अपने क्या कभी गन्ना काटा है? बीड़, मराठवाड़ा की मजदूरिनें अपने पति के साथ मिलकर ठेकेदार से एक करार करती हैं। एक टन गन्ने काटने के ढाई सौ रुपए। कुल चार से पांच महीनों का काम जिसमें तीन सौ टन काटकर मिले पैसों से साल भर उनकी गृहस्थी चलेगी। इसलिए एक दिन भी छूट जाए तो क्या हो? और वह भी जब, मासिक धर्म के चलते हो तो क्या हो? उन चार दिनों के बदले पांच सौ रुपए रोज की पेनल्टी लगेगी और पैसा कट जाएगा सो अलग। तो मजदूरिन क्या करे? वह कोख के उस हिस्से से ही मुक्त हो जाती है, जिसके चलते जीवन का यह चक्र उसके जीवन को जीवन बनाने के लिए बनाता है।
गांव के गांव - जहां औरतों ने गर्भाशय निकाल दिए हैं। सर्जरी के लिए भी ठेकेदार एडवांस देने को तैयार बैठा है। उधार कटाओ, मुक्त हो जाओ। गन्ना कट रहा है। मिलों में जा रहा है। शक्कर बन रही है। आपकी जीभ की मिठास में जो शक्कर आती है, उसमें एक कोख की चीख भी होती है। पर आपको सुनाई नहीं देती।