : अमर उजाला प्रिंट-एजेंसी


खास बात यह है कि हाल ही में न केवल प्रतियोगी परीक्षाओं के अभ्यर्थी, बल्कि भारत के कई हिस्सों में सरकारी स्कूलों के बच्चे बुनियादी मांग कर रहे थे-हमें ऐसा स्कूल चाहिए, जो ठीक से काम करे। उन्होंने बुनियादी सुविधाओं के लिए मार्च किया, धरने दिए। राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश- हर जगह इसी तरह की मांगें की गईं। इन सभी मामलों में, मांगें बहुत ही सामान्य हैं-शिक्षक, क्लासरूम, बिजली, पानी, शौचालय, पंखे और ठीक से काम करने वाला इंफ्रास्ट्रक्चर। इसमें शामिल बच्चे मुख्य रूप से वे हैं, जिनका जन्म मोटे तौर पर 2010 से 2024-25 के बीच हुआ है। 'कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी)' के 'स्कूल ठीक करो' अभियान ने भी बेहतर बुनियादी स्कूली शिक्षा की व्यापक मांग को उठाया है। वर्षों तक, स्कूलों में शिक्षकों की कमी, टूटे-फूटे क्लासरूम, खराब शौचालय, बिजली की खराब व्यवस्था या खराब सड़कों की शिकायतों के बावजूद कुछ खास बदलाव नहीं होता था। आज, सरकारी स्कूलों के बच्चे अपनी शिकायतों को सामने लाने के लिए आगे आ रहे हैं। उनकी हिम्मत और जज्बे को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।


मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग और एआई ट्रेनिंग के सरकारी वादों का समर्थन किया जाना चाहिए। मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग वास्तव में बड़ा बदलाव ला सकती है। प्रतियोगी परीक्षाओं ने एक विशाल निजी कोचिंग उद्योग खड़ा कर दिया है और जेईई, नीट, सरकारी भर्ती व अन्य परीक्षाओं की तैयारी का खर्च गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों पर भारी पड़ सकता है। इसलिए, प्रधानमंत्री मोदी का यह तर्क मजबूत है कि छात्रों को केवल प्रतियोगिता में टिके रहने के लिए बड़ी रकम खर्च करने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। आईआईटी कानपुर, शिक्षा मंत्रालय के साथ मिलकर पहले से ही साथी नाम का मुफ्त डिजिटल प्लेटफॉर्म चला रहा है। इस पर कई प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए सामग्री उपलब्ध है। यह दिखाता है कि भारत के डिजिटल सार्वजनिक ढांचे और बड़े संस्थानों की विशेषज्ञता को जोड़कर शिक्षा की पहुंच बढ़ाई जा सकती है। अब जरूरत ऐसे प्रयासों को बड़े स्तर पर ले जाने की है।


मगर डिजिटल शिक्षा और वास्तविक शिक्षा तक पहुंच के बीच का अंतर समझना भी उतना ही जरूरी है। ऑनलाइन कोचिंग इस धारणा पर चलती है कि छात्र के पास डिवाइस, पर्याप्त बिजली, इंटरनेट कनेक्शन, पढ़ाई के लिए शांत जगह और स्टडी मटीरियल का लाभ उठाने की समझ पहले से मौजूद है। यानी यह मान लिया जाता है कि बुनियादी शिक्षा व्यवस्था ठीक से काम कर रही है। स्कूलों को लेकर हो रहे विरोध प्रदर्शन हमें इसी बात की याद दिलाते हैं। जिस छात्र के पास ऐसी सुविधाएं हैं, वह मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग का सहारा ले सकता है। लेकिन जिन छात्रों को ये बुनियादी सुविधाएं नहीं मिलतीं, उनके लिए शिक्षा की शुरुआत ही काफी पीछे से होती है।


यही बात सरकार के महत्वाकांक्षी एआई कार्यक्रम पर भी लागू होती है। एक करोड़ युवाओं को एआई की ट्रेनिंग देना निश्चित रूप से एक उत्साहजनक पहल है। सही तरीके से लागू होने पर यह भारत को ऐसी अर्थव्यवस्था के लिए तैयार करने में मदद कर सकती है, जहां तकनीक और एआई तेजी से रोजगार की तस्वीर बदलेंगे। यह कुशल और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी कार्यबल तैयार करने के बड़े लक्ष्य से भी अच्छी तरह जुड़ता है। लेकिन, एआई बुनियादी शिक्षा का विकल्प नहीं हो सकता। किसी बच्चे को उन्नत एआई टूल सिखाने से पहले यह जरूरी है कि वह आत्मविश्वास से पढ़ सके, गणित समझ सके, तार्किक सोच विकसित कर सके और स्कूल में बना रहे। ये क्षमताएं नियमित कक्षाओं, प्रशिक्षित शिक्षकों और बेहतर संस्थानों से ही विकसित होती हैं।


भारत में शिक्षा क्रांति की असली परीक्षा सिर्फ इस बात से नहीं होगी कि कितने ऑनलाइन कोर्स शुरू किए गए या कितने युवाओं को एआई की ट्रेनिंग दी गई, बल्कि इससे होगी कि क्या गांव का बच्चा आसानी से स्कूल पहुंच पाता है, क्लासरूम में उसे शिक्षक मिलते हैं, वह साफ पानी पी पाता है, ठीक-ठाक क्लासरूम में बैठ पाता है और तकनीक से मिलने वाले मौकों का फायदा उठाने के लिए जरूरी बुनियादी जानकारी हासिल कर पाता है। भारत को भविष्य बनाने की महत्वाकांक्षा और उस भविष्य तक ले जाने वाले स्कूलों को बेहतर बनाने के पक्के इरादे की जरूरत है।

विज्ञापन
विज्ञापन
Next