अब ऐसा महसूस होने लगा है कि आने वाले दिनों में अमेरिका सीरिया पर टॉम हॉक क्रूज मिसाइलों से हमला कर देगा। ऐसे में इस हमले को लेकर कुछ वैध चिंताओं का उठना लाजिमी है। इन हमलों से सीरियाई राष्ट्रपति बशर अल असद पर दबाव बढ़ेगा। हिजबुल्ला पश्चिमी देशों के खिलाफ जवाबी हमले का रुख आख्तियार कर सकता है। अमेरिकी हमलों से वहां आम नागरिकों की जिंदगी खतरे में पड़ सकती है। इससे पहले से ही बिखरे हुए इस देश में गृहयुद्ध जैसे हालात पैदा हो जाएंगे। सीरिया पर होने वाला कोई भी मिसाइल हमला अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने हमारी लाचारी ही प्रकट करेगा।
इन बातों में कुछ सच्चाई जरूर है, पर यहां कुछ मूलभूत बातों पर ध्यान देना भी उतना ही जरूरी है। दरअसल, राष्ट्रपति बराक ओबामा की सीरियाई नीति पूरी तरह से नाकामयाब हो चुकी है और अब समय आ गया है कि कड़े फैसले किए जाएं। यह भी सुनने में आया था कि सीरिया में सशस्त्र विद्रोह को बढ़ावा देने के हिलेरी क्लिंटन और डेविड पैट्रियॉस के प्रस्ताव को ओबामा ने खारिज कर दिया था। उन्हें डर था कि इससे हम नाहक ही संकट में फंस जाएंगे। कुछ भी हो, संकट तो आ ही गया है और अपने हर डर का सामना करने के लिए अब हमें तैयार होना होगा।
युद्ध न केवल फैल चुका है, बल्कि इसने लेबनान, जॉर्डन, इराक और तुर्की में उथल-पुथल मचा दी है। अब तक एक लाख से भी ज्यादा सीरियाई नागरिक मारे जा चुके हैं। अगर इसी रफ्तार से मौतें होती रहीं, तो सीरिया की हालत रवांडा जैसी होने में देर नहीं लगेगी, जहां 1994 में नरसंहार में लाखों लोग मारे गए थे।
जहां तक मेरा मानना है, सैन्य हस्तक्षेप को लेकर बेहद चौकन्ना रहने की जरूरत होती है। और इसी वजह से मैं इराक और अफगानिस्तान में हुई सैन्य कार्रवाई के सख्त खिलाफ था। हां, लोगों की जान बचाने के लिए कूटनीतिक आधार पर सैन्य हस्तक्षेप का सहारा जरूर लिया जा सकता है, जैसा कि बतौर राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के कार्यकाल में हमने बोस्निया और कोसोवो के मामले में देखा था। माली में भी हम कुछ ऐसा ही देख चुके हैं। ध्यान देने वाली बात यह भी है कि बिल क्लिंटन भी सीरिया में सशक्त अमेरिकी हस्तक्षेप के समर्थक हैं।
दरअसल, दिक्कत यह है कि अफगानिस्तान और इराक के मामलों में हमने बढ़-चढ़कर दावे किए। नतीजे के तौर पर हमारे हाथ सदमों के सिवाय कुछ नहीं आया। लिहाजा सीरिया के मामले में हम हर कदम फूंक-फूंककर रख रहे हैं। अमेरिका की जनसंख्या का सिर्फ पांचवां हिस्सा ही सशस्त्र विद्रोह को समर्थन देने के पक्ष में है। इसलिए ओबामा की मुश्किलों को समझना कठिन नहीं है।
पिछली नवंबर को जब मैं सीरिया की यात्रा पर था, तो वहां एक बूढ़ी महिला से मिला। असद के शासन में वह महिला अपने पति, बेटे और बहू को खो चुकी थी। वह एक ही वर्ष में पांच बार अपना घर बदल चुकी थी। उस समय वह एक जर्जर टेंट की शरण लिए थी और इंतजार कर रही थी कि अगली मौत किसकी होगी। उसने मुझे बताया कि सब की तरह वह भी अपने हालात को सुधारने के लिए ईश्वर और ओबामा की मदद की बाट जोह रही थी। क्या हमारे पास उस महिला की प्रार्थना का कोई जवाब है? क्या हम उससे यह कहें कि हमारी इतनी हैसियत नहीं है कि हम उसकी मदद कर सकें या यह कहें कि हम तब तक उदासीन बने रहेंगे, जब तक उसके सारे पोते मर नहीं जाएंगे और मृतकों की संख्या इतनी ज्यादा नहीं हो जाएगी कि हम कड़े फैसले लेने को मजबूर हो जाएं?
यह सवाल अपनी जगह सही है कि क्या सीरिया के खिलाफ सीमित मिसाइल हमले से असद पर रासायनिक हथियारों का उपयोग नहीं करने का दबाव बनेगा। निश्चित तौर पर तो कुछ नहीं कहा जा सकता, लेकिन मेरे ख्याल से यह संभव है। दरअसल, रासायनिक हथियारों का केवल सीमित उपयोग होता है। यह विरोधियों को भयभीत करने का महज एक जरिया है। पिछले कुछ वर्षों से देखने में आया है कि असद ने कोई भी कदम उठाने से पहले घरेलू और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाओं का बारीक जायजा लिया है। सबसे पहले उन्होंने प्रदर्शनकारियों को केवल गिरफ्तार किया। फिर उनकी सेनाओं ने उन पर फायरिंग करनी शुरू की। इसके बाद उनके सैनिक विरोधियों के क्षेत्रों का सफाया करने लगे। फिर सीरिया की सेना ने विद्रोहियों के ठिकानों पर रॉकेट और मिसाइलें दागनी शुरू की। इसके बाद मामूली तौर पर रासायनिक हमलों का सहारा लिया गया। और अंत में असद की सेना ने नर्व गैस से गंभीर हमला किया।
इतना सब होने के बावजूद हम कुएं के मेढक ही बने रहे। मेरा मानना है कि मिलिट्री एयरक्रॉफ्ट या खुफिया मुख्यालयों पर हमला करने से सीरिया की सरकार पर रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल न करने के लिए दबाव बनेगा।
ऐसा भी कहा जा रहा है कि अमेरिका रासायनिक हथियारों का हौवा खड़ा कर रहा है। सीरिया में मरने वालों के एक प्रतिशत से भी कम लोग नर्व गैस के हमले में मर चुके हैं। सीरिया में जनसंहार का प्रमुख हथियार एके-47 है। लेकिन फिर भी इस मसले की गंभीरता को देखते हुए एक अंतरराष्ट्रीय मानक तो होना ही चाहिए। चूंकि ओबामा पहले ही रासायनिक हथियारों के मामले पर काफी कुछ कह चुके हैं, इसलिए इस बार उनकी विश्वसनीयता भी दांव पर लगी है।
अमेरिका चाहे जो भी कदम उठाए, सीरिया की हालत जल्द सुधरने वाली नहीं है। इसलिए विद्रोहियों को हथियार मुहैया कर सीरियाई शासन पर लगाम लगाने का समय अब निकल चुका है। लेकिन अगर सीरिया पर हमले के जरिये कुछ विद्रोही गुटों को मदद पहुंचे या अमेरिका को उनसे कुछ जानकारी मिल सके, तो यह सबसे अच्छा रहेगा।