तमिलनाडु में करीब 40 फीसदी कांग्रेसियों के साथ जीके वासन के पार्टी से अलग होने की घटना ने एक बार फिर कांग्रेस की गड़बड़ियों को उजागर किया है। कांग्रेस दक्षिण भारत में लगातार कमजोर होती जा रही है। वह वहां लगभग आधी सदी (48 वर्षों) से सत्ता से बाहर है, जो किसी भी राजनीतिक संगठन को अप्रासंगिक बनाने के लिए पर्याप्त है। कांग्रेस से अलग हो जाने के कारण वासन के खिलाफ चाहे जिस भी विशेषण का प्रयोग किया जा रहा हो, पर ऐसी प्रतिकूल परिस्थिति में वासन का पार्टी छोड़ना दर्शाता है कि उन्हें आज कांग्रेस में अपना भविष्य नहीं दिख रहा था। हालांकि एक क्षेत्रीय पार्टी बनाना भी कोई आसान काम नहीं है।
एक और बात है, जो उनकी राजनीति की तरफ इशारा करती है। उन्होंने अपने पिता जीके मूपनार (जो 1996 में कांग्रेस से अलग हो गए थे) के साथ ही के कामराज (जो 1969 की टूट के बाद इंदिरा गांधी के खिलाफ थे) की विरासत पर भी दावा किया है। वासन के विचारों से कांग्रेस के पांच में दो विधायक, लगभग आधे जिला अध्यक्ष एवं कई पूर्व सांसद एवं विधायक सहमत हैं। वे मानते हैं कि कांग्रेस से बाहर उनके लिए मौके हैं, जहां उन्हें उन सवालों से नहीं घेरा जाएगा, जिसे घोटालों से जर्जर देश की सबसे पुरानी पार्टी ढो रही है। इसके अलावा, उनके पास दिल्ली से इजाजत लिए बिना फैसले लेने की स्वतंत्रता होगी।
वासन की तरह कई कांग्रेसी नेता आज सवाल कर रहे हैं कि लोकसभा चुनाव में मिली शिकस्त के बाद पार्टी किस तरह के भविष्य की तरफ बढ़ रही है। पहली बार नेहरू-गांधी परिवार के नेतृत्व पर अस्थायी (और उतना अस्थायी भी नहीं) तौर पर सवाल उठाने की कोशिश की गई है। पंजाब के जगमीत बराड़ और मध्य प्रदेश के गुफरान-ए-आजम के खिलाफ, जिन्होंने खुलेआम सवाल खड़े किए, कार्रवाई की गई। बराड़ ने तो सोनिया और राहुल गांधी से दो वर्षों के लिए अवकाश लेने के लिए ही कहा था। लेकिन चिदंबरम और दिग्विजय सिंह जैसे अन्य लोग इस खेल को अलग तरीके से खेल रहे हैं। चिदंबरम ने कहा कि गांधी परिवार से इतर कोई व्यक्ति कांग्रेस का नेतृत्व कर सकता है और अब उनके पुत्र कार्ति चिदंबरम ने आला कमान संस्कृति पर हमला किया है। कुछ वर्ष पहले ऐसा सोचना भी कल्पना से परे था।
हाल ही में दिग्विजय सिंह ने पार्टी की बागडोर संभालने के लिए राहुल का आह्वान किया। हालांकि कइयों का मानना है कि जब तक कांग्रेस अध्यक्ष खुद पहल नहीं करतीं, दिग्विजय सिंह को ऐसी मांग नहीं करनी चाहिए। यह पार्टी में बेचैनी की भावना बढ़ाएगी। बयानों में भले ही कांग्रेस नेता कुछ भी कहें, लेकिन पार्टी में आज बहुत कम नेता हैं, जो उनके पिछले दस वर्षों के कामकाज को देखते हुए मानते हैं कि राहुल कांग्रेस को पुनर्जीवन दे सकते हैं। यहां तक कि नेहरू-गांधी परिवार के वंशज भी मानते हैं कि उन्हें अब तक पार्टी को नया स्वरूप देने के लिए खुली छूट नहीं दी गई है। यह अकारण नहीं है कि दिग्विजय सिंह ने कुछ समय पहले खुद ही संदेह व्यक्त करते हुए कहा था कि राहुल स्वभाव से राजनीति के अनुकूल नहीं थे।
तो दिग्विजय सिंह इसके बारे में क्या कहेंगे, जब वह इस स्तर पर राहुल के लिए राह बनाते हैं। विवेक तो यही कहता है कि कुछ समय के लिए राहुल को चुप रहकर पार्टी के भीतर और बाहर अपने बारे में फैली नकारात्मकता को स्वीकार करना चाहिए और मां सोनिया को सामने आने देना चाहिए। मगर दिग्विजय सिंह जो कह रहे हैं, उसका मतलब है कि सोनिया को पार्टी अध्यक्ष का पद छोड़ देना चाहिए।
लोकसभा चुनाव की हार के तुरंत बाद दिग्विजय सिंह ने एक और बयान दिया था। उन्होंने पार्टी छोड़कर गए सभी पूर्व कांग्रेसी नेताओं से एक होने की अपील की थी। कांग्रेस परिवार के एकजुट होने के बारे में अभी कहना जल्दबाजी होगी, जिसमें राकांपा, तृणमूल कांग्रेस, जगन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस और जीके वासन समूह जैसे घटक एक साथ आएंगे। अगर ऐसा होता है, तो यह इन दलों का एक फेडरेशन हो सकता है, जिसमें नेहरू-गांधी परिवार शायद नहीं होगा।
जिस तरह से भाजपा बनाम अन्य की राजनीति आकार ले रही है और अब राज्यों में भी भाजपा जिस तरह से कब्जा करती जा रही है, क्षेत्रीय दल भी जानते हैं कि उन्हें अपना अस्तित्व बचाने और भाजपा को शिकस्त देने के लिए एक-दूसरे से हाथ मिलाना पड़ेगा। बिहार में लालू-नीतीश के बीच गठजोड़ हो गया है। जिन राज्यों में आगामी कुछ महीनों में चुनाव होने हैं, वहां अन्य दल भी इसका अनुसरण कर सकते हैं। हालांकि गैर-भाजपा, गैर-कांग्रेस दलों के भी अपने अंतर्विरोध हैं, जिन्हें दूर करना आसान नहीं होगा। इससे फर्क नहीं पड़ता कि मायावती किस तरह से घिरी हुई हैं, पर उनका मुलायम सिंह और ममता बनर्जी का वाम दलों से हाथ मिलाना मुश्किल है।
राष्ट्रीय स्तर पर एक समय ऐसा आ सकता है, जब क्षेत्रीय दलों और कांग्रेस में आम सहमति बन जाए। लेकिन इसके लिए कांग्रेस को, जिसकी अब भी पूरे देश में उपस्थिति है, सूत्रधार की भूमिका निभानी होगी। सवाल है कि अगर ऐसा वक्त कभी आता है, तो उस गठजोड़ का नेता कौन होगा, जो सबको स्वीकार्य हो। दिग्विजय सिंह का कदम इसमें आड़े आ सकता है।
नीतीश कुमार, लालू यादव, देवगौड़ा, मुलायम सिंह यादव और अन्य ने बातचीत शुरू कर इस संभावना का भी संकेत दिया है कि उनकी पार्टी 1977 की तरह विलय कर सकती है, जब कई दलों ने मिलकर जनता पार्टी बनाई थी। क्या इतिहास को दोहराया जा सकता है? आज हम आकांक्षाओं से भरपूर युवा क्रांति के दौर वाले अलग भारत में रह रहे हैं। हालांकि एक बात जो निश्चित तौर पर कही जा सकती है, वह यह कि भारतीय राजनीति आज विभिन्न धाराओं का पंचमेल बन गई है।