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इस दुखद गाथा का अंत नहीं, बता रहे हैं पी. चिदंबरम

पी. चिदंबरम
Updated Sun, 02 Aug 2020 12:58 AM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : PTI

जम्मू-कश्मीर एक बड़ी जेल है', यह कहना है एक राजनेता का, जिन्हें कई अन्य लोगों की तरह पांच अगस्त, 2019 को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करने के बाद बिना किसी लिखित आदेश के घर पर नजरबंद कर दिया गया।



प्रोजेक्ट जम्मू और कश्मीर का उद्देश्य राज्य को विभाजित करना, दर्जा कम कर केंद्र शासित क्षेत्र में बदलना, क्षेत्रों को सीधे केंद्र सरकार के शासन के अधीन करना, राजनीतिक गतिविधियों को दबाना, कश्मीर घाटी के 75 लाख लोगों को धमका कर शांत करना और अलगाववाद तथा आतंकवाद को खत्म करना था। युक्तियां लगाई गईं, लेकिन इनमें से एक भी लक्ष्य हासिल नहीं हो सका, और मेरा मानना है कि मौजूदा सत्ता की नीति से यह कभी हासिल नहीं होगा। 


पूर्व राज्य की दशा

पहले आधिकारिक निर्मम तथ्यों पर गौर करते हैं ( मुख्य स्रोतः रिपोर्ट ऑफ द फोरम फॉर ह्यूमन राइट्स इन जे ऐंड के, जुलाई, 2020) :

2001 से 2003 के बीच आतंकी घटनाएं 4,522 से कम होकर 170 रह गईं और कुल मौतें (नागरिक, सुरक्षा बल और आतंकी) 3,552 से कम होकर 135 रह गईं। 2014 के बाद से, और खासतौर से 2017 के बाद कठोर और शक्तिपूर्ण नजरिये के कारण हिंसा में बढ़ोतरी हुई ( देखिए टेबिल) :

  • अपने चरम पर, 6,605 राजनीतिक कार्यकर्ताओं ( जिनमें 144 नाबालिग शामिल हैं) को हिरासत में लिया गया। उनमें से कई, जिनमें महबूबा मुफ्ती शामिल हैं, अब भी नजरबंद हैं। बर्बर पब्लिक सेफ्टी ऐक्ट (जन सुरक्षा अधिनियम) का बेजा इस्तेमाल (444 मामले) किया गया। राजनेताओं की सुरक्षा कम की गई और उन्हें मिले सुरक्षित आवास वापस ले लिए गए, उनकी आवाजाही तथा राजनीतिक गतिविधियां खत्म कर दी गईं।
  • घाटी में सेना तथा केंद्रीय अर्द्ध सैनिक बलों की भारी उपस्थिति है। अनुच्छेद 370 को हटाने के बाद वहां 38,000 अतिरिक्त बल भेजे गए। भारतीय दंड संहिता की धारा 144 साल भर व्यावहारिक रूप से लागू रही। 25 मार्च, 2020 के बाद लॉकडाउन ने प्रशासन को हर चीज को बंद करवाने में मदद की। यदि वहां कुछ 'शांति' प्रतीत होती है, तो यह जैसा कि जॉन कनेडी ने कहा था, 'कब्र की शांति' है।
  • सारे बड़े मौलिक अधिकार प्रभावी रूप से निलंबित हैं। जन सुरक्षा अधिनियम और गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) का बेजा इस्तेमाल किया गया है। व्यापक रूप से जांच और तलाशी ली गई है और रोजाना की आवाजाही रोक दी गई। अधिकारों की बहाली करने वाले सारे वैधानिक आयोगों को भंग कर दिया गया है। नई मीडिया नीति स्पष्ट स्वीकारोक्ति है कि स्वतंत्र मीडिया की जम्मू और कश्मीर में कोई जगह नहीं है और उसे सेंसरशिप का पालन करना होगा।
  • मुबीन शाह, मियां अब्दुल कयूम, गौहर गिलानी, मसरत जहरा और सफूरा जरगर के मामले कानून के दुरुपयोग और न्याय हासिल करने में आ रही कठिनाइयों को ही दिखाते हैं।
  • कश्मीर चैंबर ऑफ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्री ने आकलन किया है कि अकेले अगस्त 2019 के बाद से कश्मीर घाटी में उत्पादन में 40,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है और 4,97,000 रोजगार खत्म हो गए। पर्यटकों की संख्या 2017 के 6,11,534 से कम होकर 2018 में 3,16,424 और फिर 2019 में सिर्फ 43,059 रह गई। फल, कपड़ा, कालीन, आईटी, संचार तथा परिवहन उद्योग बुरी तरह प्रभावित हुए हैं।
  • सुप्रीम कोर्ट को अभी जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम की वैधानिकता, 4 जी सेवाओं की बहाली और यूएपीए में संशोधनों से संबंधित मामलों में अंतिम सुनवाई करनी है और फैसला करना है और साथ ही, विभिन्न तरह के मानवाधिकारों पर रोक को चुनौती देने वाली जनहित याचिकाओं पर भी सुनवाई करनी है।

नया कश्मीर मुद्दा


एक कश्मीर मुद्दा 1947 के बाद से था, जब वहां के शासक के भारत में विलय के फैसले का पाकिस्तान ने विरोध किया था। पाकिस्तान ने सबक सीख लिया है कि वह युद्ध में भारत से नहीं जीत सकता और घाटी पर कब्जा नहीं कर सकता। लेकिन अगस्त, 2019 से एक नया कश्मीर मुद्दा सामने आ गया है। नए कश्मीर मुद्दे के कई आयाम हैं- अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करने की सांविधानिकता, एक राज्य का दर्जा घटाकर उसे दो केंद्र शासित क्षेत्रों में बदलना, राजनीतिक और मानवाधिकारों से इन्कार, अर्थव्यवस्था की तबाही, उग्रवाद में बढ़ोतरी, अधिवास से संबंधित नई नीति, घाटी के लोगों का पूर्ण अलगाव और अब नई अधिवास नीति पर जम्मू में और प्रशासन की पूर्ण गैरमौजूदगी को लेकर लद्दाख में पनपा असंतोष।


शेष भारत इस बात पर जोर देता है कि जम्मू और कश्मीर राज्य भारत का अभिन्न अंग है, लेकिन यह आहत करने वाली बात है कि जम्मू और कश्मीर तथा लद्दाख के लोगों की तकलीफों को लेकर बहुत कम चिंता नजर आती है। लद्दाख में चीन की घुसपैठ और पाकिस्तान से चीन के तालमेल ने अंततः शेष भारत की तंद्रा तोड़ी है, मगर इतना पर्याप्त नहीं है। 


लॉकडाउन के दौरान लॉकडाउन

शेष भारत पूर्ण लॉकडाउन का मतलब यही समझता है कि घर से बाहर नहीं निकलना है। शेष भारत को लॉकडाउन के दौरान भी बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी है और अखबार, टेलीविजन, मोबाइल फोन, इंटरनेट, अस्पताल, पुलिस थानों, अदालतों और निर्वाचित जन प्रतिनिधियों तक उसकी पहुंच है। कश्मीर घाटी में पूर्ण लॉकडाउन में अधिकारों से वंचित करने वाला लॉकडाउन है। शेष भारत को कल्पना करनी चाहिए कि बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी के बिना या अखबारों, टेलीविजन, मोबाइल फोन, इंटरनेट, अस्पतालों, पुलिस थानों, अदालतों और निर्वाचित प्रतिनिधियों तक पहुंच के बिना लॉकडाउन कैसा होगा। आज ऐसे ही हालात हैं।


पांच अगस्त, 2020 को एक साल हो जाएंगे, फिर भी हमारे प्रतिष्ठित सांविधानिक संस्थान- संसद, अदालतों और बहुलतावादी राजनीतिक व्यवस्था- पांच अगस्त, 2019 को निर्मित किए गए नए कश्मीर मुद्दे के सवालों के जवाब नहीं तलाश सके हैं। यह एक दुखद नाकामी है, और यह दुख इस तथ्य से और बढ़ जाता है कि हमारे आसपास कोई अब्राहम लिंकन नहीं है। और न ही हम आत्मा को जगाने वाले ये शब्द सुन सकते हैं, 'इस राष्ट्र में स्वतंत्रता का नया जन्म होगा; और जनता द्वारा जनता के लिए जनता की सरकार इस धरती से खत्म नहीं होगी।'

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