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तीन का बोलबाला

Mon, 10 Jun 2013 10:52 AM IST
श्याम विमल
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तीन की संख्या हमेशा ही महत्वपूर्ण रही है। किसी कार्य में लगातार तीन बार सफलता पाने वाला महत्व पा जाता है। अंग्रेजी में इसे हैट्रिक कहा जाता है, तो हिंदी में तिकड़ी।
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लेकिन चुनावी राजनीति की हैट्रिक के आगे तो सारा कुछ फेल है। पिछले साल गुजरात के नमो यानी नरेंद्र मोदी ने तीसरी बार विधानसभा चुनाव जीतकर जीत की तिकड़ी लगाई।

उससे उत्साहित होकर अब वह प्रधानमंत्री बनने की कोशिश में हैं। नमो से पहले दिल्ली की 'शीदी' यानी शीला दीक्षित ने मुख्यमंत्री पद की हैट्रिक लगाई थी।

हमारे हिंदुस्तान में पुराने समय से ही तीन की बड़ी महिमा है। उदाहरण के लिए, मंत्रोच्चार के अंत में तीन बार ओम शांति के स्वर गूंजते ही हैं। ब्रह्मा-विष्णु-महेश नामक त्रिदेव तो हमारे यहां युगों से पूजे जा रहे हैं।
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शिव का त्रिशूल हो या उनके त्रिनेत्र, वे त्रिभुवन में वंदनीय हैं। संगम तीन नदियों के मिलन को ही कहते हैं। संस्कृत में लिंग भी तीन हैं। हमारा राष्ट्रध्वज तीन रंगों के कारण ही तिरंगा कहलाता है।

वैद्यकी में रोगों के तीन ही मूल-वात, पित्त और कफ-बताए गए हैं। लेकिन औषधि के रूप में हरड़, बहेड़ा और आंवला का त्रिफला चूर्ण जिस घर में है, वहां बाहर से वैद्य बुलाने की जरूरत नहीं।

हिंदी के एक पुराने कवि ने अपनी नायिकाओं के भोजन के बारे में जो लिखा है, वह भी बहुत दिलचस्प है। एक नायिका डाइटिंग पर इतना जोर देती थी कि रोज तीन बेर (फल) ही खाती थी, जबकि दूसरी नायिका तीन बेर यानी तीन बार खाती थी।

कविताओं की बात चली है, तो आपातकाल पर लिखी हुई भवानी भाई की त्रिकाल संध्या को भला कौन भूल सकता है! हमारे यहां अपनी बात को विश्वसनीय ठहराने के लिए तीन बार कसम खाई जाती है, तो तीन बार तलाक बोलकर मियां-बीवी के नाजुक रिश्ते को रद्द कर दिया जाता है। इसी तरह काम बिगाड़ने के लिए तीन लोग काफी हैं।

जब तीन का इतना महत्व है, तो अगले लोकसभा चुनाव के प्रति यूपीए सरकार की दिलचस्पी समझी जा सकती है, जो तीसरी बार केंद्र की सत्ता में आना चाहती है।

यूपीए से भी ज्यादा उत्सुक मनमोहन सिंह हैं, जो तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने का सपना संजोए हुए हैं। अगर यूपीए की हैट्रिक लग जाए और मनमोहन जी प्रधानमंत्री बन जाएं, तो राहुल बाबा और नमो का क्या होगा? त्रिलोकीनाथ ही बचाएं इस भारत को।
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