विशेषज्ञ बता रहे हैं कि प्याज में तेजी आवक घटने के कारण नहीं, आपूर्ति अनियमित होने के कारण आई है। अब खरबूजा चाकू पर गिरे या चाकू खरबूजे पर, कटेगा तो खरबूजा ही।
ऐसे ही किसी दर्द भरे लम्हे में मैंने एक खूबसूरत प्याज को निहारते हुए कहा, तू आम आदमी को क्यों रुला रहा है? लोग कहते थे, अपन तो नमक-प्याज से रोटी खाने वाले आदमी हैं। आज बड़े-बड़े होटल वाले सलाद में प्याज गायब कर रहे हैं। तू आम आदमी के निवाले से दूर हो गया है और तुझे भी राशन कार्ड पर खरीदने की नौबत आ गई है। मुझे बस इतना बता दे कि किसान तेरी फसल के सहारे अपने कर्ज से तो मुक्त हो गए हैं न।
इठलाता हुआ प्याज बोल पड़ा, क्या बताएं! मेरा बस चले, तो मैं मंडी में ही न उतरूं। पर क्या करूं? इस देश में न किसान के चाहने से कुछ होता है, न उपभोक्ता के। जहां से मैं चलता हूं, वहां के लोगों को भी मैं राजा नहीं बना पाता, और जहां पहुंचता हूं, वहां भी कम रेट में आम लोगों की थाली में नहीं पहुंच पाता।
लेकिन इससे पहले कि मैं और इमोशनल होता, सोना बीच में कूद पड़ा। देखिए, आप प्याज से प्यार जता रहे हैं और मुझे भूल रहे हैं। मैंने उसे कम्युनिस्ट नजरिये से देखते हुए कहा, सुन स्वार्थी, तू ही असली गुनाहगार है देश की अर्थव्यव्स्था को ध्वस्त करने का। अगर तू इतना न उछलता, तो देश की हालत इतनी पतली न होती। तू खुद तो चमक रहा है, पर लोगों के चेहरे की चमक उड़ा रहा है।
सोना बोला, इसमें मेरी क्या गलती है। जरा रुपये की हालत देखो। जब-जब वह गिरता है, मुझे उठना पड़ता है। तुम क्या जानो कि मुझ पर कितना दबाव है। जिसे देखो, वही मुझे दबाए बैठा है।
अचानक मुझे रुपये पर बेहद गुस्सा आया। मैंने पूछा, क्यों भाई, तुम क्यों इतनी तेजी से नीचे जा रहे हो? वह रुआंसा होकर बोला, मैं कितने महीनों से सारा दबाव खुद पर झेलकर चुपचाप सहता रहता हूं। जब निर्यात न होने के बावजूद दनादन आयात करोगे, तो मेरी हालत तो पतली होनी ही है। डॉलर मेरे साथ मिलकर रहते हैं, तो मेरी भी मौज रहती है। पर डॉलर अंकल के निकल जाने के बाद मुझे पूछता कौन है!
रुपये की बात भी ठीक है। पर यह क्या कि जिसे देखो, वही अपना दुखड़ा सुनाए जा रहा है। मुझे समझते देर न लगी कि इस चक्रव्यूह में मैं चकरघिन्नी की तरह फंसा रह जाऊंगा। सो इन सबको छोड़ मैं अपने रास्ते निकल पड़ा।