अरविंद केजरीवाल का कहना है कि आम आदमी पार्टी ने जिन मुद्दों को लेकर चुनाव लड़ा, उनमें जनलोकपाल एवं स्वराज सबसे अहम मुद्दा था। वह विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर इससे संबंधित विधेयक को पारित करवाना चाहते हैं। असल में आम आदमी पार्टी जिस जनलोकपाल विधेयक को पास करने पर अड़ गई है, उसे लेकर उसके मन में कहीं कोई उहापोह नहीं है। बारीकी से आप सरकार ने जान लिया है कि कानूनी उल्लंघन होने पर भी इसे दिल्ली विधानसभा के विशेष सत्र में लाने से रोका नहीं जा सकता है। उपराज्यपाल या उसके बाद केंद्र सरकार इस पर क्या फैसला लेती है, यह अलग मसला है। केंद्र सरकार इस पर सहमति नहीं देती है या फिर व्यवस्था और अराजकता का तकाजा देकर राज्य सरकार को ही बर्खास्त कर दे; इन दोनों ही स्थितियों में आप को खुद को शहीद बताने का पूरा मौका मिलेगा।
तह में जाएं, तो इस विधेयक को लाने में कानूनी उल्लंघन साफ नजर आता है। विधेयक को सदन में लाने से पहले गृह मंत्रालय से मंजूरी लेना जरूरी है। आप ने ऐसी कोई मंजूरी नहीं ली है। लेकिन इस स्थिति में भी अगर विधानसभा कोई विधेयक पास कर देती है, तो उसे ऐसा करने से रोका नहीं जा सकता। बल्कि उसे उपराज्यपाल के पास भेजा जाता है। यहां उपराज्यपाल के पास दो विकल्प होते हैं। या तो वह विधेयक को अनियमितता के बावजूद पास कर दे। ऐसी स्थिति में इसका कोई मतलब नहीं रह जाएगा कि इसके लिए पहले मंजूरी ली गई थी या नहीं। उपराज्यपाल की मंजूरी मिलने पर यह कानून की शक्ल में आ जाएगा। पर यदि उपराज्यपाल को लगता है कि विधेयक को मंजूर नहीं करना चाहिए, तो वह ऐसा करने से इन्कार कर सकते हैं।
गौर करने लायक बात है कि आप की ओर से बार-बार कहा जा रहा है कि पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के समय भी कुछ विधेयकों के लिए गृह मंत्रालय से मंजूरी नहीं ली गई थी। ऐसे में यही लगता है किसी खास परिस्थिति में उपराज्यपाल के जरिये मंजूरी मिलने पर वे विधेयक निरस्त नहीं हुए होंगे। इसे बिल्कुल इस तरह समझा जा सकता है कि कोई व्यक्ति अगर अपने घर के फाटक पर तख्ती लगा दे कि अंदर आना मना है, लेकिन उसका दोस्त घर के अंदर आ जाए। और वह उसके आने पर नाराज न हो, उसका सम्मान करे, तो ऐसी स्थिति में गेट के बाहर लगी तख्ती का मतलब नहीं रहेगा।
संसद में भी इस तरह का दृष्टांत मिलता है। सांसदों की पेंशन के बारे में तत्कालीन राष्ट्रपति वेंकटरमन को किसी ने बताया कि इस मामले में अनुच्छेद 117 के तहत नियमों का उल्लंघन हुआ है। आखिर वेंकटरमन ने इस पर अपनी मंजूरी नहीं दी। हमें दिल्ली की स्थिति को समझना होगा। दिल्ली पूर्ण राज्य नहीं है। सच तो यही है कि दिल्ली राज्य ही नहीं है, यह संघ प्रशासित क्षेत्र है। यहां की विधानसभा, मंत्रियों की शक्ति दूसरे राज्यों की तुलना में कम होती है। इसे संचालित करने में कई पहलुओं का ध्यान रखना होता है। संविधान के अनुच्छेद 239 क के तहत दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र है, और उसमें विधानसभा भी समायोजित है। मगर दिल्ली सरकार की सीमाओं को बहुत सीमित परिभाषित किया गया है।
केंद्र और राज्यों के दायित्व के आवंटन के संबंध में सांविधानिक प्रावधान तीन श्रेणियों में आते हैं। संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची। भारतीय संसद तीनों में कानून बनाने की पात्रता रखती है। यदि किसी मामले में संसद और दिल्ली सरकार, दोनों को कोई कानून बनाना पड़े, तो उसमें संसद का बनाया कानून ही मान्य होगा। इस मामले में यह कहा जा सकता है कि केंद्र के लोकपाल एवं लोकायुक्त कानून और दिल्ली के जनलोकपाल विधेयक में अगर किसी पहलू में टकराव होता है, तो केंद्र के लोकपाल एवं लोकायुक्त कानून की ही अहमियत रहेगी। दिल्ली की विधानसभा की अपनी सीमाओं में ही यह देखना जरूरी हो जाता है कि भूमि, जमीन, पुलिस और कानून व्यवस्था के संबंध में तो वह कानून बनाने की पात्रता नहीं रखती। यह अधिकार केंद्र को ही है। पर जिन विषयों पर वह कानून बनाना चाहती है, उसके लिए प्रस्ताव पर मंजूरी ले लेनी चाहिए।
एक कौतूहल इस बात को लेकर है कि आम आदमी पार्टी, दिल्ली के इंदिरा गांधी स्टेडियम में विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर जनलोकपाल विधेयक को पास कराना चाहती है। हम ऐसे पहलू को संसदीय दृष्टांत से देखते हैं। संविधान में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, इसलिए ऐसी घटना अभूतपूर्व ही कही जाएगी। हालांकि ऐसी कोई भी गतिविधि संसदीय परंपरा और गरिमा के खिलाफ है। कल दूसरे राज्यों में भी वहां की विधानसभा अपने विशेष सत्र के लिए ऐसे ठिकाने तलाश सकती है। लेकिन इसे गैरकानूनी नहीं माना जाएगा। मुख्यमंत्री नहीं, लेकिन अगर किसी राज्य की विधानसभा यह तय करती है कि हम अमूक स्थान पर मिलेंगे, तो उसे रोका नहीं जा सकता। हां कार्यवाही को उसी व्यवस्था से चलाना होगा, जैसे विधानसभा या विधानपरिषद को चलाया जाता है। उसे किसी भी रूप में अखाड़ा नहीं बनाया जा सकता है। बात यहां तक सीमित नहीं, बल्कि यहां से शुरू होती है कि केंद्र सरकार इसे रोकने के लिए कहां तक जा सकती है। सरकार के पास कुछ विकल्प हैं। एक तो सरकार कानून व्यवस्था का हवाला देकर उस स्थल पर धारा 144 लगा सकती है। लेकिन यह बहुत चरम स्थिति होगी कि केंद्र सुरक्षा व्यवस्था का हवाला देते हुए सत्र को उस स्थल पर न होने दे।
आम आदमी पार्टी इस झंझावात और कानूनी दांवपेचों से किसी तरह घबराई हुई नहीं दिख रही है। उसे लगता है कि इस स्थिति में या सरकार के बर्खास्त होने पर लोकसभा चुनाव में, और भविष्य में भी, उसे फायदा ही होना है।