‘कोई चांस नहीं'-चुनाव आयोग ने इन्हीं शब्दों के साथ निकट भविष्य में 'एक राष्ट्र-एक चुनाव' की संभावनाओं को खारिज कर दिया है। हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि चुनाव आयोग 2019 में 'एक राष्ट्र-आधा चुनाव' या 'एक राष्ट्र-एक चौथाई चुनाव' के लिए तैयार होगा या नहीं। हालांकि सभी जानते हैं कि थोड़ा-सा भी मौका मिले, तो भाजपा लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराना चाहेगी। इसके पीछे के कारण सर्वविदित हैं-इससे खर्च घटेंगे, इससे शासन के सामने आचार संहिता नहीं होगी, जो बार-बार सरकार के हाथ बांध देती है। लगातार होने वाले चुनाव पूरे राष्ट्र और सुरक्षा बलों को हमेशा व्यस्त रखते हैं। और इसमें हमारे राजनेता सभी काम-धाम छोड़कर मशगूल रहते हैं।
मुसीबत यह है कि चुनावों को अब ऐसी घटना के रूप में नहीं देखा जाता, जो आती और जाती है। चुनाव को लोकतांत्रिक प्रक्रिया का एक स्वाभाविक हिस्सा होना चाहिए। आज आप सत्ता में हैं, कल सत्ता से बाहर हो सकते हैं। और फिर सत्ता में लौट सकते हैं। लेकिन आज चुनाव जीने-मरने का मुद्दा बन गया है, जैसे सब कुछ इसी पर निर्भर है। आज वह संतुलन खत्म हो गया है, जिसका उपयोग अतीत में संसदीय कार्यप्रणाली को प्रभावित करने के लिए किया जाता था। एक नेता की भूमिका चुनाव जीतने की तुलना में निश्चित रूप से अधिक है। पर आज चुनाव को इतनी प्रमुखता दी जाती है कि प्रधानमंत्री को अपनी पार्टी के प्रमुख प्रचारक के रूप में काम करना पड़ता है और कभी-कभी तो केवल वही असली प्रचारक होते हैं।
पिछले हफ्ते हमने वाजपेयी और सोमनाथ चटर्जी जैसे नेताओं को खोया है। और जब आप उनकी भूमिका का आकलन करेंगे, तो आप यह नहीं सोचेंगे कि कितने चुनाव उन्होंने जीते, बल्कि यह देखेंगे कि उन्होंने क्या किया और क्या नहीं तथा बदलाव लाने में उनका क्या योगदान था।
'एक राष्ट्र-एक चुनाव' प्रस्ताव के विरोधियों की चिंता केवल संविधान संशोधन को लेकर नहीं है। चुनाव आयोग भी इसके लिए संसद का समर्थन चाहेगा। एनडीए के पास लोकसभा में पर्याप्त संख्याबल है, पर उच्च सदन में दो तिहाई बहुमत पाने के लिए उसे मशक्कत करनी पड़ेगी। हालांकि सपा और तेलंगाना राष्ट्र समिति जैसी कुछ गैर-राजग पार्टियों ने एक साथ चुनाव का पक्ष लिया है। इससे उच्च सदन में एनडीए की संख्या बढ़ सकती है। लेकिन चुनाव से पहले ये पार्टियां क्या ऐसा कुछ कर सकती हैं, जिससे भाजपा को मदद मिले? एक साथ चुनाव कराने से क्षेत्रीय दलों की कीमत पर अखिल भारतीय पार्टियों को फायदा होगा। इसलिए यह तर्क दिया जाता है कि ऐसा करना संघवाद की भावना के खिलाफ हो सकता है, जिसकी गारंटी संविधान देता है। ऐसे में, लोग लोकसभा व राज्य विधानसभा के चुनावों में फर्क नहीं करेंगे और संभवतः दोनों में एक ही पार्टी को वोट कर सकते हैं। दूसरा चिंताजनक पहलू पांच साल का कार्यकाल है। किसी भी सरकार को पांच साल के लिए मौका मिलेगा, इससे फर्क नहीं पड़ता कि उसका प्रदर्शन कैसा है। उसे बीच में नहीं हटाया जा सकता। इससे सरकार की जवाबदेही का सिद्धांत कमजोर होगा और संसदीय लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका भी घटेगी।
इस तरह से चीजें अध्यक्षीय शासन की तरफ बढ़ रही हैं, जैसे अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की तरह प्रचार, या प्रधानमंत्री का अपने मंत्रियों के भरोसे नहीं (जिन्हें कभी-कभी निर्णय के बारे में सबसे बाद में सूचना मिलती है), बल्कि पीएमओ और नौकरशाही के माध्यम से सरकार चलाना।
पहले भाजपा के आला नेताओं ने संकेत दिया था कि वे 2019 के चुनाव के बाद इस दिशा में बढ़ेंगे, अगर सत्ता में लौटे तो। इस बारे में जितनी बयानबाजी हुई और इससे जो बहस पैदा हुई, उससे लगता था कि वास्तव में सरकार 2019 के लिए इसके प्रति गंभीर नहीं थी। लेकिन तीन केंद्रीय मंत्रियों द्वारा इसे आगे बढ़ाने के लिए दबाव डालने हेतु विधि आयोग के दौरे के बाद अमित शाह द्वारा आयोग को लिखी हालिया चिट्ठी से हालात बदल गए हैं। राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में अपनी संभावनाओं को लेकर भाजपा चिंतित है, जहां जनवरी, 2019 में नई विधानसभा गठित करने की जरूरत है। कुछ सर्वेक्षणों ने संकेत दिया है कि भाजपा तीनों राज्यों में चुनाव हार सकती है, और वहां कांग्रेस को लाभ होने की भविष्यवाणी की गई है।
चर्चा है कि 2019 में लोकसभा चुनाव के साथ 11 राज्यों में विधानसभा चुनाव कराए जा सकते हैं, जिनमें राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ भी शामिल होंगे। इसके पीछे विचार यह होगा कि मोदी का व्यक्तित्व मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में पंद्रह वर्षों के सत्ता- विरोधी रुझान तथा राजस्थान में वसुंधरा सरकार के खिलाफ मजबूत असंतोष की भावना को खत्म कर देगा। ग्यारह राज्यों में राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के अलावा वैसे राज्य हैं, जहां भाजपा की सरकार है और जहां लोकसभा के साथ चुनाव होते हैं। लेकिन इसमें बिहार भी शामिल है, जहां भाजपा गठबंधन की सरकार है। लेकिन नीतीश कुमार को अपना कार्यकाल दो साल घटाने के लिए क्यों तैयार होना चाहिए, जबकि उनका भविष्य अनिश्चित दिखाई देता है?
अमित शाह ने साफ कर दिया है कि पार्टी लोकसभा की अवधि कम नहीं करने जा रही, इसलिए समय से पहले लोकसभा चुनाव कराने की बात नहीं है। 2004 में समय से पहले लोकसभा चुनाव कराने पर एनडीए की हार हुई थी। ऐसे में, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में लोकसभा चुनाव के साथ चुनाव कराने का एकमात्र रास्ता है, जो तब तक संभव नहीं है, जब तक कि तीनों मुख्यमंत्री स्वेच्छा से अपना कार्यकाल खत्म होने से पहले इस्तीफा न दे दें, (सैद्धांतिक रूप से यह संभव है, जब छह महीने के भीतर संसद राष्ट्रपति शासन को अनुमोदित कर दे।) लेकिन सवाल उठेगा कि क्यों। और कांग्रेस द्वारा इसे अदालत में चुनौती देने की भी उम्मीद है। ऐसे में लोकसभा चुनाव से पहले स्थिति खराब हो सकती है। इसलिए भाजपा अब भी जमीनी स्तर से फीडबैक हासिल कर रही है। यही वजह है कि पार्टी ने अभी अपना मन नहीं बनाया है और मुद्दे को गर्माए रखकर विकल्प खुला रखा है।