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ये सिर्फ आशंकाएं नहीं हैं: हर चार में से एक नौकरी जेनरेटिव एआई के चलते जोखिम में, सिकुड़ रहे कई क्षेत्र

सार

दुनियाभर में हर चार में से एक नौकरी जेनरेटिव एआई के चलते जोखिम में है। आईटी और बीपीओ जैसे क्षेत्र, जिन्होंने करोड़ों परिवारों को गरीबी से निकालकर मध्य वर्ग में पहुंचाया, आज एआई स्वचालन के चलते सिकुड़ रहे हैं। 
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एआई स्वचालन के चलते सिकुड़ रहे नौकरी के अवसर (सांकेतिक) - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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बजाज फाइनेंस में अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) से संचालित बॉट ग्राहकों को ऋण के लिए फोन करते हैं और ऋण की प्रक्रिया पूरी करते हैं। शाओमी ऐसे प्लांट में स्मार्टफोन बनाती है, जहां कोई कर्मचारी नहीं होता। हुंडई ने 2030 तक अपने कारखानों में बोस्टन डायनेमिक्स के 25 हजार से ज्यादा एटलस रोबोट लगाने की योजना बनाई है। दुबई में मीटुआन का कीटा ड्रोन खाना पहुंचा रहा है। सेल्सफोर्स ने चार हजार से ज्यादा नौकरियां घटाई हैं, क्योंकि उसने ग्राहक सेवा के लिए ‘एजेंटफोर्स’ नाम की एआई प्रणाली तैयार की है। आईबीएम में ‘आस्कएचआर’ नाम का एआई सहायक अब नियमित रूप से करीब 94 प्रतिशत मानव संसाधन संबंधी काम संभाल रहा है।

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एआई ने भर्ती प्रक्रिया को बदल दिया है। अब अभ्यर्थी भर्ती से पहले फिल्टर के तौर पर एआई को आवेदन करते हैं और एआई ही उनका इंटरव्यू लेता है। आज अलग-अलग क्षेत्रों में एआई इन्सानी दखल लगातार कम कर रहा है। पिछले महीने मैंने क्लाउड, ग्रोक, चैटजीपीटी, डीपसीक, पर्प्लेक्सिटी, किमी और एचवाई4 से उन नौकरियों का एक नक्शा बनाने को कहा, जिन पर सबसे ज्यादा खतरा मंडरा रहा है। उन्हें एक ही काम दिया गया था: हर पेशे के हिसाब से यह पता लगाना कि एआई किन नौकरियों को खत्म करता है, कम करता है, बदलता है, बेहतर बनाता है, बचाए रखता है या नई नौकरियां सृजित करता है, और इसके पीछे के निवेश तथा बिजनेस मॉडल का विश्लेषण करने के लिए भी कहा गया। 160 से अधिक पेज तैयार करने के लिए बॉट्स को सहायक की जरूरत नहीं पड़ी।

रोजगार बाजार में लोगों की भूमिका के कम होने का असर साफ दिख रहा है। सबसे अधिक खतरे वाली नौकरियों में डाटा क्लर्क, टेलीमार्केटर, कॉल-सेंटर एजेंट, बुककीपर, पैरालीगल, जूनियर कोडर और क्लेम प्रोसेसर शामिल हैं। सुरक्षित मानी जाने वाली नौकरियों में इलेक्ट्रीशियन, प्लंबर, बेडसाइड नर्स, देखभाल करने से जुड़ी नौकरियां, फायरफाइटर और रेडियोलॉजिस्ट का काम है, जिनमें मनुष्यों का फैसला लेना जरूरी होता है। हालांकि, ये सातों एआई प्रणालियां दो अहम सवालों पर चुप रहीं। किसी ने भी उस पूंजी का कोई आंकड़ा नहीं दिया, जिसकी वजह से यह बदलाव आ रहा है। किसी ने यह अनुमान भी नहीं लगाया कि एआई कितनी नई नौकरियां पैदा करेगा।  इसके उलट, जिन नौकरियों के खत्म होने का खतरा है, उनकी संख्या का आकलन बेहद सटीकता से (दशमलव तक) किया गया।
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एआई सीधे नौकरियां नहीं छीनता। वह पहले काम संभालता है, फिर नौकरियां जाती हैं। धीरे-धीरे एआई और इन्सान का एकसाथ काम करना सामान्य हो जाता है। नतीजतन, पहले नई भर्तियां रोक दी जाती हैं, फिर कर्मचारियों की संख्या घटाई जाती है। अक्सर, जो लोग काम पर होते हैं, वे खुद काम न करके मशीन की गलतियों को ही ठीक करते हैं। भारत में सबसे ज्यादा खतरे वाली नौकरियां वही हैं, जिनके लिए एक पीढ़ी को तैयार किया गया था, यानी बीपीओ की नौकरी, टेस्टिंग डेस्क, बैक-ऑफिस लेजर, जूनियर कोडर का क्यूबिकल।

एंथ्रोपिक के प्रमुख डारियो अमोदेई ने दो बड़ी चेतावनियां दी हैं। मई 2025 में उन्होंने कहा था कि एआई प्रवेश स्तर की आधी व्हाइट-कॉलर नौकरियों को खत्म कर सकता है और पांच साल में बेरोजगारी 10 से 20 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। पिछले महीने उन्होंने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से कहा कि अगर एआई का सही तरीके से प्रबंधन नहीं किया गया, तो यह पूरी मानवता के लिए खतरा बन सकता है। सरकारों ने उनकी दूसरी चेतावनी को गंभीरता से लिया, लेकिन अर्थव्यवस्था में नौकरियां घटने की चेतावनी पर ध्यान नहीं दिया गया। निवेश से पता चलता है कि बदलाव कितना बड़ा होगा। गोल्डमैन सैश के अनुसार, इस साल दुनियाभर में एआई में निवेश एक लाख करोड़ डॉलर से ज्यादा हो जाएगा। इतना बड़ा निवेश कारोबार के धीरे-धीरे बदलने का इंतजार नहीं करता। वह तकनीकी क्षमता को सीधे कर्मचारियों की संख्या से जुड़े फैसलों में बदल देता है। निवेश ही सब कुछ तय करता है और इससे बचना लगभग मुश्किल है।

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) का अनुमान है कि एआई दुनियाभर में करीब 40 प्रतिशत और विकसित अर्थव्यवस्थाओं में 60 प्रतिशत नौकरियों को प्रभावित करेगा। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के मुताबिक, दुनियाभर में हर चार में से एक कर्मचारी जेनरेटिव एआई के असर और जोखिम के दायरे में है। यह एक वैश्विक घटना है, पर इसका दर्द भारत के लिए खास है। तकनीक को तेजी से अपनाने के कारण सूचना प्रौद्योगिकी सेवाओं, वित्तीय क्षेत्र और दूरसंचार (जो भारतीय मध्य वर्ग की रीढ़ हैं) में कर्मचारियों की संख्या पहले ही घट चुकी है। अब इसका असर दूसरे क्षेत्रों पर भी दिखाई देने लगा है। गुरुग्राम में एडिडास के करीब 50 प्रतिशत तकनीकी कर्मचारियों की नौकरियां जा सकती हैं। बंगलूरू, पुणे और चेन्नई में वैश्विक क्षमता केंद्रों में भी नौकरियां घट रही हैं। नौकरी जाने का असर अब सामने आने लगा है और इसके नतीजे गंभीर हो सकते हैं।

ओपनएआई के संस्थापक सैम ऑल्टमैन का कहना है कि दुनिया को एआई के फायदों के एवज में इससे होने वाली ‘बुरी चीजों’ को भी स्वीकार करना चाहिए। यह कहना आसान है, लेकिन उन लोगों के लिए इसे स्वीकार करना कठिन, जो पहले से ही मुश्किल में जी रहे हैं। नौकरी जाने का सीधा असर आय पर पड़ता है और देश की आर्थिक वृद्धि कमजोर पड़ती है। जैसे-जैसे कर देने वालों की संख्या घटती है, कल्याणकारी योजनाओं पर सरकारी खर्च बढ़ना तय है। भारत में पहले ही करीब 81 करोड़ लोग मुफ्त अनाज पा रहे हैं। भारत में कुल सरकारी कर्ज करीब 80 प्रतिशत है। जो सरकार ब्याज चुकाने के लिए कर्ज ले रही हो, उसके लिए बेरोजगारों को भुगतान करने के लिए लगातार ऋण लेना आसान नहीं होगा। अब तक यह भी तय नहीं हो पाया है कि उस सॉफ्टवेयर पर कर कैसे लगाया जाए, जिसने कर चुकाने वाले इन्सान की जगह ले ली है।

भारत की संसद ने अपने मानसून सत्र में इस पर बहस की कि लोकसभा में कितने सदस्य होने चाहिए। नेता सीटों की गिनती कर रहे हैं। और, मशीनों ने तय कर लिया है कि किसकी नौकरी सबसे पहले जाएगी। वोटर तय करेंगे कि अगला नंबर किसका है। 21 साल से ज्यादा उम्र के वे युवा, जिन्हें पहली नौकरी नहीं मिली, उन नेताओं को जरूर याद रखेंगे, जिन्होंने समय रहते इस चुनौती पर ध्यान नहीं दिया। लोकतंत्र में सत्ता आखिर जनता के ही हाथ में होती है।

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