हिंदी के प्रख्यात कवि शमशेर बहादुर सिंह अपने एक शेर में कहते हैं, जी को लगती है तेरी बात खरी है शायद/वही शमशेर मुजफ्फरनगरी है शायद। शमशेर जमीन से जुड़े कवि थे। इसीलिए वह मुजफ्फरनगर की मिट्टी से जुड़ा होने पर गर्व महसूस करते थे। उनका पैतृक गांव एलम मुजफ्फरनगर जनपद के अंतर्गत आता था, पर 2011 में शामली को नया जनपद बना दिया गया। नए परिसीमन के अनुसार एलम शामली जनपद के अंतर्गत आता है। दरअसल मंगलेश डबराल, शमशेर बहादुर सिंह पर केंद्रित शमशेर रचनावली पर काम कर रहे थे। मंगलेश जी की मृत्यु से करीब दो महीने पहले मेरे पास उनका फोन आया। उन्होंने मुझसे कहा कि आप शमशेर के गांव एलम जाकर उनके परिवारिक जीवन और वहां के समाजशास्त्र की जानकारी प्राप्त करो। मैंने एलम जाकर कुछ जानकारी और फोटो उन्हें भेजे, तो वह बहुत खुश हुए। उन्होंने मुझसे कहा कि तुमने मेरा बहुत बड़ा काम कर दिया। ये जानकारियां शमशेर रचनावली में बहुत काम आएंगी। और जब मंगलेश जी की मृत्यु का समाचार प्राप्त हुआ, तो मैं स्तब्ध रह गया।
हिंदी भाषी समाज अपने लेखकों और कवियों से इस कदर बेखबर है कि लोग प्रतिष्ठित रचनाकारों को भी उनके अपने ही गांव में नहीं जानते। शमशेर का जन्म एलम में हुआ, पर पिता की नौकरी के कारण वह बचपन से ही एलम से बाहर रहे। उनकी शिक्षा देहरादून में हुई और उनकी कर्मभूमि भी मुजफ्फरनगर नहीं रही। हालांकि पिछले कुछ समय से स्थानीय अखबारों में शमशेर के बारे में छपने लगा है, इसलिए उनके गांव में लोग शमशेर को जानने लगे हैं। अब एलम में शमशेर के चचेरे भाई बिशंभर सिंह पंवार का परिवार रहता है।
गांव में शमशेर का पुराना मकान अब मौजूद नहीं है। जहां शमशेर के पिता जी रहते थे, वहां शमशेर के भतीजे बलराज सिंह का परिवार नवनिर्मित घर में रहता है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि एलम गांव में शमशेर से जुड़ी कोई ऐसी जगह या सामग्री मौजूद नहीं है, जो उनकी स्मृति को ताजा कर सके। बलराज सिंह के पास शमशेर की कुछ किताबें जरूर मौजूद हैं। हाल ही में एलम नगर पंचायत ने शमशेर के सम्मान में शमशेर बहादुर सिंह स्मृति जलप्रपात का निर्माण जरूर कराया है। इस जलप्रपात पर शमशेर का संक्षिप्त परिचय और उनकी पुस्तकों के नाम लिखे गए हैं। इसकी स्थिति देख लग रहा था कि इसमें पानी का प्रवाह होता ही नहीं है। इसका निर्माण औपचारिकता के लिए किया गया है। कई जगह लिखा मिलता है कि शमशेर का जन्म देहरादून में हुआ था। जब मैंने बलराज सिंह से पूछा, तो उन्होंने बताया कि शमशेर का जन्म एलम में ही हुआ था।
डॉ. रंजना अरगड़े ने भी यही बात कही। डॉ. अरगड़े गुजरात विश्वविद्यालय, अहमदाबाद में हिंदी विभागाध्यक्ष रही हैं और शमशेर अंतिम दिनों में काफी समय तक उनके यहां रहे थे। इसी तरह हर जगह शमशेर की जन्मतिथि 13 जनवरी 1911 लिखी मिलती है। एलम गांव में शमशेर की स्मृति में निर्मित जलप्रपात पर भी उनकी जन्मतिथि यही लिखी गई है। पर शमशेर के छोटे भाई डॉ. तेजबहादुर चौधरी अपनी पुस्तक मेरे बड़े भाई शमशेर जी में लिखते हैं, 'भइया की जन्म की तिथि भी गलत अंकित की गई जगह-जगह। मैंने जो जन्म तिथि दी है, वह उनके शिक्षा संस्थानों के प्रमाण-पत्रों से दी है, जो कि तीन जनवरी 1911 है, न कि 13 जनवरी 1911। फिर एक बात और पिताजी बताया करते थे कि हम दोनों के नाम जन्म के समय और ही रखे गए थे। भइया का नाम था कुलदीप सिंह और मेरा रामप्रसाद।'
मैंने सुझाव दिया गांव में शमशेर से जुड़ी चीजों का संग्रह किया जाना चाहिए, ताकि एक छोटा-सा संग्रहालय बनाया जा सके। शमशेर को प्यार करने वाले इस गांव को देखना चाहते हैं, पर यहां आकर निराश होते हैं। शमशेर के परिजन वादा करते हैं कि वे जल्दी ही शमशेर से जुड़ी हुई चीजें जरूर गांव में लाएंगे। एलम से लौटते हुए मेरे दिमाग में वे शब्द घूमने लगते हैं, जो डॉ. तेजबहादुर चौधरी ने अपनी पुस्तक में लिखे हैं-'बहुत पहले मैंने अपने बड़े भाई शमशेर से कहा कि आपने जो भी लिखा है, वह इधर-उधर बिखरा पड़ा हुआ है, कुछ स्वार्थी उन्हें प्रकाशित कराकर लाभ उठाना चाहते हैं। वह बोले-उठाने दो, मैंने जो भी लिखा है, अपनी आत्मा की शांति के लिए लिखा है। और साहित्य जगत के लिए लिखा है। उससे पैसा कमाना, अपना महत्व जताना मैं ठीक नहीं समझता। साहित्य गलियों में साग-सब्जी की तरह नहीं बिकता, वह तो जमाने भर के मूल्यांकन करने वालों के लिए, उसमें और योगदान करने वालों के लिए साहित्यकार छोड़ जाता है, न कि चील-कौवों की तरह उसे नोंच-नोंचकर खाने वालों के लिए।' शमशेर के ये शब्द उतने ही सच्चे है, जितने शमशेर सच्चे थे।