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गन्ना, लीची, बच्चे, श्वान आदि-इत्यादि : चीख के एक तरफ गन्ना है दूसरी तरफ लीची

यशवंत व्यास Published by: Avdhesh Kumar Updated Mon, 24 Jun 2019 05:42 AM IST
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- फोटो : amar ujala

अपने क्या कभी गन्ना काटा है? बीड़, मराठवाड़ा की मजदूरिनें अपने पति के साथ मिलकर ठेकेदार से एक करार करती हैं। एक टन गन्ने काटने के ढाई सौ रुपए। कुल चार से पांच महीनों का काम जिसमें तीन सौ टन काटकर मिले पैसों से साल भर उनकी गृहस्थी चलेगी। इसलिए एक दिन भी छूट जाए तो क्या हो? और वह भी जब, मासिक धर्म के चलते हो तो क्या हो? उन चार दिनों के बदले पांच सौ रुपए रोज की पेनल्टी लगेगी और पैसा कट जाएगा सो अलग। तो मजदूरिन क्या करे? वह कोख के उस हिस्से से ही मुक्त हो जाती है, जिसके चलते जीवन का यह चक्र उसके जीवन को जीवन बनाने के लिए बनाता है। 

गांव के गांव - जहां औरतों ने गर्भाशय निकाल दिए हैं। सर्जरी के लिए भी ठेकेदार एडवांस देने को तैयार बैठा है। उधार कटाओ, मुक्त हो जाओ। गन्ना कट रहा है। मिलों में जा रहा है। शक्कर बन रही है। आपकी जीभ की मिठास में जो शक्कर आती है, उसमें एक कोख की चीख भी होती है। पर आपको सुनाई नहीं देती।



चीख के एक तरफ गन्ना है, दूसरी तरफ लीची है। मीठे से मीठे का भाग दो तो कुल कितना मीठा बचा? सयाने कहते हैं मुजफ्फरपुर में भूखे बच्चे लीची खा जाते हैं, इसलिए उसके जहर से मर जाते हैं। ‘चमकी बुखार’ का कोई इलाज नहीं है, वो तो मरेंगे। ये तो सालाना उत्सव है। इसमें सरकार बेचारी क्या करे? जैसे होली, दीवाली, ईद आती है, वैसे ये भूखे बच्चों की लीची-मौत भी आती है। रिपोर्टर ‘चमकी’ से त्रस्त आईसीयू में घुस गए हैं, डॉक्टर कांप रहे हैं, बच्चे बेहोश हैं, मांएं रो रही हैं, सरकारें भरे पेट लीची खा रही हैं।

भरे पेट खाने पर लीची ज्यादा मीठी और अतिरिक्त तौर पर स्वादिष्ट लगती है। तब आपको अस्पताल, बीमारी, गरीबी, डॉक्टर, इंतजाम, मृत्यु, जीवन आदि पर उत्कृष्ट विचार आते हैं। भूखों ने गलती की। भूखे हमेशा गलती करते हैं, क्योंकि वे भूखे हैं। वे पेट भर लेते तो लीची जैसी लजीज चीज को बदनाम करने से बच जाते।

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- फोटो : amar ujala
अपने क्या कभी गन्ना काटा है? बीड़, मराठवाड़ा की मजदूरिनें अपने पति के साथ मिलकर ठेकेदार से एक करार करती हैं। एक टन गन्ने काटने के ढाई सौ रुपए। कुल चार से पांच महीनों का काम जिसमें तीन सौ टन काटकर मिले पैसों से साल भर उनकी गृहस्थी चलेगी। इसलिए एक दिन भी छूट जाए तो क्या हो? और वह भी जब, मासिक धर्म के चलते हो तो क्या हो? उन चार दिनों के बदले पांच सौ रुपए रोज की पेनल्टी लगेगी और पैसा कट जाएगा सो अलग। तो मजदूरिन क्या करे? वह कोख के उस हिस्से से ही मुक्त हो जाती है, जिसके चलते जीवन का यह चक्र उसके जीवन को जीवन बनाने के लिए बनाता है। 

गांव के गांव - जहां औरतों ने गर्भाशय निकाल दिए हैं। सर्जरी के लिए भी ठेकेदार एडवांस देने को तैयार बैठा है। उधार कटाओ, मुक्त हो जाओ। गन्ना कट रहा है। मिलों में जा रहा है। शक्कर बन रही है। आपकी जीभ की मिठास में जो शक्कर आती है, उसमें एक कोख की चीख भी होती है। पर आपको सुनाई नहीं देती।

चीख के एक तरफ गन्ना है, दूसरी तरफ लीची है। मीठे से मीठे का भाग दो तो कुल कितना मीठा बचा? सयाने कहते हैं मुजफ्फरपुर में भूखे बच्चे लीची खा जाते हैं, इसलिए उसके जहर से मर जाते हैं। ‘चमकी बुखार’ का कोई इलाज नहीं है, वो तो मरेंगे। ये तो सालाना उत्सव है। इसमें सरकार बेचारी क्या करे? जैसे होली, दीवाली, ईद आती है, वैसे ये भूखे बच्चों की लीची-मौत भी आती है। रिपोर्टर ‘चमकी’ से त्रस्त आईसीयू में घुस गए हैं, डॉक्टर कांप रहे हैं, बच्चे बेहोश हैं, मांएं रो रही हैं, सरकारें भरे पेट लीची खा रही हैं।

भरे पेट खाने पर लीची ज्यादा मीठी और अतिरिक्त तौर पर स्वादिष्ट लगती है। तब आपको अस्पताल, बीमारी, गरीबी, डॉक्टर, इंतजाम, मृत्यु, जीवन आदि पर उत्कृष्ट विचार आते हैं। भूखों ने गलती की। भूखे हमेशा गलती करते हैं, क्योंकि वे भूखे हैं। वे पेट भर लेते तो लीची जैसी लजीज चीज को बदनाम करने से बच जाते।

उधर गन्ने की मिठास ये है कि मांएं कोख हटवा रही हैं, इधर लीची की मिठास ये है कि जो कोख से दुनिया में आ गए, वे मरकर लौट रहे हैं। ये अजन्मों से जनमे हुए सच की दरांती है, जिसने सीना चाक कर दिया है। मगर सीना चाक करने के मुहावरे को उड़ाकर सेरभर ज्ञानियों ने सवा सेर मिट्टी लेकर मन के कुम्हारों का आंगन देख लिया है। सरकारें उस चाक पर अपने ज्ञान के बर्तन बनाए जा रही हैं।

उधर कुछ सवा सेर ज्ञानी हैं वे शिल्पग्राम के ‘बुटीक’ किस्म के चाक लेकर राजधानी में सुराहियां बनाने बैठ गए हैं। बुद्धि के रेस्टोरेंट में ये जनता से जुड़ी मिट्टी के मार्केटियर हैं। सुराहियों में विचारधारा का ठंडा पानी है, पियो और द्वंद्वात्मक भौतिकवाद से ऊपर उठ जाओ।

एक सुबह बीड़ में होती है, गन्ने के खेतों के बीच। एक सुबह मुजफ्फरपुर में होती है, अस्पताल की देहरी पर। एक सुबह अलवर में होती है, तार-तार बच्ची की शक्ल में। एक सुबह दिल्ली में भी होती है। चिंतक पर चिंता का ‘ओवरलोड’ है। लोधी गार्डन से हवाखोरी करके तृप्त हुए श्वान को खिलाता हुआ चिंतक, फौजियों के साथ ड्यूटी पर तैनात, योग करते श्वान पर लतीफा सुनाता है और हे-हे करके क्रांति का उबला हुआ नाश्ता करता है।

अब वह बलात्कार, लूट, मौत, भूख, मुठभेड़ सबको पहले विचारधारा की टेस्ट-ट्यूब में डालेगा और मनमाफिक रंग आने पर राष्ट्र पर खतरे का बुलेटिन जारी करेगा। दो सयाने रो रहे हैं, अध्यक्ष इस्तीफे पर अड़े हैं। उन्हें मना लें, पीछे देश देखें। दो दीवाने रो रहे हैं, सीबीआई बिठा दी है, उसके खिलाफ आंदोलन सैट कर लें, पीछे देश देखें। दो अज्ञानी रो रहे हैं, देश में गन्ना है, देश में लीची है, देश में श्वान हैं, देश में बच्चे हैं, देश में औरतें हैं, देश में ये देश है और यही देश है। 

इसे देखें, पीछे कोई और देश देखें। बेचारे ‘अज्ञानी’ फील्ड में हैं। वही तो फील्ड में होंगे। ज्ञानी तो बक्से में बैठते हैं और लीची खाते हैं। चैनल से उतर ट्विटर पर उड़ते हैं फिर गन्ने का रस पीकर मधुशाला का फोटो ट्वीट करते हैं। गन्ना काटती औरत, लीची खाते भूखे बच्चे, निष्ठा के साथ सन्नद्ध श्वान - यह सब तो आदि-इत्यादि हैं।

बोलिए -

ऊँ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।  

 
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