यूनिसेफ की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2030 तक भारत में 5 से 19 वर्ष की आयु के 2.7 करोड़ से अधिक बच्चे और किशोर मोटापे से ग्रस्त हो सकते हैं। लुभावने और लक्षित विज्ञापन अभियानों के साथ-साथ इन खाद्य पदार्थों की आसान उपलब्धता, बच्चों और किशोरों के खाने की पसंद को प्रभावित कर रही है। ऐसे में उनकी पसंद व्यक्तिगत रुचि से नहीं, बल्कि बाजार और विज्ञापनों से तय होने लगी है। आज सिर्फ अमीर परिवारों के बच्चे ही जंक फूड नहीं खाते हैं। कई साल पहले मुंबई की धारावी बस्ती में एक शोध के दौरान मैंने देखा कि छोटे बच्चे दुकानों के सामने कतार में खड़े होकर जंक फूड के सस्ते और आकर्षक पैकेट खरीद रहे थे।
कम आय वाले परिवारों को ध्यान में रखकर जंक फूड को छोटे और सस्ते पैकेटों में बेचा जा रहा था। यह बाजार की ऐसी रणनीति थी, जिसने इन उत्पादों को गरीब परिवारों की पहुंच में ला दिया था। आज बच्चों को न तो पर्याप्त पौष्टिक भोजन मिल रहा है और न ही वे ठीक से संतुलित आहार ले पा रहे हैं, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य की एक उभरती हुई गंभीर समस्या है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के सामाजिक चिकित्सा एवं सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के अध्यक्ष और सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. राजीब दासगुप्ता ने हाल ही में एक टिप्पणी में कहा कि बच्चों में मोटापा बढ़ने से आमतौर पर वयस्कों को होने वाली बीमारियां अब उन्हें भी होने लगी हैं।
भारत जैसे निम्न और मध्यम आय वाले देश एक ओर संक्रामक बीमारियों और कुपोषण जैसी पुरानी चुनौतियों से जूझ रहे हैं, तो दूसरी तरफ, उनमें गैर-संचारी रोगों (एनसीडी) के जोखिम भी बढ़ रहे हैं, जिनमें कम उम्र में मोटापे की समस्या भी शामिल है। इसके पीछे कई कारण हैं। गर्भावस्था में मां को पर्याप्त पोषण न मिलना, बच्चों के शुरुआती वर्षों में संतुलित आहार की कमी तथा बाद में अधिक वसा और कैलोरी वाले खाद्य पदार्थों का सेवन इनमें प्रमुख हैं।
इसके साथ ही शारीरिक गतिविधियों की कमी भी इस समस्या को बढ़ा रही है। ऐसे में जरूरी है कि उस माहौल को सुधारा जाए, जो वजन बढ़ाने को बढ़ावा देता है। इस दिशा में सरकार की भूमिका हर स्तर पर महत्वपूर्ण है। बच्चों के लिए खेलना और शारीरिक गतिविधि करना जरूरी है, लेकिन अगर सार्वजनिक स्थान सुरक्षित नहीं हैं और कम आय वाले इलाकों में पार्क ही नहीं हैं, तो यह मुश्किल होगा। इसलिए, हमें उचित शहरी नियोजन, स्वास्थ्य, शिक्षा और शुरुआती हस्तक्षेप कार्यक्रमों पर ध्यान देना होगा; स्कूलों में मीठे पेय पदार्थों की उपलब्धता को सीमित करना भी आवश्यक है।
भारत खाद्य पदार्थों के नियमन के लिए अधिक सख्त व्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ रहा है, लेकिन पैकेट बंद खाद्य पदार्थ पर चेतावनी संबंधी लेबल लगाने का प्रस्ताव अभी लागू नहीं हुआ है। बच्चों और वयस्कों के बीच बढ़ते मोटापे की समस्या से निपटने के लिए स्वास्थ्य, खाद्य, कृषि, शिक्षा, व्यापार और वाणिज्य, परिवहन, पर्यावरण, संस्कृति, मीडिया और अन्य क्षेत्रों के बीच प्रभावी तालमेल बिठाना होगा, ताकि एक स्वस्थ वातावरण तैयार किया जा सके।