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एक वोट वापसी का भी हो

Wed, 29 Mar 2017 07:25 PM IST
वरुण गांधी
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'इसमें कोई संदेह नहीं कि यदि जनप्रतिनिधि कहे जाने वाले व्यक्ति को शक्ति से लैस कर दिया जाए, तो वे दूसरे लोगों की तरह अपनी शक्ति का प्रयोग समुदाय के लाभ के लिए नहीं, बल्कि यदि कर सकते हैं, तो अपने लाभ के लिए करेंगे। -जेम्स मिल
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  ईसा पूर्व पांचवीं सदी में प्राचीन एथेंसवासियों ने अपने अनूठे लोकतंत्र के तहत एक अनूठी सामाजिक परंपरा की शुरुआत की। हर वर्ष उनके दस महीने के कलेंडर में छठे या सातवें महीने (जनवरी या फरवरी) में सभी पुरुष एथेंसवासियों से सभा में पूछा जाता था कि क्या वे बहिष्कार आयोजित करना चाहते हैं। यदि वे पक्ष में मतदान करते, तो दो महीने बाद बहिष्कार का आयोजन होता था, जिसमें नागरिक मिट्टी के बर्तन के टुकड़े पर उन लोगों के नाम लिखते थे, जिन्हें वे समाज से बहिष्कृत करना चाहते थे। और उन सबको एक कलश में रखा जाता था। फिर जिस व्यक्ति के नाम से मिट्टी के बर्तनों के सबसे बड़े ढेर होते, उसे दस वर्षों के लिए शहर में प्रतिबंधित कर दिया जाता था। उचित प्रक्रिया एवं न्याय के अभाव के चलते कई तानाशाहों और भ्रष्टाचार के आरोपी व्यक्तियों को इस तरह भगा दिया जाता।

आज के आधुनिक समय में जनप्रतिनिधियों को वापस बुलाने का अधिकार इस तरह की प्रक्रिया का प्रतिरूप है। वापस बुलाने का (रिकॉल) चुनाव आम तौर पर एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसके जरिये मतदाता चुने हुए प्रतिनिधियों को उनका कार्यकाल पूरा होने से पहले प्रत्यक्ष मतदान के जरिये हटा सकते हैं। कनाडा की ब्रिटिश कोलंबिया विधानसभा ने 1995 से रिकॉल चुनाव को मान्यता दी है, जिसके जरिये मतदाता अपने संसदीय प्रतिनिधि को पद से हटाने के लिए अर्जी दे सकते हैं। रिकॉल चुनाव अमेरिका में भी एक सशक्त औजार है-अलास्का, जॉर्जिया, कंसास, मिनेसोटा, मोंटाना, रोड आईलैंड और वाशिंगटन जैसे प्रांत धोखाधड़ी और दुराचार के आरोप पर रिकॉल चुनाव की अनुमति देते हैं।
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भारत के लिए भी यह कोई नई बात नहीं है। वैदिक काल से ही भारत में 'राजधर्म' की अवधारणा है, जिसमें प्रभावी शासन का अभाव राजा को हटाने का एक कारण होता था। भारत के सुप्रसिद्ध मानवाधिकारवादी एम एन रॉय ने 1944 में विकेंद्रीकृत और शासन के विकसित स्वरूप को प्रस्तावित किया था, जो जनप्रतिनिधियों को चुनने और उन्हें वापस बुलाने की अनुमति देता है। 1974 में जयप्रकाश नारायण ने वापस बुलाने के अधिकार (राइट टु रिकॉल) के बारे में काफी कुछ कहा। वर्ष 2008 में छत्तीसगढ़ नगरपालिका अधिनियम,1961 के तहत लोगों ने तीन निर्वाचित स्थानीय निकाय के प्रमुखों का निर्वाचन रद्द कर दिया। मध्य प्रदेश और बिहार में भी राइट टु रिकॉल स्थानीय निकाय स्तर पर अस्तित्व में है। 2008 में लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने भी राइट टू रिकॉल का समर्थन किया था। गुजरात के राज्य निर्वाचन आयोग ने राज्य सरकार को नगरपालिका, जिले, ताल्लुका और ग्राम पंचायतों में निर्वाचित सदस्यों को वापस बुलाने के लिए कानून में जरूरी संशोधन की सलाह दी।

सच्चे लोकतंत्र में एक ऐसी सरकार की परिकल्पना की गई है, जो लोगों की, लोगों के लिए और लोगों द्वारा चुनी गई हो। दुर्भाग्य से कई बार बहुमत की चुनाव प्रणाली में हर निर्वाचित जनप्रतिनिधि को लोगों का सच्चा जनादेश प्राप्त नहीं होता है। तर्क और न्याय का तकाजा है कि अगर लोगों को अपना जनप्रतिनिधि चुनने का अधिकार है, तो उन्हें जनप्रतिनिधियों के कर्तव्यपालन में विफल रहने या कदाचार में लिप्त होने पर हटाने का भी अधिकार हो। जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 केवल कुछ अपराधों के मामले में जनप्रतिनिधियों को हटाने की मंजूरी देता है और जनप्रतिनिधियों की सामान्य अक्षमता और मतदाताओं की नाराजगी को उन्हें हटाने का कारण नहीं मानता।

'राइट टू रिकॉल' की शुरुआत की प्रक्रिया को बढ़ाने के लिए एक सांसद के तौर पर मैंने अपनी क्षमता के अनुसार जनप्रतिनिधित्व अधिनियम (संशोधन) विधेयक, 2016 पेश करने की अनुमति मांगी है। यह विधेयक लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में निर्वाचित प्रतिनिधियों को वापस बुलाने संबंधी याचिकाओं को पेश करने की कोशिश करता है। ऐसी याचिकाओं पर किसी निर्वाचन क्षेत्र के कम से कम एक चौथाई सदस्यों के हस्ताक्षर होने चाहिए। हालांकि यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि रिकॉल प्रक्रिया एक क्षुद्र कोशिश नहीं है और यह जनप्रतिनिधियों के उत्पीड़न का स्रोत नहीं बन जाए। इसलिए रिकॉल प्रक्रिया में कई सुरक्षा उपायों को शामिल किया गया है, जैसे, प्रारंभिक रिकॉल याचिका से यह प्रक्रिया शुरू होगी और इलेक्ट्रॉनिक मतदान से ही अंतिम परिणाम निर्धारित होगा। यह विधेयक संबंधित हस्ताक्षरों के सत्यापन की सुविधा प्रदान करता है और याचिका की पहली समीक्षा संबंधित सदन के अध्यक्ष द्वारा होगी। इसके अलावा यह सुनिश्चित करता है कि जनप्रतिनिधियों को एक छोटे से अंतर के मतदाताओं द्वारा वापस नहीं बुलाया जा सकता। इस तरह रिकॉल याचिका की सफलता की सीमा उच्च रखी गई है।

पारदर्शिता और स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए निर्वाचन आयोग के भीतर से मुख्य याचिका अधिकारी को इस प्रक्रिया की निगरानी और निष्पादन के लिए नामित किया गया है। इसके अलावा, यह विधेयक कुछ प्रावधानों के संभावित दुरुपयोग को पहचानते हुए तदनुसार ऐसे दुरुपयोग के लिए पर्याप्त से अधिक सजा का प्रावधान करता है। इस तरह का अधिकार शीर्ष स्तर पर जवाबदेही सुनिश्चित करने का तंत्र प्रदान करता है। इस तरह का अधिकार राजनीति में चल रहे अपराधीकरण के साथ-साथ भ्रष्टाचार पर भी नियंत्रण रखेगा।

एक स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव देश के नागरिकों का अधिकार है। जब निर्वाचित प्रतिनिधि मतदाताओं का भरोसा खो देंगे, तो लोगों को उन्हें हटाने का अधिकार मिलना चाहिए। लोकतंत्र की मजबूती के लिए मताधिकार के साथ ही वापस बुलाने का अधिकार भी सुनिश्चित होना चाहिए।
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