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दिल नहीं, दल बदलता है नेता

Tue, 25 Mar 2014 06:59 PM IST
अरविंद तिवारी
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मौसम चुनाव का है। कोई गठबंधन कर रहा है, कोई अकेला है। अकेला नेता दल बदल रहा है। उसका दिल बदल रहा है। उसके चमचे बदल रहे हैं। कुल मिलाकर लोग अपने-अपने खोमचे बदल रहे हैं। भइया, मैंने खूब मूंगफली बेच ली, अब मुझे गजक बेचने दो। चाहो, तो यह मूंगफली का खोमचा तुम रख लो। सामने वाला मूंगफली बेचने को तैयार नहीं है। जब आप ही मूंगफली नहीं बेच पाए, तो हम क्या बेचेंगे? हम तो फास्ट फूड बेचने का मन बना रहे हैं। हमारा मित्र मुरारी भी छोले-भटूरे छोड़कर इडली-डोसा बना रहा है। खूब कमा रहा है।
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हमारा एक दूसरा दोस्त है, जो बर्फ पर फिसलने के लिए कश्मीर नहीं, हैदराबाद जा रहा है। हैदराबाद वालों ने अपने लिए कृत्रिम बर्फ के पहाड़ का इंतजाम किया है। गर्म शहर में तापमान को माइनस पांच डिग्री पर लाया गया है। हैदराबाद हाई टेक शहर है, यह तथ्य झुमरीतलैया के लोग भी जान गए हैं। झुमरीतलैया के लोग यह भी जानते हैं कि नेता दल बदलता है, दिल नहीं। जिस वस्तु को आप बदलना चाहते हैं, वह आपके पास होनी भी तो चाहिए! संयोग से दिल और दल, दोनों एक साथ नहीं मिलते।

व्यंग्य में भी क्षेपक पर आ सकते हैं। मैं आता हूं। मेरी पत्नी पिछले कई दिनों से मुझे दल बदलने के लिए प्रोत्साहित करती रही है। मैंने उसे बता दिया कि मेरे पास दल नहीं, सिर्फ दिल है। उसका तर्क है कि दिल तो सबके पास होता है, इसमें नया क्या है। वह अपने मां-बाप को कोस रही है, जिनके सौजन्य से चालीस वर्ष पूर्व वह मेरे घर आई थी। मेरे पास एक अदद संवेदनशील दिल है, जो उनके लिए बेकार है। अगर मेरे पास दल होता, तो मैं दल बदलकर टीवी का समाचार बन सकता था।
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दल बदलकर लौटे नेता से मैंने पूछा, क्या आपने सच में दल के साथ दिल बदल लिया है? नेता ने ठहाका लगाया, फिर मेरे कान में फुसफुसाया, यदि मैंने दिल बदला, तो मुझे आपकी गंदी कॉलोनी में रहना पड़ेगा। याद रखो, दावा कोई कितना ही करे, नेता दिल नहीं बदलता, सिर्फ दल बदलता है।
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