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अब इंतजार किस बात का है

Sun, 27 Apr 2014 06:18 PM IST
राजेंद्र शर्मा
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हम पूछते हैं कि अब इंतजार किस बात का है। चुनाव आयोग भाई की जीत का ऐलान क्यों नहीं कर देता? ऐसे चुनाव का क्या फायदा, जिसमें चुनाव तो है, पर मुकाबला नहीं है! एक घोड़े की दौड़ भी कोई दौड़ है, लल्लू!
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और मुकाबला होता भी, तो होता कैसे? दूसरा कोई भाई का मुकाबला करता भी, तो क्या खाकर। दीवार में अमिताभ बच्चन बाकी सब होते हुए भी शशि कपूर से हार गया था-क्योंकि उसके पास मां थी। यहां तो भाई के पास ही सब कुछ है। भाई के पास संघ का आशीर्वाद है। भाई के पास अंबानी-अडाणी आदि-आदि का सौहार्द है। भाई के पास टीवी वगैरह की कृपा है। पर यह सब तो किसी के भी पास हो सकता है। खास बात यह है कि भाई को एक महात्मा ने चमत्कारी कलम दिया, जिससे उन्होंने वाराणसी में अपना पर्चा भरा है। है और किसी के पास ऐसा मंत्रसिंचित कलम?

खैर, कलम अगर कोई किसी महात्मा से ले भी आए, तो भाई के पास गंगा मां है, मां का बुलावा है। है किसी के पास गंगा मां का ऐसा इन्विटेशन कि आकर मेरा उद्धार करो? गंगा में टीवी कैमरे के सामने चार डुबकी लगा लेने से ही कोई मां का चहेता बेटा नहीं बन जाता। और गंगा मां के इन्विटेशन का कोई किसी तरह जुगाड़ कर भी ले तो, सिर्फ भाई के पास जो दैवीय सिलेक्शन है, उसका कोई आखिर कैसे मुकाबला कर सकता है? जब ऊपर वाले का सिलेक्शन आ चुका है, फिर हम किस चुनाव का अहंकार पाले बैठे हैं? कोई यह क्यों नहीं समझता कि ऊपर वाले के सिलेक्शन में ही हम सब का इलेक्शन है!
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खैर, पब्लिक को वोट डालने का पांच साला शौक ही पूरा कराना है, तो चलो, पब्लिक से बटन दबवा लो। किसी को यह शिकायत भी क्यों रह जाए कि चुनने तो नहीं ही देते हैं, इस बार बटन भी नहीं दबाने दिया। पर उसके बाद पल भर भी नहीं। गिनती-विनती तक इंतजार करने की रत्ती भर जरूरत नहीं है। फोकट में पब्लिक के पैसे और बाकी के टैम की बर्बादी क्यों करना! जिंदा कौमें चुनावी नतीजे का इंतजार नहीं करतीं। जो सच है, उसकी प्रतीक्षा क्या करना!
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