सेंट स्टीफन कॉलेज से निकले, न्यू स्टेट्समैन जैसी पत्रिका में समीक्षा लिखने वाले और देश-दुनिया के दिग्गज बौद्धिकों से दोस्ताना संबंध रखने वाले के. नटवर सिंह अगर आत्मकथा को इतनी हल्की विधा समझते हैं, तो यह आश्चर्यजनक है।
नटवर सिंह की आत्मकथा ‘वन लाइफ इज नॉट इनफ-एन ऑटोबायोग्राफी’ को पढ़कर ऐसा ही लगता है। करीब चार सौ पेज की इस किताब में लेखक के बालपन, शिक्षा, रोजगार और पटियाला की राजकुमारी से प्रेम और विवाह में ही उनका निजी जीवन झांकता है। बेटी की दुखद मृत्यु भी यहां कुछ पंक्तियों में सिमट गई है। अपने व्यक्तिगत जीवन के कई असुविधाजनक और दुखद प्रसंगों पर भी उन्होंने अर्थपूर्ण चुप्पी साध ली है।
नटवर सिंह की इस किताब के कुछ हिस्से पठनीय हैं, इसमें संदेह नहीं। मसलन, इसमें प्रधानमंत्री के तौर पर जवाहर लाल नेहरू की कार्यशैली और उनकी बौद्धिक छवि का पता चलता है।
इंदिरा गांधी की दो बुआ-विजयलक्ष्मी पंडित और कृष्णा हठीसिंह के द्वंद्व के ब्योरे भी यहां हैं। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बारे में उन्होंने लिखा है-वह कैबिनेट की बैठकों में असहज रहती थीं और संसद में भी। आर्थिक मुद्दे उन्हें पसंद नहीं आते थे और सामाजिक समारोहों में वह बमुश्किल नजर आती थीं।
दुर्दांत लिट्टे सरगना वेलुपिल्लई प्रभाकरन से कांग्रेस नेतृत्व की नजदीकी के जो ब्योरे उन्होंने दिए हैं, वे बेहद चौंकाने वाले हैं। नटवर सिंह बताते हैं कि नवंबर, 1986 में बेंगलूरू में आयोजित दक्षेस सम्मेलन में तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री एम.जी.रामंचद्रन प्रभाकरन को साथ लाए थे।
उसके बाद प्रभाकरन लगातार दिल्ली आए और एक होटल में राजीव गांधी ने उनसे मुलाकात भी की।
लेकिन जहां विदेशनीति का मुद्दा आया नहीं कि नटवर सिंह की प्रतिभा अपने प्रधानमंत्रियों पर हमलावर हो जाती है। यहां इसका जिक्र है कि जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी ने अफ्रीकी देशों से जैसे दोस्ताना संबंध बना रखे थे, मोरारजी देसाई और चरण सिंह के दौर में वह रिश्ता नहीं रहा, क्योंकि इन्हें अफ्रीकी राजनीति की वैसी समझ ही नहीं थी।
श्रीलंका के घरेलू मुद्दे में टांग फंसाने के लिए नटवर सिंह ने राजीव गांधी की न सिर्फ खिंचाई की है, बल्कि ऐसा जताया है, मानो उनके बजाय (स्वर्गीय) जे.एन.दीक्षित से सलाह लेने के कारण ही चीजें इस हद तक बिगड़ीं।
नटवर सिंह ने यह तक दावा किया है कि राजीव गांधी ने उन्हीं की सलाह पर चीन का दौरा किया था। जबकि सच्चाई यह है कि बीजिंग ने तब हमारे तत्कालीन राजदूत से राजीव गांधी की चीन यात्रा के बारे में कहा था।
आत्मकथा के बहाने यह पुस्तक भारतीय राजनीति में गांधी परिवार की दो कद्दावर शख्सियतों-इंदिरा और सोनिया गांधी के साथ लेखक के संबंधों पर भी केंद्रित है। नटवर ने एकाधिक अवसरों पर इंदिरा गांधी के प्रति अपनी निष्ठा साबित की थी। इसका उन्हें लाभ भी मिला।
आपातकाल का सीधा समर्थन न करते हुए भी नटवर उसके विरोधी नहीं थे। इसका सुबूत यह है कि किताब में आपातकाल की ज्यादतियों का जिक्र तक नहीं है। लेखक की आत्ममुग्धता की पराकाष्ठा वहां दिखती है, जब इंदिरा गांधी ने उन्हें भारत में गुटनिरपेक्ष और राष्ट्रमंडल शिखर सम्मेलन के आयोजनों का जिम्मा दिया और बाद में सफल आयोजन के लिए उन्हें बधाई संदेश भेजा।
इसी को उपलब्धि बताकर नटवर सिंह ने पद्म सम्मानों के लिए सरकार को कुछ नामों की सूची जिस तरह भेजी, वह तो चापलूसी की हद है। प्रधानमंत्री ने इस पर आपत्ति जताई, तो उन्होंने इसका विरोध किया और आखिरकार खुद पद्म भूषण हासिल करके माने!
जिस जल्दी में यह किताब लिखी और प्रचारित की गई, उसका उद्देश्य सोनिया गांधी को निशाना बनाना भी है। सोनिया गांधी द्वारा रिश्ता खत्म कर देने के बाद उन्हें याद आया है कि वह कांग्रेस की अब तक की सबसे ताकतवर अध्यक्ष हैं!
सोनिया और प्रियंका ने उनसे मिलकर 2004 में यूपीए के प्रधानमंत्री पद का किस्सा हटाने का अनुरोध किया, तो नटवर सिंह की टिप्पणी थी-मेरी किताब को कोई संपादित नहीं कर सकता। सच यह है कि वोल्कर रिपोर्ट में नाम आने पर कांग्रेस ने नटवर सिंह से दूरी बनाई।
लेकिन इस बारे में लिखते हुए भी नटवर ने अपनी, अपने बेटे और उसके दोस्त की भूमिका के बारे में कुछ नहीं बताया। सिर्फ यह कह देना काफी नहीं कि वह निर्दोष हैं। उन्हें इस सच से भी पर्दा उठाना चाहिए था कि इराक में अनाज के बदले तेल कार्यक्रम में अगर कांग्रेस पार्टी को नाजायज फायदा दिलाया गया, तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है।
तथ्यों-घटनाओं को अपने हित में पेश कर और अपने हिस्से का सच छिपाकर थोड़े समय के लिए सनसनी भले पैदा कर दी जाए, पर लेखकीय ऊंचाई हासिल नहीं की जा सकती।