सतत विकास के लिए अच्छा स्वास्थ्य मूलभूत जरूरत है। मगर इस वर्ष भी दिल्ली और एनसीआर में छाई धुंध बताती है कि हवा कैसी जहरीली बनी हुई है। पर्यावरण प्रदूषण (रोकथाम एवं नियंत्रण) प्राधिकरण ने स्वास्थ्य आपातकाल घोषित कर दिया है, जिससे स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। भारत के अधिकांश शहरों में प्रदूषित हवा के कारण मानव स्वास्थ्य, पर्यावरण और देश की अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान होता है।
वर्ष 2016 से विभिन्न हितधारकों/एजेंसियों ने विभिन्न शहरों में वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए बड़े पैमाने पर धन खर्च किए हैं, लेकिन इससे किसी तरह का वास्तविक लाभ अभी तक नजर नहीं आया है। इसकी वजह को समझना कठिन नहीं है। दरअसल वायु गणुवत्ता के प्रबंधन के लिए जुटे हितधारकों और एजेंसियों के बीच बेहद खराब समन्वय है। इनमें से कुछ के अपने कारोबारी हित हैं, सो वे असली मुद्दे से ध्यान भटकाते हैं और अपने निजी हित के लिए अपने उत्पाद बाजार में लाना चाहते हैं। इसलिए जरूरी है कि नगर निकाय तथा राज्य और केंद्र की सरकारें इन हितधारकों और एजेंसियों के साथ मिलकर काम करें और उन्हें सोशल ऑडिट के लिए जवाबदेह बनाएं, ताकि पता चल सके कि विभिन्न एजेंसियों के दखल से किस तरह का लाभ हो रहा है। भारत सरकार ने इस वर्ष राष्ट्रीय स्वच्छ हवा कार्यक्रम (एनसीएपी) की शुरुआत की है, जिसका लक्ष्य है 2024 तक पीएम 2.5 और पीएम 10 के स्तर को 20 से तीस फीसदी कम करना। केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने विभिन्न अकादमिक संस्थाओं तथा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को साथ लेकर एनसीएपी के लक्ष्य को हासिल करने के लिए कुछ प्रयास जरूर किए गए हैं।
अलबत्ता वायु प्रदूषण की समस्या का समाधान सिर्फ इन एजेंसियों के जरिये नहीं हो सकता। इसके लिए सभी संबद्ध मंत्रालयों (जैसे कि आवास और शहरी मामले, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालयों आदि), जिनके ढांचे और गतिविधियों का प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से वायु प्रदूषण में हाथ होता है, स्थानीय शहरी निकायों, रेजीडेंट वेलफेयर एसोसिएशन्स तथा उद्योग संगठनों आदि से बातचीत भी जरूरी है। इस मामले में सभी स्थानीय शहरी निकायों का क्षमता निर्माण आवश्यक है, और इससे संबंधित प्रशिक्षण देने के लिए शिक्षा शास्त्रियों, शोध संगठनों और पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाले लोगों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। हाल के वर्षों में विभिन्न समुदायों में जागरूकता बहुत बढ़ी है, समाज में पर्यावरण के प्रति सजगता बढ़ाने में जिसका बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है। व्यक्तिगत स्तर पर और स्थानीय, प्रांतीय तथा राष्ट्रीय स्तर पर वायु गुणवत्ता प्रबंधन योजना को लागू करने के मामले में एक राय बनाने के लिए इस पर्यावरणीय सजगता का औजार के तौर पर इस्तेमाल किया जाना आज के समय की जरूरत है।
वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए राज्यों के बीच तालमेल और सहयोग बहुत जरूरी है, क्योंकि वायु प्रदूषण भौगोलिक सीमाओं को नहीं मानता और बहुत दूर-दूर तक फैलकर स्थानीय, क्षेत्रीय, प्रांतीय, राष्ट्रीय, यहां तक कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी वायु की गुणवत्ता और मानव स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। वायु प्रदूषण नियंत्रण के लिए रणनीति तैयार करते हुए इसे सही तरीके से कार्यान्वित करने पर बल देना चाहिए। यहां एक उदाहरण देना जरूरी होगा। दिल्ली, मुंबई और बंगलूरू जैसे महानगरों में वाहनों को नियंत्रित करने की बड़ी चुनौती है, लिहाजा वाहनों से होने वाले उत्सर्जन को कम करना इन महानगरों की प्राथमिकता है। जबकि पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के छोटे-छोटे गांवों में जीवाश्म ईंधन जलाया जाना और घरों के अंदर का वायु प्रदूषण एक बड़ी समस्या है, जो त्वरित समाधान मांगती है। देश के अनेक शहरों में वायु प्रदूषण पर अंकुश लगाने के लिए कई उपाय किए गए हैं, इसके बावजूद कोई उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल नहीं हो पाई है।
दिल्ली महानगर में वायु गुणवत्ता की स्थिति इसका ताजा सबूत है, जो एक बार फिर खतरनाक स्तर पर पहुंच गई है। दरअसल वायु प्रदूषण रोकने के लिए जो उपाय किए जाने चाहिए, और जमीनी स्तर पर जो कदम उठाए जाते हैं, उनके बीच कोई तारतम्य न होने के कारण ही देश के अधिकांश शहरों में यह समस्या है। उदाहरण के लिए, दिल्ली में ऑड-ईवन बेशक एक अच्छी और आवश्यक पहल है, जिसकी सफलता कई चीजों पर निर्भर है, जिनमें राजनीतिक इच्छाशक्ति और लोगों का समर्थन सबसे महत्वपूर्ण है। लेकिन सिर्फ ऑड-ईवन से दिल्ली में वायु की गुणवत्ता नहीं सुधर सकती। जबकि दिल्ली में परिवहन की चुनौतियों का समाधान करने की दिशा में परिवहन मांग प्रबंधन या टीडीएम एक कारगर तरीका साबित हो सकता है। यह समझना जरूरी है कि देश की 80 प्रतिशत आबादी परिवहन के सार्वजनिक साधनों पर निर्भर है, इसके बावजूद प्रदूषण से निपटने के लिए निजी कारों पर नियंत्रण का तरीका अपनाया जा रहा है, जिसका इस्तेमाल एक छोटा और समृद्ध तबका करता है।
ऐसे में, जरूरी यह है कि शिक्षा शास्त्री, शोधार्थी, शहर योजनाकार और नीति नियंता गरीबों के परिवहन को नियंत्रित करने की रणनीति बनाएं। इससे प्रदूषण नियंत्रण के लिए देश के सभी शहरों में सभी तरह के वाहनों को नियंत्रित करना सुनिश्चित हो सकेगा। इलेक्ट्रिक कारों को बढ़ावा देना भी सरकार के एजेंडे में है। लेकिन सार्वजनिक वाहनों का विद्युतीकरण शहरों में वाहनों से होने वाले उत्सर्जन के समाधान का सबसे प्रभावी उपाय साबित हो सकता है। 'राजनीतिक इच्छा' और 'प्रभावी शासन' ही वायु प्रदूषण या परिवहन प्रबंधन से संबंधित रणनीति के प्रभावी क्रियान्वयन की गारंटी है। उत्तर भारत में पराली जलाने, शहरी और ग्रामीण इलाकों में जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल, भवन निर्माण और उन्हें तोड़ने, सड़क की धूल, उद्योगों से होने वाला उत्सर्जन जैसी समस्याओं के समाधान के लिए सभी हितधारकों की ओर से समेकित नीति बनाने की जरूरत है। (लेखक आईआईटी तिरुपति में एसोसिएट प्रोफेसर हैं।)