आज हम घर बैठे मोबाइल पर एक क्लिक से मनचाही चीज ऑर्डर कर मंगवा सकते हैं। हालांकि डिजिटल क्रांति ने अभूतपूर्व सुविधाएं मुहैया कराईं हैं। लेकिन डिजिटल प्रदूषण का खतरा भी पैदा किया है। एक लैपटॉप बनाने के लिए दुनिया भर के देशों से दर्जनों धातुओं की आवश्यकता होती है। उनके निष्कर्षण के लिए बहुत अधिक (जीवाश्म) ऊर्जा, पानी और संसाधनों की आवश्यकता होती है। ई-मेल भेजने, ऑनलाइन वीडियो देखने या वीडियो कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लेने के लिए आपका डिवाइस दुनिया भर में स्थित सर्वर से जुड़ता है, जो संचालन और ठंडा करने के लिए भारी मात्रा में ऊर्जा की खपत करते हैं। एक ई-मेल चार ग्राम कार्बन डाईऑक्साइड का उत्सर्जन करता है। यदि आप ई-मेल में एक अटैचमेंट जोड़ते हैं, तो यह उत्सर्जन 50 ग्राम कार्बन डाईऑक्साइड तक पहुंच सकता है। इसी तरह एक गूगल सर्च की ऊर्जा खपत 60 वाट के बल्ब को 17 सेकंड तक जलाए रखने के बराबर होती है। फाइनल स्ट्रॉ फाउंडेशन की रिपोर्ट के मुताबिक, वैश्विक स्तर पर 60 सेकंड में 19 करोड़ ई-मेल किए जाते हैं।
सोशल मीडिया मैसेंजर व्हाट्सएप पर करीब छह करोड़ मैसेज भेजे जाते हैं। सर्च इंजन गूगल पर 41 लाख लोग सर्च करते हैं। यू-ट्यूब पर 60 सेकंड में 43 लाख वीडियो देखे जाते हैं। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने अपने शोध में दावा किया है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) से हो रहे कार्बन उत्सर्जन के कारण 2030 तक अमेरिका में 1,300 लोग हर साल अकाल मौत का शिकार होंगे। भारत की संसद में हाल ही में शीतकालीन सत्र के दौरान सरकार ने एक प्रश्न के लिखित उत्तर में बताया कि पिछले पांच वर्षों में स्मार्टफोन, कंप्यूटर, टेलीविजन सेट और रेफ्रिजरेटर जैसे इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से उत्पन्न ई-कचरे में 72 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। ऐसे में चुपके से पांव पसार रहा डिजिटल प्रदूषण हमारे समाने नई चुनौती बनकर खड़ा हो रहा है। इस नए प्रदूषण से निपटने की हमारी क्या तैयारी होनी चाहिए, इस पर हर एक डिजिटल नागरिक को चिंतन-मंथन करने की जरूरत है।