मणिशंकर अय्यर ने दिल्ली में मोदी पर टिप्पणी करते हुए उन्हें 'नीच किस्म का आदमी' कहा। उसके आधे घंटे के भीतर ही गुजरात में एक रैली को संबोधित करते हुए मोदी ने अय्यर और कांग्रेस का जिक्र किया तथा अय्यर के बयान को अपनी पिछड़ी जाति से जोड़ा। उन्होंने आगे कहा कि कांग्रेस देश के सर्वोच्च पद पर उनके काबिज होने को पचा नहीं पा रही है। उन्होंने गुजरात के इस चुनावी समर को एक अलग मोड़ देने के लिए अय्यर के बयान का इस्तेमाल किया, यह जानते हुए, कि भले ही उनकी पार्टी और भाजपा सरकार ने अपनी जमीन खो दी है, लेकिन वह अब भी राज्य में लोकप्रिय हैं। उन्होंने इसे राजवंशीय कुलीन बनाम आम आदमी (चायवाला) का मुद्दा बना दिया। भाजपा की चुनावी मशीनरी मिनटों में हरकत में आ गई थी, और उसने प्रधानमंत्री को अय्यर के बयान से अवगत कराया, जिसमें कांग्रेस पर पलटवार करने की क्षमता थी। और प्रधानमंत्री ने कुछ ही मिनटों में अपनी रैली में इसका इस्तेमाल किया। उसके बाद एक घंटे के भीतर भाजपा की चुनावी मशीनरी फिर सक्रिय हुई और पिछले कुछ वर्षों में मोदी के खिलाफ कांग्रेस नेताओं द्वारा इस्तेमाल किए गए शब्दों के साथ सामने आई। और फिर अगली रैली में मोदी ने उनके खिलाफ किसने कब क्या कहा, उन सबका जिक्र किया। इस बार उन्होंने यहां तक कहा कि उनके विरोधी उन्हें खत्म करना चाहते हैं और उन्होंने अय्यर के पाकिस्तान में दिए गए बयान का जिक्र किया।
भावनात्मक स्तर पर गुजरात चुनाव को खुद पर केंद्रित करते हुए उन्होंने एक तरह से चुनावी विमर्श पर कब्जा कर लिया, यह कुछ ऐसा था, जिसकी उन्होंने चुनाव के अंतिम चरण में उम्मीद की थी और इसने कांग्रेस की पहल को, जिसने गुजरात मॉडल, बेरोजगारी और किसानों के असंतोष के मुद्दे पर भाजपा को फटकार लगाई थी, झटक कर फेंक दिया। इसके विपरीत कांग्रेस ने भाजपा पर निशाना साधने के लिए उपलब्ध सूचनाओं का इस्तेमाल किया। जब भाजपा के भंडारा (महाराष्ट्र) के कद्दावर सांसद नाना पटोले (जिन्होंने पिछले लोकसभा चुनाव में राकांपा के प्रफुल्ल पटेल को हराया था) ने तीन दिन पहले भाजपा की किसान-विरोधी नीति के चलते इस्तीफा दिया, पर उसके कुछ ही देर बाद रैली करते हुए राहुल गांधी ने इसका जिक्र अपने भाषण में नहीं किया। देश के संकटग्रस किसानों के प्रति भाजपा की उपेक्षा एक महत्वपूर्ण बात होती, जिसके कारण उसके अपने सांसद ने इस्तीफा दिया। यह उसी से संबंधित बात थी, जिस पर राहुल प्रचार के दौरान जोर दे रहे थे।
इसी में दो पार्टियों के बीच का अंतर निहित है। भाजपा के पास एक चुस्त मशीनरी है, और सभी कार्यकर्ता या संसाधन मोदी के नियंत्रण में हैं। राहुल को एक कमजोर, ठहरे और संघर्ष व कड़ी मेहनत करना भूल चुके नेताओं वाले संगठन का नेतृत्व करना होगा, उसे संगठित और पुनर्जीवित करना होगा। ऐसा नहीं कहा जा सकता कि राहुल ने गुजरात में अच्छा काम नहीं किया है। उनकी स्मार्ट सोशल मीडिया टीम ने भाजपा को गुजरात के विकास मॉडल के मुद्दे पर रक्षात्मक होने के लिए विवश कर दिया। उन्होंने 2002 के दंगे और ऐसे किसी भी मुद्दे का जिक्र नहीं किया, जिससे हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण का फायदा भाजपा को मिलता। गुजरात के लोगों ने उन्हें सुना और गुजरात के बदलते मूड के साथ इसका काफी मतलब था, जहां इस बार बदलाव की इच्छा व्यक्त करने वाली आवाजें सुनी गईं।
उनकी एक चतुर चाल आंदोलनों के नेताओं के साथ गठबंधन करना थी। राहुल गांधी ने हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकोर और जिग्नेश मेवाणी जैसे युवा नेताओं को अपने साथ लिया, जो पिछले कुछ वर्षों से अपने समुदायों के हकों के लिए आंदोलन कर रहे थे और जिन्होंने अचानक गुजरात में विपक्ष की जगह ले ली। उन्होंने अपने समुदाय के लोगों, खासकर युवाओं को आकर्षित किया। आम तौर पर राजनीतिक पार्टियां छोटी, बड़ी मौजूदा राजनीतिक पार्टियों से समर्थन पाने के लिए गठजोड़ करती हैं, न कि आंदोलनों या स्वयंसेवी संगठनों से। कांग्रेस ने, जो हमेशा 'बड़े भाई' की तरह काम करती है और जिससे अतीत में उससे जुड़े छोटे दल परेशान रहते थे, इस बार बंदूक चलाने के लिए दूसरों के कंधे को चुना है और खुद उसके पीछे रहने का फैसला किया है।
कांग्रेस को एक पार्टी के रूप में पुनर्जीवित होने के लिए राज्य में जमीनी स्तर पर उभर रही नई राजनीतिक ऊर्जा के साथ सहयोग करने के लिए नवोन्मेषी ढंग से सोचने की जरूरत है। जिन राज्यों में 2018-19 में चुनाव होने वाले हैं, वहां कांग्रेस के लिए विभिन्न आंदोलनों से जुड़ना अच्छा हो सकता है। राहुल गांधी की चिंता इस बात से बढ़ी है कि कांग्रेस आज विभिन्न व्यक्तियों का समूह बन गई है, जहां हर किसी का अपना निजी एजेंडा है। कांग्रेस के कुछ नेताओं के बयान, जिसने प्रधानमंत्री की जाल में फंसकर विमर्श को भावनात्मक मुद्दों पर आगे बढ़ाने में मदद की, इसका एक और सबूत था कि कांग्रेस एक संगठित और अनुशासित पार्टी नहीं रह गई है। लंबे समय तक कांग्रेस को उन नेताओं से जूझना पड़ा है, जो पार्टी से अलग लाइन लेते हैं और बाद में अपने बयान से मुकर जाते हैं। इस बार राहुल गांधी ने नुकसान को रोकने के लिए अय्यर के खिलाफ कार्रवाई की। 18 दिसंबर को ही पता चलेगा कि उनके इस बयान का चुनावी नतीजे पर क्या असर पड़ा। लेकिन इससे पार्टी को नुकसान तो हुआ, जो नहीं होना चाहिए था और वह भी उस चुनाव में, जिसे 'कांटे की टक्कर' कहा जा रहा है।
सोनिया गांधी जब 1998 में पार्टी अध्यक्ष बनी थीं, तब उन्हें विरोधियों के रूप में वाजपेयी और आडवाणी का सामना करना पड़ा। लेकिन अनिच्छुक राजनेता राहुल जब पार्टी का नेतृत्व करेंगे, तो उन्हें नरेंद्र मोदी और अमित शाह, दोनों के संयुक्त अभियान का सामना करना पड़ेगा, जो हर जगह पंचायत से लेकर संसद तक प्रतिनिधित्व करना चाहते हैं। यह राहुल के समक्ष वाकई एक बड़ी चुनौती है, अगर वह औपचारिक रूप से 132 वर्ष पुरानी कांग्रेस का नेतृत्व करते हैं।