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परंपरा के नाम पर

सुभाषिनी सहगल अली Updated Thu, 15 Nov 2018 05:59 PM IST
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सुभाषिनी सहगल अली

सबरीमाला मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने अपना फैसला सुना दिया। मामले पर पुनर्विचार करने की याचिकाओं पर वह खुली अदालत में आगामी 22 जनवरी को ही सुनवाई करेगा। तब तक के लिए पिछला फैसला ही जारी रहेगा। फिर क्या था? हिंदू धर्म के स्वयंभू रक्षक ट्विटर और सोशल मीडिया पर टूट पड़े। उन्होंने कहा कि नारीवादियों के खिलाफ उनकी जंग दो महीनों तक चलेगी। अयप्पा धर्म सेना के अध्यक्ष राहुल ईश्वर ने कुछ महीने पहले यह कहकर चौंका दिया था कि अगर एक भी महिला मंदिर में घुस जाएगी, तो उनके चेले अपना खून बहाकर मंदिर को अपवित्र कर उसे बंद करवा देंगे। मंदिर की पवित्रता को महिलाओं से बचाने वाले खुद मंदिर को अपवित्र बनाने की धमकी दे बैठे। अपने ही धर्म का पालन करने वाली महिलाओं के प्रति इतनी हिंसात्मक घृणा क्यों?



यह स्पष्ट होता जा रहा है कि कांग्रेस और संघ परिवार, दोनों राजनीतिक लाभ के लिए महिला-प्रवेश के खिलाफ हिंसात्मक आंदोलन को तूल दे रहे हैं। समाज का बड़ा हिस्सा पुरुष प्रधानता की सोच से इस हद तक प्रभावित है कि परंपरा और धर्म की रक्षा के नाम पर वह केवल उनके मंदिर प्रवेश के विरोध में जुट ही नहीं गया है, बल्कि उनके खिलाफ हिंसात्मक धमकी और शर्मनाक भाषा का इस्तेमाल करने में घिनौनी संतुष्टि प्राप्त कर रहा है।


असमान समुदायों को हमेशा परंपरा और धर्म के नाम पर असमान रखने की कोशिश हुई है राजा राममोहन राय ने, जिनकी आंखों के सामने उनकी भाभी को उनके भाई के शव के साथ जलाया गया था, सती प्रथा के खिलाफ लंबा संघर्ष किया। बाल विवाह समाप्त करने के लिए जब कई प्रगतिशील भारतीयों के समर्थन के साथ अंग्रेज सरकार कानून बना रही थी, तब तिलक जैसे राष्ट्रवादी नेता ने कहा, ‘हम नहीं चाहेंगे कि सरकार हमारी सामाजिक परंपराओं और जीवन शैली को किसी तरह से नियंत्रित करे, भले ही सरकार की वह कार्यवाही कितनी ही परोपकारी और उचित क्यों न हो!' हिंदू महिलाओं को समान अधिकार देने के डॉ. आंबेडकर के अथक प्रयासों का कितना जबर्दस्त विरोध परंपराओं के नाम पर हुआ और यह अधिकार उन्हें कितने धीरे-धीरे, किस्तों में ही मिल पाए, यह किसी से छिपा नहीं है।


इस तरह के विरोध का सामना दुनिया के तमाम हिस्सों में, तमाम धर्मों की महिलाओं को करना पड़ा है। आज भी बोहरा समाज बच्चियों के खतने की बर्बर रीति को त्यागने के लिए तैयार नहीं है। जबकि इसको समाप्त करने के लिए बोहरा महिलाओं ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। वोट पाने के अधिकार के लिए जब इंग्लैंड और अमेरिका की महिलाओं ने सड़कों पर प्रदर्शन किया, तो पुरुषों की टोलियों ने भद्दी गालियों और जूते-लात के साथ उन पर वार किया। सऊदी अरब की महिलाएं जब गाड़ी चलाने के अधिकार के लिए मुहिम चला रही थीं, तो वहां के धार्मिक गुरुओं ने कहा कि अगर उनकी बात मान ली गईं, तो महिलाएं अपनी शुचिता ही खो डालेंगी। बहुत बड़ी कीमत चुकाकर महिलाओं ने कुछ अपूर्ण अधिकार पाए हैं, कुछ न्यायोचित कानून बनवाए हैं। कानून बनने के बाद भी समाज की मानसिकता में परिवर्तन सतही स्तर पर ही हुआ है। अगर कानून की शरण से महिलाओं को वंचित कर दिया जाए, तो बहुत जल्दी वे फिर सदियों पुराने अत्याचार और अनाचार की शिकार बन जाएंगी।


आज हमारे देश के दो बड़े राजनीतिक दलों में इस बात की होड़ लगी है कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की अवहेलना कौन अधिक करती है। यह कहकर कि ‘धार्मिक मामलों में न्यायालय का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं किया जाएगा’, वे महिलाओं को केवल असमान और अधिकार विहीन बनाने की दिशा में ही नहीं धकेल रहे, बल्कि असमान समाज को समान बनाने का प्रयास करने वाले संविधान को ही जोखिम में डाल रहे हैं। 

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