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अब स्टेशन से गाड़ी निकल चुकी है

Sun, 25 Aug 2013 08:55 PM IST
तवलीन सिंह
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अब जब देश की आर्थिक नैया मझधार में बेदिशा-बेसहारा लुढ़कती साफ दिख रही है, भारत के अर्थशास्त्री और राजनीतिक पंडित किसी और के सिर दोष थोपने की कोशिश में लगे हुए हैं। नैया डुबोने का दोष क्या सोनिया गांधी के सिर मढ़ा जा सकता है या अपने अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री के सिर पर? कांग्रेस प्रवक्ताओं का सीधा जवाब है इस सवाल का- दोष इन दोनों राजनेताओं में से किसी का नहीं है। दोष है, वैश्विक परिस्थितियों का। यानी भारत में जो विदेशी निवेशक कभी दौड़े-दौड़े आया करते थे, इन दिनों अपना पैसा विकसित पश्चिमी देशों के बाजारों में लगा रहे हैं, क्योंकि वहां जो मंदी छाई रही थी पिछले पांच वर्षों में, वह अब कम होने लगी है। कुछ कांग्रेस प्रवक्ता ऐसे भी हैं, जो कहते हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था पूरी तरह मजबूत है।
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पिछले सप्ताह निधि राजदान के शो पर जब किसी कांग्रेस प्रवक्ता ने ऐसा कहा, तो निधि ने इन शब्दों में उनको टोका, कैसी बातें कर रहे हैं आप? आर्थिक मंदी सबको दिख रही है, सिवाय आप कांग्रेस वालों को छोड़कर। सुबूत चाहिए आपको, तो कम से कम सब्जियां खरीदिए, देखिए, कितनी महंगाई है। मैं भी उस समय वहीं थी इसी चर्चा में शामिल होने के लिए। सो जब निधि ने मुझसे पूछा कि क्या सोनिया जी की नीतियों के कारण अर्थव्यवस्था बेहाल हुई है, तो मैंने बेझिझक 'हां' में जवाब दिया, इसलिए कि जब पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने बड़ी-बड़ी योजनाओं को बंद करने का काम शुरू किया पर्यावरण बचाने का ढोंग करके, उनको पूरा समर्थन मिला सोनिया और राहुल गांधी का।

इसलिए कि सरकारी खर्च सोनिया जी के कारण ही बढ़ा है पिछले पांच वर्षों में गरीबी हटाने के नाम पर। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सोनिया जी का चहेता खाद्य सुरक्षा विधेयक कानून बन जाता है, तो देश को कंगाल होने से कोई नहीं बचा सकेगा, क्योंकि बिल्कुल ऐसी समाज कल्याण योजनाओं में निवेश हम करते आए हैं इंदिरा गांधी के जमाने से। और सरकार खुद मानती है कि गरीबी आज भी इतनी है देश में कि सत्तर प्रतिशत लोगों को सस्ता अनाज देने की जरूरत है खाद्य सुरक्षा कानून के द्वारा।
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प्रधानमंत्री जानते हैं कि ऐसी योजनाओं से गरीबी कम नहीं होगी। वह जानते हैं कि जो थोड़ी-बहुत खुशहाली इस गरीब देश के लोगों ने पिछले बीस वर्षों में देखी है, वह आई है सिर्फ इसलिए कि इस किस्म की समाजवादी नीतियों को ताक पर रख दिया गया था 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद और देश के निजी निवेशकों के पांव से लाइसेंस राज की बेड़ियां उतार दी गई थीं। जब आर्थिक विकास दर आठ प्रतिशत से ऊपर चढ़ गई, तो रोजगार के अवसर बढ़े, नई उम्मीदें जगीं, जिनका असर गांवों में दिखता था, और तीस करोड़ भारतीय मध्यवर्ग में शामिल हुए। लेकिन प्रधानमंत्री जी ने ये सब बातें कभी सोनिया जी को नहीं बताईं, न ही कभी आम आदमी को समझाने की कोशिश की। सो जब वामपंथियों ने आर्थिक सुधारों के खिलाफ प्रचार शुरू किया, उनकी बातें सुनी गईं। अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल ने भ्रष्टाचार का सारा दोष आर्थिक सुधारों पर डाला था अपने प्रचार के दौरान।

प्रधानमंत्री चुप रहे। आज भी चुप हैं, जबकि रुपये की कीमत दिन-ब-दिन कम होती जा रही है, जबकि बाजार में रोज ऐसी गिरावटें आती हैं, जैसे कोई महाआपदा आ गई हो, जबकि महंगाई बढ़ रही है और मध्यवर्गीय लोग जैसे पिस रहे हैं उसके दबाव से। आर्थिक विशेषज्ञों से जब सवाल किया जाता है कि सरकार को कौन-से कदम उठाने चाहिए, जिससे अर्थव्यवस्था संभल जाए, तो वे कहते हैं, 'अब तो स्टेशन से गाड़ी निकल गई है, अब कुछ नहीं हो सकता।'

नुकसान देश को बेहिसाब हुआ है सोनिया-मनमोहन की आर्थिक नीतियों से। हिसाब लगा रहे हैं कुछ अर्थशास्त्री। उनका कहना है कि आर्थिक दिशा न बदली होती, तो अनुमान है कि 2050 तक देश के माथे पर से गरीबी का घिनौना कलंक मिट गया होता। क्या फायदा अब दोषियों को ढूंढने का, क्या फायदा अब दुखड़ा रोने का, जब कोई उम्मीद नहीं रही है कि अगले लोकसभा चुनाव से पहले कुछ ऐसे कदम उठाएगी सरकार, जिनसे खुशहाली का माहौल बन जाए। हां, यह जरूर कहा जा सकता है कि अगले चुनाव में बड़े मुद्दे आर्थिक होंगे, राजनीतिक नहीं।
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