पिछले दिनों उत्तर प्रदेश में हुए कांग्रेस के विभिन्न कार्यक्रमों में कार्यकर्ताओं और समर्थकों की भारी भीड़ दिखी। क्या उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की गाड़ी पटरी पर लौटने का संकेत है या यह सब भीड़ प्रबंधन का नतीजा है! अभी कुछ भी कहना मुश्किल है, पर इन सफल आयोजनों ने इतना तो जरूर किया है कि उत्तर प्रदेश की चुनावी बिसात पर कांग्रेस को भी एक खिलाड़ी बना दिया है। कुछ महीने पहले तक उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों को लेकर होने वाली चर्चा से कांग्रेस बाहर थी। कांग्रेस ने जब चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर को अपने साथ जोड़ा, तो आलोचकों को यह कहने में देर नहीं लगी कि अब प्रशांत किशोर को आटे-दाल का भाव पता चलेगा। लेकिन जब राज बब्बर को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष, शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार, संजय सिंह को चुनाव प्रचार अभियान समिति और प्रमोद तिवारी को समन्वय समिति का अध्यक्ष बनाने की घोषणा हुई, तो गुटबाजी और झगड़े में उलझे प्रदेश कांग्रेस के नेता एक छतरी के नीचे आ गए।
कांग्रेस पिछले लंबे समय से नेतृत्व की जड़ता और सांगठनिक नौकरशाही की लालफीताशाही का इस कदर शिकार रही कि जमीन पर काम करने वाले कार्यकर्ता और शीर्ष नेतृत्व के बीच सीधा संवाद का कोई माध्यम ही नहीं बचा। सब कुछ गिने-चुने उन नेताओं की मर्जी और अर्जी से तय होता था, जो कांग्रेस नेतृत्व के इर्द-गिर्द गणेश परिक्रमा के लिए जाने जाते हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में तो राज्य में पार्टी मात्र दो सीटों पर ही सिमटकर रह गई। पराजित मनोदशा से ग्रस्त कांग्रेस नेतृत्व उत्तर प्रदेश को लेकर जड़ होकर रह गया और पार्टी के वे निष्ठावान कार्यकर्ता, जो पिछले 27 वर्षों से राज्य में कांग्रेस की दुर्दशा के बावजूद पार्टी में ही टिके रहे, वे मायूस होकर अपने घरों में बैठ गए।
कांग्रेस नेतृत्व से उत्तर प्रदेश और पंजाब की चुनावी रणनीति बनाने की जिम्मेदारी मिलने के बाद प्रशांत किशोर (पीके) ने अपनी टीम के जरिये पूरे प्रदेश में कांग्रेस के जमीनी कार्यकर्ताओं का मन टटोला। बूथ स्तर के लोगों से बात की। पार्टी की रीति-नीति और कुछ नेताओं की ठेकेदारी से क्षुब्ध होकर घर बैठे कांग्रेस के जिला और ब्लॉक स्तर तक के नेताओं से बात की। सबकी निष्ठा और वफादारी केंद्रीय नेतृत्व के प्रति तो अगाध थी, लेकिन पार्टी के भीतर गिने-चुने नेताओं की मनमानी को लेकर उनके भीतर गहरा आक्रोश था। इसी फीड बैक के आधार पर पीके ने अपनी रणनीति बनाई। उनकी सलाह पर कांग्रेस नेतृत्व ने संगठन में फेरबदल किया और कार्यकर्ताओं में जोश भरने की कोशिश की गई। इसने मायूस कार्यकर्ताओं में जोश भर दिया। नतीजा यह हुआ कि पिछले दिनों हुए कांग्रेस के सभी कार्यक्रम सफल रहे और कांग्रेसी नेता और कार्यकर्ता हताशा से बाहर निकल आए हैं। लेकिन असली चुनौती कांग्रेस के सामने अब यह है कि उसे न सिर्फ कार्यकर्ताओं के जोश को चुनाव तक बनाए रखना होगा, बल्कि जनता में यह भरोसा भी पैदा करना होगा कि कांग्रेस सिर्फ अस्तित्व बचाने की नहीं, बल्कि राज्य में बेहतर शासन देने की वास्तविक लड़ाई लड़ रही है। जब तक यह भरोसा नहीं पैदा होगा, तब तक प्रबंधन से भीड़ तो जुटाई जा सकती है, लेकिन वोट जुटाना आसान नहीं होगा। साथ ही उत्तर प्रदेश के लिए एक ऐसा चुनावी मुद्दा भी तलाशना होगा, जो पूरे राज्य की जनता को प्रभावित कर सके।