राहुल गांधी नेहरू-गांधी परिवार के पहले नेता नहीं हैं, जिन्होंने व्यवस्था में बदलाव की बात की है। भ्रष्टाचार मुक्त राजनीति, जवाबदेही और पारदर्शिता जैसी अच्छी-अच्छी बातें अपने समय में इंदिरा गांधी ने भी कहीं और बाद में उनके बेटे राजीव गांधी ने भी। सोनिया गांधी ने भी 1998 में पचमढ़ी में यही सब बातें दोहराई थीं। लेकिन अब तक ऐसा कुछ खास नहीं हुआ, जिससे इन अच्छी बातों के प्रति इन नेताओं की संजीदगी दिखे।
राहुल गांधी की बात करें, तो लोकपाल विधेयक पर संसद में, फिर बुराड़ी और जयपुर के कांग्रेस सम्मेलन में और उसके बाद सीआईआई के एक कार्यक्रम में उन्होंने व्यवस्था में बदलाव की वकालत की थी। परंतु अब तक उन्होंने भी इस दिशा में कोई पहल नहीं की थी। इस अध्यादेश के विरोध को उनका पहला कदम माना जाना चाहिए। हां, यह अलग बात है कि उनकी यह पहल बहुत बेढंगी थी। मीडिया के सामने वह संजीदगी से भी अपनी बात रख सकते थे। वह कह सकते थे कि इस मुद्दे पर उनके खयालात अलग हैं और वह प्रधानमंत्री से मिलकर अपनी बात रखेंगे। लेकिन उनकी अति आक्रामकता पूरे बवाल की वजह बन गई। यह कहा जाने लगा कि ऐसा बयान देकर उन्होंने प्रधानमंत्री पद की गरिमा को चोट पहुंचाई है। पर वास्तव में यह विपक्ष की व्याख्या है। दरअसल इस मुद्दे पर किसी भी दल में एक राय नहीं है। हकीकत यह है कि मुख्य विपक्षी दल भाजपा भी पहले इस अध्यादेश के पक्ष में थी, लेकिन बाद में उसने इसकी मुखालफत शुरू कर दी। पर अध्यादेश चूंकि सरकार लेकर आई है, इसलिए वह विपक्ष पर आरोप मढ़कर अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती।
वास्तव में केवल एक अध्यादेश लाने या कानून बना देने से इस समस्या का समाधान नहीं हो सकता। इससे दूसरी तरह की समस्या भी खड़ी हो सकती है। दरअसल, हमारे यहां न्यायिक प्रक्रिया में लगने वाले लंबे समय का फायदा उठाकर कई दागी नेता संसद और विधानसभाओं में विराजमान रहते हैं। जरूरत न्यायिक प्रक्रिया में सुधार करने की है, ताकि ऐसे मामलों का निपटारा जल्द हो सके। ऐसे में जो दोषी साबित होंगे, उन्हें संसद और विधानसभा में पहुंचने से रोका जा सकेगा, और जो दोषी साबित नहीं होंगे, उनका हक भी नहीं मारा जाएगा।
राहुल गांधी के करीबियों ने उन्हें समझाया कि दागियों को बचाने वाला यह अध्यादेश जनभावना के खिलाफ है। यह सच भी है कि युवा कांग्रेस में साफ-सुथरे लोगों को लाने की दिशा में प्रयास हुए हैं। पर अगर आप संसद और विधानसभाओं में दागियों को रोकने की दिशा में पहल नहीं करते, तो युवा कांग्रेस में ऐसी कवायद का क्या फायदा?
इन सब घटनाक्रम के बीच राहुल गांधी के बयान पर प्रधानमंत्री ने बेहद संजीदगी का परिचय दिया। उन्होंने अपनी बात रखी। राहुल गांधी से मुलाकात की और पूरे मामले का हल खोजने की कोशिश की। अन्यथा राहुल गांधी के बयान के बाद जिस तरह से अजय माकन और राजीव शुक्ला जैसे नेताओं ने उनकी हां में हां मिलाई थी, उससे कांग्रेस की दरबारी संस्कृति की झलक एक बार फिर लोगों के सामने आ गई थी। सही मायने में तो प्रधानमंत्री ने इस पूरे मामले में संकटमोचक की भूमिका निभाई, जो कभी प्रणब मुखर्जी निभाया करते थे।
अब तक कई मौकों पर राहुल गांधी ने अपने विचार तो रखे थे, पर किसी मामले में दखल नहीं दिया था। वह दिग्विजय सिंह, मधुसूदन मिस्त्री, सीपी जोशी जैसे संगठन के नेताओं से विचार-विमर्श तो करते रहे हैं, लेकिन सरकार में शामिल पी. चिदंबरम, ए. के. एंटनी और नीति-निर्धारित करने वाले प्रमुख मंत्रियों के साथ ऐसा करने में उन्होंने अब तक कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। यानी संगठन में तो उनकी सक्रियता रही है, लेकिन सरकार के कामकाज में दखल से अब तक उन्होंने खुद को दूर रखा है।
पर इस घटनाक्रम के बाद अब स्पष्ट हो चुका है कि सोनिया की कांग्रेस राहुल की कांग्रेस में तब्दील हो रही है। इसके पीछे स्पष्ट वजह भी है। वह वजह है, नरेंद्र मोदी। कांग्रेस मान चुकी है कि नरेंद्र मोदी बहुत बड़ी ताकत बनकर उभर रहे हैं। उनकी सभाओं में उमड़ रही भीड़ को देखकर उनकी लोकप्रियता का अंदाजा लगाया जा सकता है। दूसरी तरफ, विभिन्न सर्वेक्षणों में भी यह बात उभरकर सामने आ रही है कि कांग्रेस को अगले लोकसभा चुनाव में 87 से 120 सीटों पर संतोष करना पड़ सकता है। युवा और मध्यवर्ग का झुकाव तेजी से मोदी की तरफ हो रहा है। ऐसे में इस अध्यादेश को वापस लेकर सरकार ने इस वर्ग को संदेश दिया है कि ऐसे मसलों पर वह गंभीर है।
अलबत्ता कांग्रेस की मुसीबत केवल नरेंद्र मोदी ही नहीं, बल्कि आम आदमी पार्टी भी है। यह अकेली शहरी पार्टी है और कांग्रेस को आभास हो गया है कि इसका उभार कांग्रेस के लिए खेल बिगाड़ू साबित हो सकता है। दिल्ली की ही बात करें, तो मेट्रो से लेकर सरकार के तमाम कामकाज का फायदा मध्य वर्ग को हुआ है। पर अगर यह वर्ग मोदी या केजरीवाल की तरफ झुक जाए, तो कांग्रेस का क्या होगा? कांग्रेस को इतना तो आभास हो चुका है कि खाद्य सुरक्षा विधेयक जैसे कानूनों से भले ही गरीबों की झोली से उसे कुछ वोट मिल जाएं, लेकिन मध्यवर्ग उससे दूर जा रहा है। ऐसे में राहुल गांधी का आक्रामक अवतार उनकी करो या मरो रणनीति का ही हिस्सा है। और फिलहाल, इस पहली जंग में उन्होंने बाजी मार ली है, क्योंकि नरेंद्र मोदी ने अब तक ऐसा कुछ नहीं कहा कि दागियों को बचाने वाला अध्यादेश लाना चाहिए या नहीं।