प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज शाम अपने दूसरे कार्यकाल के लिए शपथ ग्रहण करेंगे, ऐसे में यह स्पष्ट है कि अगर भारत को विश्व व्यवस्था में अपना महत्व फिर से हासिल करना है, तो विदेशी मामलों के लिए उनकी सरकार से पर्याप्त समय देने की अपेक्षा की जाएगी। 'पड़ोसी पहले' की नीति को ध्यान में रखते हुए ही प्रधानमंत्री मोदी ने इस बार अपने शपथ ग्रहण समारोह में बिम्सटेक देशों (बंगाल की खाड़ी के आसपास स्थित देशों) के नेताओं को आमंत्रित किया है।
बिम्सटेक देशों के नेताओं को आमंत्रित करने का खास महत्व है। सबसे पहला तो यही कि पाकिस्तान को अलग-थलग करना है। पिछले कुछ वर्षों से सार्क में पाकिस्तान रुकावटें डाल रहा था, जिसके चलते नई दिल्ली में यह विचार हो रहा था कि किस तरह से हम पाकिस्तान को छोड़ अपने बाकी पड़ोसियों से बेहतर संबंध कायम करें। इस लिहाज से बिम्सटेक देशों का चयन महत्वपूर्ण है। दूसरी बात भारत के पूर्वी पड़ोसी देशों में ही विकास हो रहा है, पश्चिमी पड़ोसी देशों में तो उथल-पुथल का माहौल है। बिम्सटेक में वे सभी पूर्वी पड़ोसी देश शामिल हैं, जिससे भारत को फायदा हो सकता है।
बिम्सटेक देशों की आबादी दुनिया की आबादी का लगभग 22 फीसदी है और इन देशों की कुल जीडीपी 28 खरब डॉलर है, इसलिए इनके साथ बेहतर रिश्ते होने पर व्यापार का भी फायदा हो सकता है। इसके अलावा पिछले कुछ वर्षों में इन देशों में चीन का दबाव बढ़ा है, जिसे भारत कम करना चाहता है। इस तरह इन देशों को आमंत्रित करके प्रधानमंत्री मोदी ने रणनीतिक कदम उठाया है।
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने इस क्षेत्र में शांति के लिए मोदी के साथ काम करने की इच्छा दोहराई, मगर इसके बावजूद उन्हें इस महत्वपूर्ण आयोजन में आमंत्रित नहीं किया गया है। असल में सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान आतंकवाद को गुपचुप तरीके से पनाह देने की नीति छोड़कर ईमानदारी के साथ आतंकवाद से निपटने को तैयार होगा, जैसा कि मोदी जोर देते हैं? इमरान खान के लिए ऐसा करना आसान नहीं होगा, क्योंकि वहां के भारत विरोधी जिहादी समूह पाकिस्तानी सेना के लिए सामरिक संपत्ति हैं, जिन पर उनका कोई नियंत्रण नहीं है। और जैसा कि मोदी ने अपने पहले कार्यकाल से सीखा है, जब तक पाकिस्तान के आतंकी समूह कायम हैं, पाकिस्तान के साथ औपचारिक जुड़ाव निरर्थक कवायद है।
भारत को सबसे बड़ा फायदा जून के अंत में जापान में जी-20 देशों के प्रमुखों के साथ मोदी द्वारा अपने संबंधों को नवीनीकृत करने से मिल सकता है। मोदी को अपनी विकास योजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए निवेश की जरूरत है और जी-20 देशों की हिस्सेदारी वैश्विक जीडीपी में 85 फीसदी और विश्व व्यापार में 75 फीसदी है।
प्रधानमंत्री के रूप में अपने पहले कार्यकाल में पिछले पांच वर्षों में मोदी ने विदेशों से औसतन 52.2 अरब डॉलर वार्षिक निवेश हासिल किया। लेकिन मोदी को निश्चित रूप में भारत में अधिक निवेश लाने का लक्ष्य बनाना चाहिए। अगर भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी सैन्य केंद्रित संबंधों से आगे बढ़ने जा रही है, तो भारत को देने से ज्यादा लेने की ट्रंप की इच्छा के बावजूद विशेष रूप से अमेरिका के साथ भारत के आर्थिक संबंधों को आगे बढ़ाना चाहिए। इस समय भारत-अमेरिका संबंधों का फोकस मुख्य रूप से भारत को अमेरिकी हथियारों की बिक्री और आतंकवाद विरोधी पहल पर है। लेकिन जैसा कि हमने देखा है, आतंकवाद को समर्थन देने और प्रायोजित करने को लेकर पाकिस्तान को दंडित करने के मामले में अमेरिकी प्रशासन का रवैया सुस्त रहा है, भले ही उसने मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र से आतंकवादी घोषित करवाने में कड़ी मेहनत की।
अगले पांच वर्षों में भारत को सबसे बड़ी सामरिक चुनौती पाकिस्तान से नहीं, बल्कि चीन से मिलने वाली है। कई दशकों से चीन ने भारत की क्षमता को बेअसर करने और इस्लामाबाद की आर्थिक व सैन्य मदद कर पाकिस्तान का इस्तेमाल करते हुए नई दिल्ली को उलझाए रखने का काम किया है। यहां तक कि हमारी सीमाओं के साथ उसने अपनी आधारभूत संरचनाओं का काफी विकास किया है, और हिमालय तथा हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की सैन्य क्षमता मौजूद है।
लेकिन दो एशियाई दिग्गजों की शक्ति में असमानता सबसे अधिक अर्थव्यवस्था को लेकर है। चीन की अर्थव्यवस्था भारत से पांच गुना ज्यादा है और तकनीकी दिग्गज के रूप में उनकी निरंतर प्रगति अमेरिका को टक्कर दे रही है। अब यह मोदी सरकार को फैसला करना है कि वह चीन की हुआवेई कंपनी के साथ जाए या 4 जी से 5 जी के लिए वेस्टर्न नेटवर्क का रुख करे, क्योंकि इससे हमारी सैन्य और तकनीकी क्षमता पर असर पड़ेगा। कहा जाता है कि 5 जी नेटवर्क कृत्रिम बुद्धिमत्ता, थिंग्स ऑफ इंटरनेट और स्वायत्त फ्लेटफार्म के जरिये भारत की ज्ञान अर्थव्यवस्था को बदल देगा, ये सभी सैन्य और असैन्य प्रौद्योगिकी को करीब ले आएंगे। इस प्रकार भारत जो भी फैसला लेगा, उसकी विदेश नीति के लिए निहितार्थ होंगे।
अमेरिका द्वारा ईरान को दंडित करने के फैसले पर अड़े रहने के कारण खाड़ी क्षेत्र में तनाव बढ़ने का नई दिल्ली पर भी असर पड़ेगा-खासकर भारत की ऊर्जा सुरक्षा जरूरतों और खाड़ी क्षेत्र में 60 लाख से ज्यादा रहने वाले भारतीयों के भाग्य को लेकर। विश्लेषकों का कहना है कि 2040 तक भारत तेल आयात के मामले में चीन को पीछे छोड़कर सबसे बड़ा तेल आयातक बन जाएगा। इसलिए भारत को पश्चिम एशिया में अपने हितों को सुरक्षित रखना चाहिए, क्योंकि अरब देश भारत के लिए कच्चे तेल का बड़ा स्रोत हंै, जहां से भारत अपनी जरूरत का दो तिहाई तेल आयात करता है, लेकिन इसमें धीरे-धीरे कमी आ सकती है, क्योंकि भारत इसके लिए अफ्रीकी उत्पादों पर ध्यान केंद्रित करने लगा है। लेकिन जिस तेजी से भारत की ऊर्जा मांग बढ़ रही है (यह अभी विश्व का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता है, जिसकी आयात निर्भरता 2031 तक बढ़कर 90 फीसदी होने का अनुमान है), यह एक बड़ी दीर्घकालीन चुनौती होगी। अगर भारत को अपनी पूरी क्षमता के साथ विकास करना है, तो ऊर्जा आपूर्ति को सुनिश्चित करना हमारी प्राथमिकता में होना चाहिए।