बरसों से शीतलहर के दौरान होने वाली मौतों के लिए सिर्फ और सिर्फ ठंड और उसके कहर को ही जिम्मेदार बताया जा रहा है। शायद यही वजह है कि इस दौरान लोगों को मौत के मुंह से बचाने के लिए सिर्फ आग और अलाव जलाने की ही तैयारियां की जाती हैं। सरकारी लालफीताशाही के चलते कहीं अलाव जलते भी हैं, तो कहीं नहीं जलते। लेकिन मौतों का आंकड़ा रुकता नहीं। इन मौतों की असल वजहों की पड़ताल के बजाय इन्हें एक तरह से स्वाभाविक मौत मानकर सरकारें आगे बढ़ जाती हैं। गरीबी की सीमाओं में जीने के लिए मजबूर रहे समाज के सामने इस धारणा को मानने के अलावा दूसरा कोई चारा भी नहीं है।
अब वक्त आ गया है कि इन मौतों के कारणों की पड़ताल की जाए और उसकी वजहों की तरफ दुनिया का ध्यान दिलाया जाए। दिसंबर, 2012 के आखिरी हफ्ते में जब से शीतलहर ने दस्तक दी है, रोजाना ठंड से होने वाली मौतों की खबरें आ रही हैं। अगर इसे मान लिया जाए, तो अव्वल तो होना यह चाहिए कि जिन इलाकों में तापमान ज्यादा गिरा, वहां मौतें ज्यादा होनी चाहिए थीं। अमूमन पंजाब और हरियाणा के मैदानी इलाकों में ज्यादा ठंड पड़ती है।
इसी तरह उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में भी लगातार गिरते पारे से लोग अभ्यस्त हैं। मगर सोचने की बात यह है कि मौतें ज्यादा हो रही हैं पूर्वी और मध्य उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में। सरकारी आंकड़े चाहे जो कहें, मगर सिर्फ उत्तर प्रदेश में ही सात जनवरी तक 245 से ज्यादा मौतें हो चुकी थीं। जबकि अकेले सात जनवरी को ही बिहार और झारखंड में 44 लोगों की मौत हुई। अभी ठंड की लहर कुछ दिन और चलने की आशंका है। लिहाजा मौत की रफ्तार पर रोक लगने की उम्मीद कम ही है।
नए दौर में भले ही शीत लहर और गर्म हवा के थपेड़ों को लेकर नई अवधारणाएं बनी-बनाई गईं हों, हकीकत तो यह है कि समाज भी इनके कहर को लेकर पहले से ही अपनी राय रखे हुए है। पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार की लोक कहावतों में गरमी से ज्यादा ठंड को मारक बताया गया है। वहां की कहावतों में गरमी को गरीबों का हमदर्द बताया गया है, क्योंकि उसके दौरान लोगों को न तो ओढ़ने की जरूरत होती है और न ही बिछाने के लिए बिस्तर की।
इतना ही नहीं, महंगे गरम कपड़े की भी जरूरत नहीं होती। गरमी में दो वक्त की रोटी मिल जाए, तो कहीं भी छांह देखकर नींद ली जा सकती है। यानी समाज भी प्रकारांतर से मानता रहा है कि ठंड को झेलने से कहीं ज्यादा आसान गरमी को झेलना है। गरीबों के लिए ठंड दोहरी मार लेकर आती है। ठंड के दिनों में गंभीर और पोषक भोजन की भी जरूरत ज्यादा होती है। इसलिए गरीबों के लिए जाड़ा काटना मुश्किल होता है। ओढ़ने-बिछाने के लिए बेहतर कपड़ों और बिस्तर की कमी पर पेट की भूख भारी पड़ती है, जिससे मौत उन्हें आसानी से अपने शिकंजे में ले लेती है।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों में जहां खाने-पीने से लेकर ओढ़ने-बिछाने की सहूलियतें ज्यादा हैं, वहां भीषण शीतलहर भी लोगों पर वैसा मारक असर नहीं डाल पाती, जैसा पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में डालती है। योजना आयोग द्वारा जारी मानव विकास सूचकांक में केरल के बाद अगर किसी राज्य का नंबर है, तो वह पंजाब है। इसी तरह 0.509 अंक के साथ हरियाणा पांचवें नंबर पर है।
योजना आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, इन राज्यों में रहन-सहन का स्तर और खाने-पीने के सामान की उपलब्धता कहीं बेहतर है, लिहाजा इन राज्यों के लोग कड़ी ठंड का सामना भी कहीं ज्यादा मजबूती के साथ कर लेते हैं। इतने बदलाव के बावजूद मानव विकास सूचकांक के मामले में सबसे पिछड़ा राज्य 0.367 अंकों के साथ बिहार है। बिहार के तुरंत बाद असम (0.386 अंक), उत्तर प्रदेश (0.388 अंक) और मध्य प्रदेश (0.394 अंक) का नंबर आता है। यानी साफ है कि इन इलाकों में लोगों का जीवन स्तर और सहूलियतें बेहद कम हैं और यही वजह है कि इन राज्यों के लोगों की ठंड के सामने खड़े होने की ताकत कम है। हैरत की बात यह है कि गरीबी के आधार पर राजनीति करने वाली इन पार्टियों ने भी शीतलहर के दौरान होने वाली मौतों को गरीबी के आधार पर पड़ताल करने की जरूरत नहीं समझीं।