पिछले वर्ष जून में उत्तराखंड में आई आपदा से बुरी तरह प्रभावित उत्तर प्रदेश के किसानों को उम्मीद थी कि सपा सरकार विधानसभा चुनाव के दौरान किए गए अपने वायदे को पूरा करते हुए गन्ने के राज्य परामर्श मूल्य (सेप) में बढ़ोतरी करेगी। किसान मान रहे थे कि गन्ने के सेप को 350 रुपये प्रति क्विंटल करने का सरकार जो वायदा कर रही है, वह भले पूरा न हो, मगर पिछले वर्ष के 280 रुपये प्रति क्विंटल से बढ़ाकर इसे कम से कम 300 रुपये प्रति क्विंटल तो करना ही चाहिए।
चूंकि उत्तर प्रदेश में गन्ना किसानों का दो करोड़ का वोट बैंक है, ऐसे में, मिल मालिकों ने लोकसभा चुनाव के मद्देनजर राजनीतिक भावनाओं का फायदा उठाने की सोची। जब मिल मालिकों ने किसानों के भुगतान की परवाह न करते हुए तालाबंदी की, तब इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मामले का संज्ञान लेते हुए मिलों को चालू कराने का राज्य सरकार को निर्देश दिया। ऐसे माहौल में केंद्र और राज्य की सरकारों ने चीनी मिलों के लिए पैकेज की घोषणा तो की, मगर मिलें गन्ने का बकाया भुगतान करने में आनाकानी करती रहीं।
गन्ने के कम मूल्य से पहले से त्रस्त गरीब किसानों को अपने बकाए का भुगतान न मिल पाने के संकट से भी जूझना पड़ रहा था। इसके अलावा यह समझने की भी जरूरत है कि चीनी का मूल्य हर दिन बदलता रहता है। ऐसे में, गन्ने के मूल्य का भुगतान चीनी की प्रचलित दरों के हिसाब से संभव नहीं है। यह महज पहले से चली आ रही व्यवस्था को भ्रमित करने का एक तरीका है।
सच तो यह है कि गन्ना किसानों की चिंताएं खत्म होने का नाम लेती नहीं दिख रहीं। एक ओर तो उन्हें 2012-13 के अपने बकाए की फिक्र है, वहीं यह भी चिंता है कि इस बार मिलें गन्ने की पेराई कब शुरू करेंगी। चूंकि राज्य सरकार उच्च न्यायालय के सामने खुलकर मिल मालिकों का पक्ष ले चुकी है, ऐसे में किसानों की चिंता लाजिमी है।
सरकार की ओर से अब तक न तो गन्ने का मूल्य तय किया गया है, और न ही राज्य के स्वामित्व वाली सहकारी मिलों में पेराई शुरू करने की तारीखों की घोषणा की गई है। इन सब परेशानियों का समाधान ढूंढते किसानों को मैं यह याद दिलाना चाहूंगा कि उनके सामने पिछले दशकों में कई बार ऐसी समस्याएं आ चुकी हैं, जब अदालती दखल के बाद न केवल मिलों को पेराई शुरू करने पर मजबूर होना पड़ा, बल्कि बकाया भुगतान भी करना पड़ा।
प्रदेश के चीनी संकट को समझने के लिए राज्य सरकार और मिल मालिकों के गठजोड़ को भी समझना होगा। साथ ही, न्यायपालिका के सराहनीय योगदान को भी समझना होगा। मिल मालिकों को झुंझलाहट तब होती है, जब उन्हें न्यायपालिका के आगे झुकते हुए किसानों को भुगतान के लिए मजबूर होना पड़ता है।
वे चाहते हैं किसान परेशान होकर कानून को अपने हाथ में लें, ताकि अदालत की नजरों में किसान गिर जाएं। किसानों को मिल मालिकों के खेल को समझना होगा। मेरठ में किसानों का 35 दिनों का शांतिपूर्ण धरना एक अपनी शिकायतों को सही ढंग से रखने का आदर्श नमूना था। मगर समस्या का स्थायी समाधान राजनीतिक इच्छाशक्ति के बगैर संभव नहीं।